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दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा: एक राजनीतिक स्टंट?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मचल रहे हैं कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा चाहिए- ठीक उसी तरह जैसे कोई बच्चा मचलता है मुझे चाँद चाहिए। वह फिर से उस हथियार को इस्तेमाल करने पर उतारू हो गए हैं जो उनके राजनीति में आने का एक ज़रिया बना। पहली मार्च से वह दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए भूख हड़ताल पर बैठने वाले हैं। पूर्ण राज्य तो संसद को देना है और वर्तमान लोकसभा का कार्यकाल समाप्ति की ओर है। उसका अब कोई अधिवेशन होना नहीं है। दिल्ली के उपराज्यपाल से पूर्ण राज्य मिलना नहीं है और राष्ट्रपति भी बिना संविधान संशोधन के दिल्ली को राज्य का दर्जा नहीं दे सकते। केजरीवाल को ख़ुद पता है कि यह तो एक चुनावी मुद्दा है और इसे भुनाने के लिए ही वह भूख हड़ताल कर रहे हैं। भूख हड़ताल करके वह जनता के मन में इस मुद्दे को ज़िंदा करना चाहते हैं और यह जताना चाहते हैं कि दिल्ली की हर समस्या का हल पूर्ण राज्य का दर्जा ही है।

ऐसा नहीं है कि केजरीवाल से पहले दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे पर बात नहीं हुई। अगर इतिहास के पन्नों को खंगालें तो संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का समर्थन नहीं किया था।

आम्बेडकर ने चार बातों पर ज़ोर दिया था- दिल्ली भारत की राजधानी होगी, इसके क़ानून संसद बनाएगी, यहाँ फ़ेडरल यानी केंद्र सरकार का शासन होगा, स्थानीय प्रशासन के लिए व्यवस्था की जा सकती है लेकिन वह भारत के राष्ट्रपति के अधीन होगी। जब भारत आज़ाद हुआ था तो बहुत-से शहरों को भी राज्य मान लिया गया था। जहाँ रजवाड़े थे, रियासतें थीं। वे भी राज्य ही कहलाते थे। दिल्ली के अलावा कूच बिहार, भोपाल, अजमेर, कुर्ग वगैरह उन्हीं में से थे। इन्हें ‘सी’ कैटेगरी का राज्य माना जाता था। ऐसे छोटे राज्यों की तरह दिल्ली में भी चौ. ब्रह्मप्रकाश को मुख्यमंत्री बना दिया गया था। 

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विधानसभा कब बनी?

1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट आई तो फिर इन छोटे-छोटे राज्यों का अस्तित्व ख़त्म हो गया। दिल्ली में भी चीफ़ कमिश्नर की नियुक्ति हुई और वही प्रशासन चलाने लगे। 1957 में दिल्ली नगर निगम के ज़रिए लोकल प्रशासन चलता रहा। 1966 में दिल्ली में महानगर परिषद का गठन हुआ। एक साल के लिए मीर मुश्ताक़ अहमद मुख्य कार्यकारी पार्षद बने जो मुख्यमंत्री का विकल्प कहे जाते थे। चुनावों के बाद विजय कुमार मल्होत्रा, कँवर लाल गुप्ता, राधारमण और जगप्रवेश चंद्र दिल्ली के मुख्य कार्यकारी पार्षद रहे। 1987 में राजीव गाँधी ने दिल्ली को नया प्रशासनिक ढाँचा देने के लिए सरकारिया कमेटी का गठन किया जो बाद में बालाकृष्णन कमेटी कहलायी। उसी की रिपोर्ट के आधार पर 1993 में दिल्ली को विधानसभा मिली।

सवाल यह है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल सकता है या नहीं। आख़िर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने में क्या रुकावटें हैं और आख़िर क्यों नहीं दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया।

दुनिया की दूसरी राजधानियों में कैसी व्यवस्था?

भारत गणतांत्रिक देश है यानी बहुत-से राज्यों का एक फ़ेडरल स्वरूप। दुनिया में भारत के अलावा जिन और फ़ेडरल देशों का मॉडल देखा गया तो यह पाया गया कि कहीं भी देश की राजधानी को राज्य का दर्जा हासिल नहीं है। मसलन वाशिंगटन डीसी का पूरा नाम देखें तो डीसी का मतलब है डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया यानी यह कोलंबिया का एक ज़िला है और इस पर कोलंबिया की राज्य सरकार का नहीं, बल्कि अमेरिकी सरकार का ही पूरा नियंत्रण है। उसे राज्य का दर्जा हासिल नहीं है। यही हाल ऑस्ट्रेलिया की राजधानी केनबरा या कनाडा की राजधानी ओटावा का है। इन तीनों ही शहरों में क़ानून बनाने का अधिकार देश की सरकार को है, लोकल प्रशासन को नहीं।

दिल्ली का मामला पेचीदा क्यों?

