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प्रतीकात्मक तसवीर

गुजरात: अस्पताल में रिश्तेदारों का दर्द, मरते मरीज़ को हाथ से पंपिंग से दी हवा!

अस्पताल में इतनी अव्यवस्था हो कि वेंटिलेटर वाले मरीज़ को हाथ से पंपिंग कर हवा देनी पड़े और इस बीच उसकी मौत हो जाए, तो क्या कहा जाए? कोविड वार्ड में मरीज़ का डायपर तीमारदार बदलें और जब उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी जाए तो 4 दिन तक डायपर बदला ही नहीं जाए। मौत होने पर शव सौंपा जाए तो उस अव्यवस्था का पता चले। ऐसी जगहों पर कोरोना मरीज़ों का इलाज कैसा चल रहा होगा?

यह हाल गुजरात के अस्पतालों का है। इनमें से एक अस्पताल तो अहमदाबाद सिविल अस्पताल है जिसे गुजरात हाई कोर्ट ने हाल ही में हॉस्पिटल की अव्यवस्था और बड़ी संख्या में कोरोना मरीज़ों की मौत पर 'काल कोठरी से बदतर' कहा है।

इन्हीं अस्पतालों में भर्ती रहे मरीज़ों के परिजनों ने ऐसे अनुभव साझा किए हैं जो हॉस्पिटल में ऐसी अव्यवस्थाओं की पोल खोलते हैं। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार कंटेनमेंट ज़ोन घोषित दानी लिंबा निवासी हार्दिक वलेरा की 81 वर्षीय दादी नानीबेन को अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल में मंगलवार शाम को भर्ती कराया गया था। रात में ढाई बजे वेंटिलेटर पर रखा गया। वलेरा ने अख़बार से कहा, 'बुधवार सुबह डॉक्टर ने उन्हें तीसरी मंजिल के वार्ड में शिफ़्ट करना चाहा, लेकिन स्टाफ़ की कमी के कारण वेंटिलेटर के साथ शिफ़्ट करने से उन्होंने इनकार कर दिया। उन्होंने मुझे एक बैग दिया और कहा कि हाथ से पंपिंग कर हवा देते रहना। जब हम तीसरी मंजिल पर पहुँचे तो डॉक्टरों ने कहा कि उनकी मौत हो गई है।'

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वलेरा ने आरोप लगाया कि 'वह पूरी रात इमरजेंसी रूम थीं लेकिन कोई जाँच नहीं की गई और वार्ड में शिफ़्ट करने की माँग की तो उन्होंने कुछ नहीं किया। उन्होंने कहा कि बेड खाली नहीं है और उन्हें इंतज़ार करना पड़ेगा'। स्पेशल ड्यूटी पर अधिकारी यानी ओएसडी डॉ. एमएम प्रभाकर ने अख़बार से कहा, 'हमने उनका सैंपल इसलिए नहीं भेजा क्योंकि हमारी पहली प्राथमिकता मरीज़ की ज़िंदगी बचाने की थी।' उन्होंने यह माना कि जो मरीज़ सिविल हॉस्पिटल लाए जा रहे हैं उन्हें कोरोना मरीज़ ही माना जा रहा है। 

बुधवार को ही एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक मरीज़ नज़मा बीबी की नाक में लगी ट्युब में ख़ून बहता दिख रहा था और तब कथित तौर पर उनकी मौत हो चुकी थी। उस वीडियो में दिख रहा है कि प्रोटेक्टिव सूट पहने एक व्यक्ति डॉक्टर को भला-बुरा कह रहा है और पूछ रहा है कि उसे क्यों नहीं बताया गया कि उसकी माँ को वेंटिलेटर पर रखा गया है। डॉक्टर को कहते सुना जा सकता है कि उन्हें आईसीयू में आने की अनुमति नहीं है और उन्हें यह जानकारी कंट्रोल रूम से माँगनी चाहिए। 

