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दिल्ली: 5 साल में शून्य से आगे नहीं बढ़ सकी कांग्रेस, अब खड़ा होना मुश्किल!

दिल्ली विधानसभा चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस ने बेहद निराशाजनक प्रदर्शन किया है। कांग्रेस के लिये दिल्ली का प्रदर्शन बुरे ख़्वाब की तरह है और यह पांच साल बाद एक बार फिर उसका पीछा कर रहा है। लेकिन पार्टी इससे पीछा नहीं छुड़ा पा रही है। सवाल यह है कि कांग्रेस इस बुरे ख़्वाब से कैसे पीछा छुटाएगी, सीधा जवाब है कि अच्छा प्रदर्शन करके। लेकिन यह अच्छा प्रदर्शन न करना ही उसके लिये मुसीबत बन गया है। 

इसे राजनीति की अनिश्चितता ही कहा जा सकता है कि 15 साल तक लगातार दिल्ली की सत्ता में रहने वाली पार्टी पिछले दो विधानसभा चुनावों में अपना ख़ाता खोलने के लिये तरस गई। राष्ट्रीय राजधानी में कांग्रेस की स्थिति इस क़दर ख़राब हो चुकी है कि उसे चुनाव में दिल्ली में जनाधार विहीन राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के आगे झुकना पड़ा और 4 सीटें देनी पड़ीं। 70 सीटों वाली विधानसभा में वह 66 सीटों पर चुनाव लड़ी जिसमें से 63 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई। यहां इस बारे में बात करनी ज़रूरी है कि पार्टी की हार के क्या प्रमुख कारण हैं और वह कैसे अपने पैरों पर दुबारा खड़ी होगी। 

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दो सीटों तक सिमटा चुनाव प्रचार 

चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा लग रहा था कि दिल्ली में कांग्रेस का पूरा प्रचार सिर्फ़ दो सीटों तक सिमट कर रह गया हो। इनमें एक सीट थी कालकाजी, जहां से प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा की बेटी शिवानी चोपड़ा चुनाव लड़ रही थीं तो दूसरी सीट थी संगम विहार, जहां से चुनाव प्रचार कमेटी के अध्यक्ष कीर्ति आज़ाद झा की पत्नी पूनम आज़ाद झा चुनाव लड़ रही थीं। बाक़ी सीटों पर पार्टी के इक्का-दुक्का स्टार प्रचारकों ने एक या दो जनसभा की। जबकि पार्टी की ओर से 40 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की गई थी। सुभाष चोपड़ा और कीर्ति आज़ाद के ज़्यादा समय अपने परिवार की सीटों को देने के कारण पार्टी के बाक़ी उम्मीदवारों का हौसला टूट गया और वे चुनाव में दम-ख़म नहीं दिखा सके। क़रारी हार के बाद सुभाष चोपड़ा और प्रदेश प्रभारी पी.सी. चाको ने इस्तीफ़ा दे दिया है। लेकिन इस्तीफ़ा देने से क्या पार्टी का प्रदर्शन सुधर जाएगा। 

कांग्रेस की ख़राब हालत का अंदाजा इससे लग जाता है कि उसके कार्यकारी अध्यक्ष राजेश लिलोठिया 4056 वोट, शिवानी चोपड़ा 4965 वोट, पूर्व केंद्रीय मंत्री कृष्णा तीरथ 3382 वोट और पूनम आज़ाद झा महज 2601 वोट ही ला सके।

वरिष्ठ नेताओं की निष्क्रियता 

यह ख़बर आई थी कि चुनाव से पहले पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने लोकसभा चुनाव लड़ चुके पार्टी नेताओं और कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं से विधानसभा चुनाव लड़ने के लिये कहा था। लेकिन कोई भी मैदान में नहीं उतरा। अजय माकन हों या जेपी अग्रवाल, प्रचार में वैसे सक्रिय नहीं दिखाई दिये। पूर्व सांसद महाबल मिश्रा के ख़िलाफ़ पार्टी को कार्रवाई करनी पड़ी तो सिख विरोधी दंगों में उम्रक़ैद की सजा सुनाये जाने के कारण पूर्व सांसद सज्जन कुमार प्रचार में नहीं दिखाई दिये। पूर्व सांसद संदीप दीक्षित भी प्रचार में सक्रिय नहीं दिखाई दिये। प्रचार के अंतिम दिनों में राहुल गाँधी और प्रियंका ने सिर्फ़ 4-5 सीटों पर प्रचार किया। 

कांग्रेस को अपने परंपरागत वोटरों मुसलिम, दलित और पूर्वांचलियों ने भी पूरी तरह नकार दिया और पार्टी 2015 में मिले 9 फ़ीसदी वोटों से फिसलकर 4.26 फ़ीसद पर आ गई।

गुटबाज़ी से कमजोर हुई पार्टी 

पड़ोसी राज्य हरियाणा में बेहतर प्रदर्शन और महाराष्ट्र और झारखंड में सरकार में हिस्सेदारी मिलने के बाद कांग्रेस को उम्मीद थी कि वह दिल्ली में भी कुछ कमाल करेगी। लेकिन नेताओं की गुटबाज़ी के कारण पार्टी शून्य से आगे नहीं बढ़ सकी। 2013 में 24 फ़ीसद वोट लाने वाली कांग्रेस जब 8 सीटों पर सिमट गई थी, उसके बाद भी पार्टी के नेताओं ने गुटबाज़ी नहीं छोड़ी। शीला दीक्षित के जीवित रहने तक पार्टी में लगातार घमासान की ख़बरें आती रहीं और 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली में शून्य सीटों पर सिमटने के बाद भी पार्टी नेताओं ने कार्यकर्ताओं के बीच जाने की जहमत नहीं उठाई। 

लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस दिल्ली में खड़ी कैसे होगी। उसके वरिष्ठ नेता मेहनत करना नहीं चाहते। उसका सारा वोट बैंक आम आदमी पार्टी के पास जा चुका है और उसके पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो इस वोट बैंक को उसके पाले में वापस ला सके। कांग्रेस को यह समझना होगा कि वह सिर्फ़ इसमें ख़ुश न हो कि बीजेपी सत्ता में नहीं आई। उसे इस पर चिंतन करना चाहिए कि लंबे समय तक देश की सत्ता और दिल्ली में राज करने के बाद आज उसकी यह स्थिति क्यों हो गई है कि वह कुछ राज्यों में सत्ता में हिस्सेदारी मिलने और बीजेपी के सत्ता में न आने को ही कामयाबी मानकर बैठी है। 

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दिल्ली में कांग्रेस के प्रदर्शन से साफ़ है कि अब कोई करिश्मा या चमत्कार ही उसे पैरों के बल पर खड़ा कर सकता है और सियासत में ऐसे करिश्मे या चमत्कार दशकों में होते हैं। ऐसे में पार्टी नेता या तो करिश्मा होने का इंतजार करें या मेहनत करने का विकल्प चुनें और पार्टी को खड़ा करें। लेकिन वे मेहनत करने के लिये तैयार होंगे, इसमें शक है। 

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पवन उप्रेती
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