दिल्ली में इसी व्यवस्था को बरकरार रखा गया जो संविधान की मूल भावना में भी लिखा गया था। इसीलिए दिल्ली में पुलिस और ज़मीन का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। 4 जुलाई, 2018 को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने केंद्र और राज्य के अधिकारों को पूरी तरह परिभाषित कर दिया और उस समय केजरीवाल सरकार काफ़ी संतुष्ट भी थी और इसे दिल्ली की जनता की ज़बरदस्त जीत भी बताया था लेकिन 14 फ़रवरी को जब सुप्रीम कोर्ट ने दो बड़े अधिकार केंद्र के पास रखने का स्पष्टीकरण दिया तो केजरीवाल को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। अब सीसीटीवी लगाने, मोहल्ला क्लीनिक और डोर स्टेप डिलीवरी जैसी आम आदमी सरकार की बड़ी योजनाओं के लिए कोई रुकावट नहीं है। 

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला क्या?

दरअसल, 14 फ़रवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एंटी-करप्शन ब्यूरो यानी एबीसी को केंद्र सरकार के पास ही रखने का फ़ैसला दिया है और यह भी कहा है कि कमीशन ऑफ़ इंक्वायरी गठित करने का अधिकार दिल्ली सरकार के पास नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला इसलिए दिया है कि एंटी-करप्शन ब्यूरो तो असल में दिल्ली पुलिस का ही एक विभाग है जैसे क्राइम अगेंस्ट वूमेन या साइबर क्राइम सेल वगैरह हैं। दिल्ली पुलिस केंद्र के अधीन है। आख़िर दिल्ली पुलिस के किसी एक हिस्से को दिल्ली सरकार को कैसे दिया जा सकता है। कमीशन ऑफ़ इंक्वायरी वही सरकार गठित कर सकती है जिसे वहाँ क़ानून बनाने का अधिकार है।

  • दिल्ली के बारे में क़ानून बनाने का अधिकार केंद्र के पास है। जहाँ तक अफ़सरों की ट्रांसफ़र-पोस्टिंग का सवाल है तो यह मुद्दा बड़ी बेंच के पास रेफ़र कर दिया गया है।
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कांग्रेस और बीजेपी का एक जैसा विरोध

यह तो केजरीवाल भी मान रहे हैं कि उन्होंने इस मुद्दे को इस वक्त इसलिए उठाया है कि लोकसभा के चुनाव आने वाले हैं और वह इसका राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं। मगर, अब तक इस माँग का समर्थन करने वाले कांग्रेस और बीजेपी इस बार इस माँग के विरोध में खड़े हुए हैं। यह चौंकाने वाला ज़रूर है क्योंकि अब तक जितनी बार भी दिल्ली में लोकसभा या विधानसभा के चुनाव हुए, कांग्रेस और बीजेपी पूर्ण राज्य के दर्जे के पक्ष में खड़े नज़र आए। बीजेपी और कांग्रेस के 20 साल के राज में कई बार विधानसभा से पूर्ण राज्य के समर्थन में संकल्प भी पारित हुए। 

केंद्र में जब लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री थे तो उन्होंने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का बिल भी पेश किया था लेकिन वह ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इसी तरह कांग्रेस की तरफ़ से प्रणब मुखर्जी ने भी कोशिश की लेकिन वह भी कामयाब नहीं हो सकी।

नौकरशाही क्यों कर रहा है विरोध?

सच्चाई यह है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के बारे में दिल्ली की नौकरशाही और राजनीतिज्ञों में इससे पहले हमेशा मतभेद रहे हैं। दिल्ली की नौकरशाही कभी भी इस पक्ष में नहीं रही कि दिल्ली पूर्ण राज्य हो, जबकि अब से पहले तक बीजेपी और कांग्रेस पूर्ण राज्य के पक्ष में नज़र आते थे। अब हालात क्यों बदले हैं, इसकी भी एक ख़ास वजह है। वजह यह है कि 2013 से पहले तक दिल्ली में 15 साल तक कांग्रेस की और उससे पहले 5 साल तक बीजेपी की सरकार थी। केंद्र में भी कभी बीजेपी और कभी कांग्रेस सत्ता में रहे।

कांग्रेस-बीजेपी धुर-विरोधी हैं पर टकराव नहीं हुआ

एक-दूसरे के धुर-विरोधी होने के बावजूद उनमें कभी टकराव नहीं हुआ। शीला दीक्षित सरकार के जमाने में एक बार पाँच सीनियर आईएएस अफ़सरों का तबादला कर दिया गया था। शीला दीक्षित गृहमंत्री आडवाणी के पास गईं और उस फ़ैसले को छह माह के लिए टलवा आईं। राजनीतिक मतभेद होते हुए भी उनमें कोई टकराव नहीं था। 1993 में जब दिल्ली में विधानसभा बनी थी तो उसके ट्रांजेक्शन रूल वरिष्ठ अधिकारी एस.के. शर्मा ने बनाए थे जो दिल्ली विधानसभा के सचिव भी रहे। 

