दिल्ली में एसआईआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा है कि जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं उनसे नये मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए भरवाए जाने वाले फ़ॉर्म 6 क्यों भरवाए जा रहे हैं? ये वे मतदाता हैं जिन लोगों के नाम 2026 की मतदाता सूची में थे, लेकिन गणना फॉर्म नहीं भर पाने के कारण ड्राफ्ट सूची से बाहर हो गए थे। उन्हें नए मतदाता के तौर पर पंजीकरण कराने वाला फॉर्म 6 भरने के लिए कहा जा रहा है। अदालत ने कहा कि फॉर्म 6 उन लोगों के लिए है जो पहली बार वोटर बन रहे हैं और इसमें घोषणा करनी होती है कि उन्होंने पहले कभी मतदाता के रूप में पंजीकरण नहीं कराया है। अदालत ने सुझाव दिया कि ऐसे लोगों को गणना फॉर्म भरने या पता बदलने के लिए फॉर्म 8 जमा करने का मौक़ा दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली जैसे शहर में बड़ी संख्या में लोग कामकाज के सिलसिले में अस्थायी रूप से एक जगह से दूसरी जगह आते-जाते रहते हैं। कई लोग अपने पुराने पते पर मौजूद नहीं होते या नौकरी के कारण कुछ समय के लिए शहर से बाहर चले जाते हैं। ऐसे में केवल गणना फॉर्म नहीं भर पाने के कारण उन्हें मतदाता सूची से बाहर करने या पहली बार वोटर के रूप में आवेदन करने के लिए बाध्य करने पर सवाल उठते हैं।

'लोगों पर बोझ न डाले, ECI करे संपर्क'  

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग ऐसे लोगों के लिए अलग व्यवस्था बनाए, जिन्हें गणना फॉर्म इसलिए नहीं मिला क्योंकि वे अस्थायी रूप से कहीं और चले गए थे या किसी अन्य वजह से उनसे संपर्क नहीं हो सका। अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग को लोगों पर यह जिम्मेदारी डालने के बजाय उनसे संपर्क करने की कोशिश करनी चाहिए। आयोग ने अदालत को भरोसा दिया कि इन सुझावों पर विचार किया जाएगा और समयसीमा बढ़ाने की संभावना भी देखी जाएगी।
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सुप्रीम कोर्ट में किस मामले की सुनवाई हुई?

दिल्ली में SIR की प्रक्रिया को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। बुधवार को इस याचिका पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से करीब 47 लाख नाम हटाए गए हैं। उनके मुताबिक़ इनमें से लगभग 43 लाख लोगों को स्थायी रूप से स्थानांतरित, अनुपस्थित या इसी तरह की श्रेणियों में दर्ज किया गया है।
भूषण ने कहा कि इन लोगों को गणना फॉर्म नहीं मिला था या वे किसी वजह से इसे भर नहीं पाए थे। इसके बावजूद चुनाव आयोग उनसे फॉर्म 6 भरने के लिए कह रहा है, जबकि वे पहले से मतदाता थे। उन्होंने अदालत में दलील दी कि जिन लोगों ने केवल अपना पता बदला है, उनके लिए फॉर्म 8 का इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे लोगों को फॉर्म 6 भरने के लिए कहना सही नहीं है, क्योंकि इसमें उन्हें यह घोषणा करनी पड़ती है कि उन्होंने पहले कभी वोटर के रूप में पंजीकरण नहीं कराया है।

फॉर्म 6 और फॉर्म 8 में क्या अंतर है?

