जामिया प्रशासन ने संविधान मंजूरी के 15 दिनों में छात्र संघ चुनाव कराने का आदेश दिया है, लेकिन प्रदर्शनकारी छात्र इस पर नहीं माने। छात्रों ने VC को पत्र लिखकर कहा है कि यूनियन चुनाव की तारीख तय करें, माफी मांगने की शर्त हटाएं और निष्कासन के मुद्दे को सुलटाएँ।
जामिया में छात्रों का प्रोटेस्ट
छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दबाव के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया प्रशासन ने भले ही छात्र संघ चुनाव कराने का आदेश जारी किया है, लेकिन यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव को लेकर जारी विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है। प्रदर्शनकारी छात्रों ने इसे अपनी मांगों का पूरा समाधान मानने से इनकार कर दिया है। छात्रों का कहना है कि चुनाव की तारीख तय करने से पहले छात्र संघ के संविधान को मंजूरी देने की समयसीमा साफ़ की जाए, निष्कासित और कैंपस में प्रवेश से रोके गए छात्रों को राहत दी जाए और सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की शर्त हटाई जाए। पांच छात्र 12 अक्टूबर से भूख हड़ताल पर हैं, जिनमें से दो ने विरोध जारी रखने की बात कही है।
करीब दो सप्ताह से चल रहे विरोध प्रदर्शन के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने सोमवार को छात्र संघ चुनाव कराने का आदेश जारी किया। लेकिन प्रदर्शनकारी छात्रों के एक समूह ने कुलपति मजहर आसिफ को पत्र लिखकर आदेश में बदलाव करने की मांग की है। छात्रों का कहना है कि प्रशासन ने चुनाव कराने की बात तो कही है, लेकिन चुनाव कब होंगे, इसका साफ़ कार्यक्रम नहीं दिया है। इसके अलावा, आंदोलन के दौरान निलंबित किए गए या विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश से रोके गए छात्रों और निष्कासित विद्यार्थियों के मामलों पर भी आदेश में स्पष्ट आश्वासन नहीं है।
छात्रों को इस बात पर भी आपत्ति है कि आदेश में प्रशासन के खिलाफ कथित तौर पर मानहानिकारक बयान, कार्रवाई या सोशल मीडिया पोस्ट के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की शर्त रखी गई है। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर साफ़ फ़ैसला नहीं होता है तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
प्रशासन ने क्या आदेश जारी किया?
जामिया प्रशासन ने सोमवार सुबह आदेश जारी कर कहा कि छात्र संघ के संविधान को मंजूरी मिलने की तारीख से 15 दिनों में चुनाव कराए जाएंगे। आदेश के मुताबिक़ चुनाव कराने की प्रक्रिया छात्र संघ के संविधान की मंजूरी के बाद आगे बढ़ेगी। लेकिन छात्रों का कहना है कि संविधान को कब तक तैयार और मंजूर किया जाएगा, इस बारे में कोई निश्चित समयसीमा नहीं दी गई है। यही इस पूरे विवाद का प्रमुख मुद्दा बन गया है।प्रशासन ने आदेश में दो अन्य आश्वासन भी दिए हैं। आंदोलन के दौरान जारी किए गए निलंबन और कारण बताओ नोटिस वापस लिए जाएंगे। प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा कर्मचारियों की कार्रवाई की जांच के लिए एक समिति बनाई जाएगी। छात्रों का कहना है कि ये क़दम पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि आंदोलन से जुड़े सभी छात्रों के ख़िलाफ़ हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई को वापस लेने और चुनाव प्रक्रिया का स्पष्ट कार्यक्रम घोषित करने की उनकी मांगें अभी पूरी नहीं हुई हैं।
VC को पत्र लिखकर छात्रों ने क्या मांग की?