'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, इस मामले में ओएसडी प्रभाकर ने कहा, 'मरीज कोविड-19 पॉजिटिव, डायबिटिक था और ब्लड थिनर पर था। 24 मई को उसकी मृत्यु हो गई। सबसे पहले, रिश्तेदार ने सुरक्षा को धता बताते हुए अवैध रूप से वार्ड में घुसा। हमारे पास एक दिन में 100 रोगी आ रहे हैं, सभी गंभीर स्थिति में हैं और ऐसे कुछ मामले हो सकते हैं जहाँ रिश्तेदार को सूचित नहीं किया गया हो। एडमिशन के समय उपचार के लिए आवश्यक उपाय करने देने के लिए परिवार की सहमति ली जाती है।'

ऐसा ही मामला वड़ोदरा के गुजरात मेडिकल एजुकेशन और रिसर्च सोसायटी यानी जीएमईआरएस से भी मंगलवार को आया। 78 साल के एक कोविड-19 मरीज़ की मौत हो गई।
उनकी मौत से चार दिन पहले अस्पताल ने उनके पोते को अस्पताल में जाने की अनुमति दी थी ताकि वह अपने दादा शमशुद्दीन शेख का डायपर बदल सकें। मरीज़ की पोती अफसाना ने कहा, ' 19 मई को जब उनको हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था तो वे उठ-बैठ रहे थे, खा रहे थे, बात कर रहे थे। एक दिन बाद उन्होंने बताया कि उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है। हमें आश्चर्य हुआ क्योंकि उनकी हालत इतनी गंभीर नहीं थी।' उन्होंने आगे कहा, 'हमने उन्हें व्यक्तिगत देखभाल के लिए एक स्टाफ़ नियुक्त करने के लिए कहा और हम भुगतान करने के लिए तैयार थे लेकिन ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी। हम सैनिटेशन कर्मचारियों की उदासीनता के बारे में अन्य रोगियों से बातें सुन रहे थे। बार-बार अनुरोध के बाद पीठासीन चिकित्सक ने मेरे भाई को 23 मई को पीपीई सूट पहनकर अंदर जाने की अनुमति दी।'
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उन्होंने कहा कि जब उनका निधन हो गया तो शव को देखने के लिए मेरा भाई गया तो उसने देखा कि वह उसी डायपर में थे जो उन्होंने चार दिन पहले बदला था। उन्होंने कहा, 'ऐसी स्थिति में एक मरीज़ मानसिक रूप से भी कैसे आराम महसूस कर सकता है? वे व्यक्तिगत ज़रूरतों के लिए दिन में एक बार के लिए रिश्तेदारों को अंदर जाने की अनुमति क्यों नहीं दे सकते। यह जोखिम भरा है लेकिन हम अपने प्रियजनों को इस तरह नहीं देख सकते।'

'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार जीएमईआरएस के पीठासीन चिकित्सक ने पुष्टि की कि मंगलवार को गुजरने वाले रोगी के परिजन को एक बार डायपर बदलने के लिए जाने की अनुमति दी गई थी। लेकिन उन्होंने स्वच्छता कार्यकर्ताओं के मुद्दे पर बोलने से इनकार कर दिया।

बार-बार शिकायत आने के बाद ओएसडी विनोद राव ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि अगर स्वच्छता कर्मचारी अपना काम करने से इनकार करते हैं, तो महामारी अधिनियम के तहत उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराएँ।
भले ही हॉस्पिटल के अधिकारी सफ़ाई में कुछ भी कहें, लेकिन हाई कोर्ट ने जो कहा वह भी एक हक़ीक़त ही है। कोरोना से जुड़ी कई जनहित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए पिछले हफ़्ते जस्टिस जे. बी. परडीवाला और जस्टिस इलेश वोरा के खंडपीठ ने राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं की तुलना ‘डूबते हुए टाइटनिक जहाज़’ से की थी। इसने कहा था, ‘यह बहुत ही परेशान करने वाला और दुखद है कि आज की स्थिति में अहमदाबाद के सिविल अस्पताल की स्थिति बहुत ही दयनीय है, अस्पताल रोग के इलाज के लिए होता है, पर ऐसा लगता है कि आज की तारीख़ में यह काल कोठरी जैसी है, शायद उससे भी बदतर है।’

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