गोवा सरकार की कैबिनेट ने पिछले हफ़्ते 'गोवा गैर-कानूनी धर्मांतरण निषेध विधेयक 2026' को मंज़ूरी दी थी और इस प्रस्तावित कानून को मानसून सत्र के दौरान पेश किया जाना था। लेकिन बीजेपी विधायकों ने ही इसका विरोध शुरू कर दिया।
गोवा सरकार ने प्रस्तावित एंटी-कनवर्जन बिल को फिलहाल राज्य विधानसभा के मौजूदा मानसून सत्र में पेश नहीं करने का फ़ैसला किया है। यह निर्णय तब लिया गया जब बीजेपी के कई विधायकों और सरकार का समर्थन कर रहे एक निर्दलीय विधायक ने भी इस विधेयक पर आपत्ति जताई। पार्टी के भीतर से बढ़ते विरोध के बाद मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने विधायकों के साथ बैठक की, जिसमें सहमति बनी कि बिल को अभी विधानसभा में पेश नहीं किया जाएगा। गोवा से इतर बीजेपी सरकारें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात जैसे राज्यों में ऐसा क़ानून आक्रामक तरीक़े से बना चुकी हैं जबकि उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में संशोधन कर क़ानून को सख़्त बनाया गया है। लेकिन गोवा में ऐसा करने से बीजेपी सरकार को पीछे हटना पड़ा।
गोवा सरकार की कैबिनेट ने पिछले सप्ताह एंटी-कनवर्जन बिल 'गोवा गैर-कानूनी धर्मांतरण निषेध विधेयक, 2026' को मंजूरी दी थी। सरकार की योजना थी कि इस विधेयक को तीन दिन के मानसून सत्र के दौरान विधानसभा में पेश किया जाए। लेकिन जैसे ही बिल की जानकारी सामने आई, विपक्ष के साथ-साथ सत्तारूढ़ बीजेपी के कुछ विधायक भी इसके खिलाफ खुलकर सामने आ गए।
मुख्यमंत्री ने बुलाई विधायकों की बैठक
विधानसभा की कार्यवाही शुरू होने से पहले मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कई विधायकों के साथ सोमवार सुबह बैठक की। इस बैठक में बीजेपी के कुछ विधायक और सरकार का समर्थन कर रहे निर्दलीय विधायक एलेक्सियो रेजिनाल्डो लॉरेंको भी शामिल हुए। बैठक में विधेयक की जरूरत, इसके प्रावधानों और संभावित प्रभावों पर चर्चा हुई। बैठक के बाद यह फैसला लिया गया कि फिलहाल इस विधेयक को विधानसभा में पेश नहीं किया जाएगा और पहले इसके सभी पहलुओं का विस्तार से अध्ययन किया जाएगा।
कैलंगुट विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले बीजेपी के वरिष्ठ विधायक माइकल लोबो ने कहा कि सरकार ने इस बिल को मंजूरी देने में जल्दबाजी की। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि पहले इस विधेयक का अच्छी तरह अध्ययन किया जाना चाहिए और सभी पक्षों को विश्वास में लेना ज़रूरी है। उनके अनुसार, हर व्यक्ति की धार्मिक आस्था अहम है और सभी धर्मों का सम्मान होना चाहिए।बीजेपी विधायक लोबो ने कहा कि गोवा के हित में क्या सही है, इस पर पूरी चर्चा की ज़रूरत है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मौजूदा तरीके से आगे बढ़ना सही नहीं है।
निर्दलीय विधायक ने भी जताई आपत्ति
सरकार का समर्थन कर रहे निर्दलीय विधायक एलेक्सियो रेजिनाल्डो लॉरेंको ने भी इस विधेयक का विरोध किया। उन्होंने कहा कि बैठक में आम सहमति बनी कि बिल को इस सत्र में पेश नहीं किया जाएगा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब गोवा में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के मामले सामने नहीं आए हैं तो ऐसे कानून की ज़रूरत क्यों है।
लॉरेंको ने कहा कि उनके अनुसार राज्य में धार्मिक सौहार्द बना हुआ है और लोग वर्षों से शांतिपूर्ण माहौल में साथ रहते आए हैं। ऐसे में इस तरह का क़ानून लाकर उस माहौल को बिगाड़ने की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार का समर्थन करने के बावजूद इस विधेयक को उनका समर्थन नहीं है। लॉरेंको का कहना है कि जिन कुछ मामलों में पुलिस ने धर्मांतरण से जुड़े अपराध दर्ज किए भी हैं, उनमें कई मामलों में अदालतों ने कार्रवाई रद्द कर दी या जाँच एजेंसियों ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। उन्होंने यह भी कहा कि गोवा में धार्मिक अल्पसंख्यक संगठनों द्वारा गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद की जाती है। उनके अनुसार ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि इन सामाजिक सेवाओं के ज़रिए लोगों का धर्मांतरण कराया जा रहा है।
बिल में क्या थे प्रमुख प्रावधान?