सुनवाई का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा फॉर्म 6 और फॉर्म 8 के इस्तेमाल को लेकर था। फॉर्म 6 का इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने के लिए किया जाता है। इसमें आवेदक को यह घोषणा करनी होती है कि उसने पहले किसी मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज नहीं कराया है। दूसरी ओर, फॉर्म 8 का इस्तेमाल मतदाता सूची में दर्ज विवरण में बदलाव और निवास स्थान बदलने जैसी परिस्थितियों में किया जाता है।

प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि जिन लोगों का नाम 2026 की मतदाता सूची में पहले से मौजूद था उन्हें केवल गणना फॉर्म नहीं भर पाने के कारण नए मतदाता की तरह आवेदन करने के लिए कहना समस्या पैदा कर रहा है।

प्रशांत भूषण ने कहा कि ऐसे लोगों को गणना फॉर्म भरने और जरूरत पड़ने पर फॉर्म 8 जमा करने की अनुमति दी जानी चाहिए। उनके मुताबिक, पहले से मतदाता रहे लोगों से यह घोषणा कराना कि उन्होंने कभी वोट नहीं दिया है, गलत घोषणा करने जैसी स्थिति पैदा कर सकता है।

'दिल्ली में लोग काम के लिए आते-जाते रहते हैं'

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने चुनाव आयोग से पूछा कि जब दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों का आना-जाना लगा रहता है, तो आयोग ऐसे मतदाताओं तक खुद पहुंचने की कोशिश क्यों नहीं करता? अदालत ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि दिल्ली में नौकरी, कारोबार और अन्य कारणों से लोग अक्सर कुछ समय के लिए बाहर चले जाते हैं। हो सकता है कि गणना फॉर्म बांटे जाने के दौरान कोई व्यक्ति अपने पते पर मौजूद न रहा हो और फॉर्म भरने की समयसीमा समाप्त होने तक वापस न लौटा हो।
सीजेआई ने कहा कि ऐसे व्यक्ति को स्थायी रूप से स्थानांतरित मान लेना भी सही नहीं हो सकता। इसी तरह केवल फॉर्म नहीं भर पाने के कारण उसका नाम मतदाता सूची से बाहर रह जाना भी गंभीर सवाल पैदा करता है। जस्टिस बागची ने कहा कि चुनाव आयोग ने जिन श्रेणियों में लोगों को रखा है, उनमें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट मतदाता शामिल हैं। लेकिन ऐसे लोगों के लिए भी एक अलग श्रेणी की जरूरत हो सकती है, जिन्हें गणना फॉर्म मिला ही नहीं या जो किसी कारण से उसे भर नहीं सके। अदालत ने सुझाव दिया कि ऐसे मतदाताओं से यह घोषणा ली जा सकती है कि वे गणना फॉर्म क्यों नहीं भर पाए। इसके बाद उनके मामले पर विचार किया जा सकता है।

फॉर्म 8 का मौका क्यों नहीं दिया?

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने चुनाव आयोग से पूछा कि मतदाता के नाम की पुष्टि के लिए किस सूची को आधार बनाया जा रहा है- 2003 की मतदाता सूची को या SIR से पहले की नवीनतम सूची को? चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू ने जवाब दिया कि SIR से पहले की नवीनतम यानी 2026 की मतदाता सूची को आधार बनाया जाएगा।
इस जवाब के बाद अदालत ने समस्या की ओर ध्यान दिलाया। जस्टिस बागची ने कहा कि यदि 2026 की सूची आधार है और किसी व्यक्ति का नाम उसी सूची में था, लेकिन गणना फॉर्म उस तक नहीं पहुंचा तो उसे नए मतदाता के रूप में आवेदन करने के लिए कहना तर्कसंगत नहीं लगता। उन्होंने कहा कि यदि आयोग 2003 की सूची को ही आधार बनाता तो नई जाँच और दस्तावेजों की मांग को समझा जा सकता था। लेकिन जब 2026 की सूची को आधार माना जा रहा है तो पहले से दर्ज मतदाताओं के मामले में उनके पते में बदलाव और गणना फॉर्म नहीं भर पाने की परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए।

अदालत ने यह भी कहा कि फॉर्म 6, फॉर्म 7 और फॉर्म 8 निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत इस्तेमाल किए जाने वाले फॉर्म हैं। हालाँकि, SIR की विशेष प्रक्रिया में चुनाव आयोग ऐसी परिस्थितियों के लिए अतिरिक्त घोषणा या अलग व्यवस्था पर विचार कर सकता है।