  • वह बताते हैं कि तब केंद्र की कांग्रेस सरकार ने दिल्ली की बीजेपी सरकार को पूर्ण राज्य की तरह ही अधिकार दे दिए थे यानी वे चाहें तो डीडीए और दिल्ली पुलिस के अफ़सरों को विधानसभा में तलब कर सकते हैं जबकि पुलिस और ज़मीन दिल्ली सरकार के अधीन नहीं थी। 

अनिल बैजल ने क्यों बदला फ़ैसला

केजरीवाल के राज में उपराज्यपाल अनिल बैजल ने इसलिए ये अधिकार वापस ले लिए कि केजरीवाल सरकार दिन-रात उपराज्यपाल से टकराव करते हैं। विधानसभा के बजट अधिवेशन में उपराज्यपाल ने अभिभाषण पढ़ा तो उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया कह रहे हैं कि उप-राज्यपाल ने मजबूरी में यह अभिभाषण पढ़ा है वरना वह तो दिल्ली सरकार की सारी योजनाएँ रोकते रहे हैं। यही नहीं, उन्होंने यह भी कह दिया कि उप-राज्यपाल के राजनिवास से ट्रांसफर-पोस्टिंग की इंडस्ट्री चल रही है। 

नौकरशाही इसलिए आशंकित

यही नहीं, जब 2013 में 49 दिन के लिए आप सरकार आई तो उसने केंद्रीय मंत्रियों के ख़िलाफ़ एसीबी में एफ़आईआर दर्ज कराने की धमकी दे डाली थी। नौकरशाही इसीलिए तो दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का विरोध करती रही है। उसे आशंका है कि अगर दिल्ली और केंद्र में अलग-अलग विचारधाराओं की सरकारें आ गईं और ऐसे में दिल्ली सरकार ने दिल्ली पुलिस को प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ ही मुक़दमा दर्ज करने का आदेश दे दिया तो क्या होगा? या फिर दिल्ली सरकार किसी विदेशी राजनयिक को दिल्ली में न आने का फरमान जारी कर सकती है या फिर कह सकती है कि हम केंद्र की किसी योजना के लिए ज़मीन देने के लिए तैयार नहीं हैं। 

  • अब यही तर्क बीजेपी और कांग्रेस के पास है। उनका कहना है कि केजरीवाल के बर्ताव से यह साबित हो जाता है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देना ठीक नहीं है।
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ऐसा लगता है कि केजरीवाल लोकसभा चुनावों के लिए दिल्ली में एजेंडा सेट करना चाहते हैं। 2017 में जब नगर निगम चुनाव हुए थे तो बीजेपी ने बड़ी चालाकी से उन चुनावों का मुद्दा दिल्ली सरकार के कामकाज को बना दिया था। तभी शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट भी आई जिसने दिल्ली सरकार के कामकाज पर कई सवालिया निशान लगा दिए थे। बीजेपी ने तब केजरीवाल सरकार को नाकामयाब बताते हुए आक्रामक प्रचार किया और आप हार गई। इस बार केजरीवाल बंदूक का रुख़ बीजेपी की ओर करने की तैयारी कर रहे हैं और उन्होंने इसके लिए पूर्ण राज्य के दर्जे को मुद्दा बना लिया है।

किसे कितना होगा फ़ायदा-नुक़सान?

वैसे, यह काफ़ी जोखिम भरा क़दम भी है। दिल्ली में अगर यह मुद्दा लोगों को समझ में नहीं आया तो फिर यह बैकफ़ायर भी कर सकता है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए यह एक निर्णायक क़दम है। यह सभी को पता है कि आम आदमी पार्टी के बहुत-से वादे अधूरे हैं। 500 नए स्कूल नहीं खुले और 20 डिग्री कॉलेज नहीं बने हैं, अस्पतालों में 30 हज़ार अतिरिक्त बिस्तरों की व्यवस्था नहीं हुई है, नौ सौ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोलने हैं, दो लाख सार्वजनिक शौचालय बनाने हैं, दूषित पानी को यमुना में जाने से रोकने के लिये सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने हैं, दिल्ली का अपना पावर स्टेशन बनाना है, और सारी दिल्ली में फ्री वाई-फाई उपलब्ध करानी है, दस हज़ार डीटीसी बसें ख़रीदनी हैं। इन सभी के लिए पूर्ण राज्य के दर्जे की ज़रूरत नहीं है। विपक्ष भी इन वादों की याद दिलाएगा। वास्तव में केजरीवाल ने भूख हड़ताल की घोषणा करके चुनावी बिगुल बजा दिया है और देखना यह है कि कौन किसे पछाड़ता है।

दिलबर गोठी
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