प्रदर्शनकारी छात्रों ने कुलपति मजहर आसिफ को पत्र लिखकर आदेश में बदलाव की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगें तीन मुद्दों पर केंद्रित हैं। छात्र संघ के संविधान की मंजूरी की तारीख तय हो। छात्र चाहते हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन लिखित रूप में आश्वासन दे कि छात्र संघ का संविधान 20 दिसंबर तक तैयार करके मंजूर कर दिया जाएगा। इसके बाद 15 दिनों के भीतर चुनाव की अधिसूचना जारी की जाए। उनका तर्क है कि जब तक संविधान को मंजूरी देने की अंतिम तारीख तय नहीं होगी, तब तक चुनाव की घोषणा अनिश्चित बनी रहेगी।दूसरी मांग है कि निष्कासित और कैंपस में प्रवेश से रोके गए छात्रों को राहत मिले। छात्रों का कहना है कि प्रशासन के आदेश में निलंबन और कारण बताओ नोटिस का ज़िक्र है, लेकिन उन विद्यार्थियों के बारे में स्पष्ट बात नहीं कही गई है जिन्हें परिसर में आने से रोक दिया गया है या जिन्हें निष्कासित किया गया है।
प्रदर्शनकारी छात्र चाहते हैं कि आंदोलन से संबंधित सभी अनुशासनात्मक कार्रवाइयाँ वापस ली जाएं। इसमें निलंबन, कारण बताओ नोटिस, कैंपस में प्रवेश पर रोक और निष्कासन जैसी कार्रवाइयां शामिल हैं।
तीसरी मांग है कि सार्वजनिक माफी की शर्त हटाई जाए। छात्रों को आदेश में दर्ज उस शर्त पर आपत्ति है, जिसके तहत आंदोलन के दौरान प्रशासन के खिलाफ कथित मानहानिकारक बयानों, कार्रवाइयों या सोशल मीडिया पोस्ट के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सार्वजनिक रूप से माफी मांगने का आश्वासन दर्ज किया गया है। प्रदर्शनकारी छात्र इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध करना उनका संवैधानिक अधिकार है और इसके लिए उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा, छात्रों ने विश्वविद्यालय के मुख्य सुरक्षा सलाहकार के इस्तीफे की मांग भी की है।
भूख हड़ताल पर बैठे छात्र बोले- आंदोलन जारी रहेगा
जामिया में छात्र संघ चुनाव की बहाली को लेकर चल रहा आंदोलन भूख हड़ताल तक पहुंच चुका है। पांच छात्र 12 अक्टूबर से भूख हड़ताल पर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भूख हड़ताल पर बैठे पांच छात्रों में से दो ने प्रशासन के आदेश में स्पष्टता नहीं होने के कारण हड़ताल जारी रखने की बात कही है।भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों में शामिल एबिन बेसिल ने कहा कि प्रशासन के आदेश में निलंबन और कारण बताओ नोटिस का उल्लेख तो है, लेकिन उन छात्रों के बारे में कुछ स्पष्ट नहीं है जिन्हें कैंपस में प्रवेश से रोक दिया गया है या निष्कासित किया गया है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों को भी कैंपस में प्रवेश से रोके जाने और निष्कासन का सामना करना पड़ा है। वहीं, आंदोलन के आयोजकों में शामिल लुबैब बशीर ने कहा कि छात्र तब तक विरोध जारी रखेंगे, जब तक प्रशासन संविधान तैयार करने और चुनाव की घोषणा करने की समयसीमा तय नहीं करता और उनकी बाकी मांगों पर भी फैसला नहीं लेता। उन्होंने सार्वजनिक माफी की शर्त पर आपत्ति जताते हुए कहा कि छात्र अपने संवैधानिक अधिकार के तहत शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं, इसलिए वे इसके लिए माफी नहीं मांगेंगे।
2006 से भंग है जामिया का छात्र संघ