47 लाख ने गणना फॉर्म नहीं भरा

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने गणना फॉर्म बांटने की प्रक्रिया के आंकड़ों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली में करीब 1.45 करोड़ मतदाता थे। आयोग ने लगभग 30 जून से गणना फॉर्म बांटने की प्रक्रिया शुरू की। करीब डेढ़ महीने में 1.45 करोड़ लोगों तक फॉर्म पहुंचाने का प्रयास किया गया। इनमें से लगभग 97 लाख लोगों ने फॉर्म भरकर जवाब दिया, जबकि करीब 47 लाख लोगों के फॉर्म नहीं मिले। अदालत ने सवाल किया कि इन 47 लाख लोगों के जवाब नहीं देने को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट जैसी श्रेणियों में दर्ज कर दिया गया, लेकिन क्या इनमें ऐसे लोग भी हो सकते हैं जिन तक फॉर्म पहुंचा ही नहीं?
जस्टिस बागची ने कहा कि कोई व्यक्ति एक महीने के लिए दिल्ली से बाहर गया हो और उसके लौटने तक फॉर्म भरने की समयसीमा समाप्त हो गई हो तो उसे स्थायी रूप से स्थानांतरित नहीं कहा जा सकता। अदालत के मुताबिक ऐसे मामलों के लिए अलग श्रेणी बनाना जरूरी हो सकता है, ताकि फॉर्म नहीं भर पाने वाले लोगों को अपना पक्ष रखने का मौका मिल सके।

'फॉर्म नहीं भरने से मताधिकार खत्म हो जाएगा?'

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने मतदान के अधिकार के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने चुनाव आयोग से पूछा कि यदि कोई व्यक्ति किसी वजह से गणना फॉर्म नहीं भर पाया तो क्या उसे हमेशा के लिए मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार से वंचित कर दिया जाना चाहिए? उन्होंने कहा कि मतदान का अधिकार अहम है और किसी व्यक्ति के फॉर्म नहीं भर पाने की वजह को समझे बिना उसके मामले को बंद नहीं किया जाना चाहिए।
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अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा कि यदि कोई व्यक्ति बाद में सामने आकर अपने दस्तावेज पेश करता है और कहता है कि वह पहले से मतदाता था तो उसे फॉर्म 6 भरने के लिए क्यों कहा जाए? जस्टिस बागची ने अपने उदाहरण का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का किसी निर्वाचन क्षेत्र में मौजूद न होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसने उस क्षेत्र से अपना संबंध समाप्त कर लिया है। इस पर चुनाव आयोग के वकील नायडू ने कहा कि आयोग ऐसे लोगों के लिए एक अलग फॉर्म या व्यवस्था पर विचार करने को तैयार है। उन्होंने यह भी कहा कि आयोग इस व्यवस्था को फॉर्म 6 नहीं कहेगा।

समयसीमा बढ़ाने पर विचार करेगा ECI

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग हटाए गए मतदाताओं की सूची प्रकाशित करे और ऐसे लोगों से संपर्क करने की कोशिश करे। उन्होंने कहा कि सूची में यह स्पष्ट किया जा सकता है कि पहले किन लोगों के नाम मतदाता सूची में थे, लेकिन गणना फॉर्म नहीं मिल पाने या अन्य कारणों से वे ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं हो पाए। इसके बाद उन्हें अपने निकटतम बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ से संपर्क करने के लिए कहा जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश ने चुनाव आयोग से प्रक्रिया में जल्दबाजी न करने की भी अपील की, क्योंकि दिल्ली में निकट भविष्य में चुनाव नहीं होने वाले हैं। चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि आयोग इन सुझावों पर चर्चा करेगा और समयसीमा बढ़ाने पर भी विचार किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि आयोग लोगों को फॉर्म 6 और फॉर्म 8 जमा करने के लिए प्रोत्साहित करता रहेगा।
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दो सप्ताह बाद फिर होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने मामले को दो सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की बात कही। अदालत का जोर इस बात पर रहा कि SIR के दौरान छूट गए लोगों और पहले से मतदाता सूची में शामिल रहे लोगों के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे वे अपना नाम दोबारा शामिल कराने का अवसर पा सकें। फिलहाल अदालत ने चुनाव आयोग के सामने सवाल और सुझाव रखे हैं।