कैबिनेट से मंजूर किए गए मसौदा विधेयक में अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए कई सख्त प्रावधान प्रस्तावित किए गए थे। प्रस्तावित कानून के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बल, दबाव, प्रलोभन, धोखाधड़ी, अनुचित प्रभाव या विवाह के माध्यम से धर्मांतरण कराता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।
बिल में अवैध धर्मांतरण कराने पर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। दोषी पर कम से कम 50 हजार रुपये का जुर्माना है। पीड़ित को अधिकतम 5 लाख रुपये तक मुआवजा देने का प्रावधान है। जो व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म बदलना चाहता है, उसे 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट या अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के सामने लिखित घोषणा देनी होगी कि वह बिना किसी दबाव के स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन कर रहा है। बिल में यह भी प्रावधान है कि यदि यह साबित हो जाए कि किसी विवाह का उद्देश्य केवल धर्मांतरण कराना था, तो ऐसे विवाह को अवैध घोषित किया जा सकता है। पुजारी, कर्मकांडी, मौलवी, मुल्ला या अन्य धार्मिक व्यक्तियों पर भी कार्रवाई का प्रावधान था। दोषी पाए जाने पर उन्हें कम से कम तीन वर्ष और अधिकतम दस वर्ष तक की जेल हो सकती थी।
विपक्ष और चर्च ने किया विरोध
प्रस्तावित विधेयक का विपक्षी दलों, नागरिक समाज संगठनों और गोवा के कैथोलिक चर्च ने भी कड़ा विरोध किया। सामाजिक न्याय एवं शांति परिषद और कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ गोवा ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि यह कानून संवैधानिक धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। संगठनों का कहना है कि इस तरह का कानून लोगों के बीच आपसी विश्वास को कमजोर करेगा और समाज में संदेह तथा डर का माहौल पैदा कर सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि धर्मांतरण रोकने के नाम पर सरकार लोगों की व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं, अंतरधार्मिक विवाहों, प्रार्थना सभाओं और धार्मिक गतिविधियों पर निगरानी रखने का रास्ता खोल सकती है।
उनका यह भी कहना है कि गोवा की पहचान हमेशा धार्मिक सौहार्द और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की रही है, इसलिए दूसरे राज्यों की तरह विवादित कानून यहां लागू करने की जरूरत नहीं है।
बीजेपी के भीतर विरोध और विपक्ष के दबाव के बाद गोवा सरकार ने फिलहाल इस विधेयक को विधानसभा में पेश करने का फैसला टाल दिया है। अब सरकार पहले विधेयक का विस्तृत अध्ययन करेगी और सभी पक्षों से चर्चा के बाद ही आगे का निर्णय ले सकती है। इस घटनाक्रम से साफ़ है कि एंटी-कनवर्जन बिल को लेकर केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल के भीतर भी अलग-अलग राय सामने आई है। ऐसे में इस कानून का भविष्य फिलहाल अनिश्चित बना हुआ है।