जामिया में मौजूदा आंदोलन का मुख्य उद्देश्य विश्वविद्यालय में छात्र संघ को फिर से बहाल करना है। जामिया मिलिया इस्लामिया स्टूडेंट्स यूनियन यानी JMISU वर्ष 2006 से भंग है। इस तरह करीब दो दशक से विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव नहीं हुए हैं। छात्रों का कहना है कि छात्र संघ की बहाली से विद्यार्थियों को अपनी समस्याएं उठाने और विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने सामूहिक रूप से अपनी बात रखने के लिए एक औपचारिक मंच मिलेगा।इस आंदोलन को हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हुए विरोध प्रदर्शन से भी गति मिली। वहां लंबे समय तक चली भूख हड़ताल के बाद प्रशासन छात्र संघ चुनाव कराने पर सहमत हुआ था। इसके बाद जामिया के छात्रों ने भी अपने विश्वविद्यालय में छात्र संघ की बहाली और चुनाव कराने की मांग तेज कर दी।
21 अक्टूबर को संविधान बनाने के लिए बनी थी समिति
जामिया प्रशासन ने 21 अक्टूबर को छात्र संघ का संविधान तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित करने की अधिसूचना जारी की थी। इस समिति की अध्यक्षता सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन प्रोफेसर जुबैर मीनाई कर रहे हैं। समिति में प्रोफेसर लुकमान अहमद खान, प्रोफेसर असलम खान, प्रोफेसर एम. अमरजीत सिंह और छात्र कल्याण विभाग की डीन प्रोफेसर नीलोफर अफजल शामिल हैं। नीलोफर अफजल को समिति का सदस्य-संयोजक बनाया गया है।समिति को जामिया मिलिया इस्लामिया अधिनियम, 1988 के अनुच्छेद 23(J) और 23(K) के तहत छात्र संघ का संविधान तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है। समिति को कई अहम मुद्दों पर विचार करना है। इनमें वर्ष 2006 में छात्र संघ को भंग किए जाने की परिस्थितियों की जांच, छात्र संघ से संबंधित अदालतों के फैसलों का अध्ययन, लिंगदोह समिति की सिफारिशों पर विचार, छात्र संघ के संविधान के लिए विभिन्न पक्षों, विशेष रूप से छात्रों से परामर्श करना और संविधान का मसौदा तैयार करके 20 दिसंबर तक सौंपना शामिल हैं।
छात्रों का कहना है कि समिति को मसौदा तैयार करने की समयसीमा देना पर्याप्त नहीं है। प्रशासन को यह भी साफ़ करना चाहिए कि संविधान को अंतिम मंजूरी कब तक मिलेगी। उनके मुताबिक़ संविधान की मंजूरी के लिए निश्चित तारीख़ तय नहीं होने से चुनाव प्रक्रिया आगे खिसक सकती है।
जल्दबाजी में नहीं बन सकता संविधान: प्रशासन
विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े एक अधिकारी ने कहा कि छात्र संघ का संविधान तैयार करते समय कानूनी और नियामक नियमों का ध्यान रखना जरूरी है। इसमें लिंगदोह समिति की सिफारिशें, अदालतों के आदेश और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के लागू नियम शामिल हैं। अधिकारी के मुताबिक, छात्र संघ करीब 20 वर्षों से निष्क्रिय है। इस दौरान छात्र राजनीति और छात्र संघों को नियंत्रित करने वाले नियमों में बदलाव हुए हैं। इसलिए संविधान तैयार करने की प्रक्रिया को जल्दबाजी में पूरा नहीं किया जा सकता है।
हालांकि, छात्रों की आपत्ति इस प्रक्रिया के खिलाफ नहीं, बल्कि संविधान की मंजूरी के लिए निश्चित समयसीमा नहीं होने को लेकर है। वे चाहते हैं कि प्रशासन एक तय कार्यक्रम घोषित करे, ताकि चुनाव अनिश्चितकाल तक टलने की आशंका न रहे। फिलहाल छात्र संघ चुनाव कराने के आदेश के बावजूद विरोध जारी है। आंदोलनकारी छात्र अपनी मांगों पर लिखित आश्वासन मिलने तक पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में जामिया में छात्र संघ की बहाली और चुनाव की प्रक्रिया के साथ-साथ छात्रों और प्रशासन के बीच जारी गतिरोध पर भी नजर रहेगी।