दुष्कर्म के दोषी गुरमीत राम रहीम को 40 दिन की पैरोल दी गई। यह उनकी जेल से 15वीं रिहाई है। दुष्कर्म और हत्या जैसे जघन्य अपराध के दोषी आख़िर बार-बार जेल से बाहर कैसे आ रहे हैं? बिना ट्रायल वाले उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत भी नहीं?
गुरमीत राम रहीम, उमर खालिद
एक तरफ बलात्कार और हत्या के दोषी डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को बार-बार पैरोल मिल रही है और दूसरी तरफ छात्र एक्टिविस्ट उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य पिछले पांच साल से ज्यादा समय से जेल में बंद हैं, बिना किसी मुकदमे के शुरू हुए। ऐसा क्यों है?
इस सवाल का जवाब ढूंढने से पहले राम रहीम के पूरे मामले को समझ लें। दुष्कर्म के दोषी गुरमीत राम रहीम सिंह को एक बार फिर 40 दिन की पैरोल मिल गई है। वे हरियाणा के रोहतक में सुनारिया जेल में बंद हैं और पैरोल के दौरान सिरसा जिले में अपने डेरे के मुख्यालय में रहेंगे। यह 2017 में दोषी ठहराए जाने के बाद उनकी 15वीं अस्थायी रिहाई है। 2021 के बाद हर साल उनको क़रीब 90 दिन की पैरोल मिल रही है और अब तक वह 350 से ज़्यादा दिन जेल से बाहर रहे हैं। उनको लगातार मिल रही ऐसी छूट पर बीजेपी सरकार पर सवाल उठते रहे हैं।
यह चौथी बार है जब पैरोल पर वे सिरसा डेरा जा रहे हैं। पहले की कई पैरोल या फरलो में वे उत्तर प्रदेश के बागपत में डेरे के आश्रम में रहते थे। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम को आखिरी बार अगस्त 2025 में 40 दिन की पैरोल मिली थी। उससे पहले अप्रैल में 21 दिन का फरलो और जनवरी में 30 दिन की पैरोल मिली थी, जो दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक पहले थी।
पैरोल और फरलो में फर्क
फरलो किसी खास वजह के बिना दिया जा सकता है, अगर कैदी ने जेल में कुछ समय गुजारा हो। पैरोल किसी जरूरी वजह से मिलती है। राम रहीम को ज्यादातर पैरोल मिली हैं।2017 में सीबीआई कोर्ट ने राम रहीम को अपनी दो महिला अनुयायियों से बलात्कार के लिए 20 साल की सजा सुनाई थी। यह घटना सिरसा डेरे में हुई थी। 2021 में उन्हें एक पत्रकार राम चंदर छत्रपति की हत्या के मामले में उम्र कैद की सजा मिली थी।
इन दोनों फ़ैसलों को राम रहीम ने कोर्ट में चुनौती दे रखी है। इसके अलावा डेरा के मैनेजर रणजीत सिंह की हत्या के एक अन्य मामले में सजा हुई थी, लेकिन मई 2024 में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने उन्हें इस मामले में बरी कर दिया।
पैरोल पर हाईकोर्ट के फैसले
फरवरी 2024 में हाईकोर्ट ने कहा था कि राम रहीम को पैरोल बिना कोर्ट की इजाजत के नहीं दी जा सकती। यह उस समय कहा गया जब उन्हें 50 दिन की पैरोल मिली थी। लेकिन अगस्त 2024 में हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल या फरलो की अर्जी हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्परेरी रिलीज) एक्ट 2022 के तहत बिना पक्षपात के तय की जाए। फैसला जेल विभाग पर छोड़ दिया गया।पैरोल पर विवाद क्यों?
राम रहीम की बार-बार पैरोल का शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी यानी एसजीपीसी जैसे सिख संगठनों ने विरोध किया है। वे कहते हैं कि दोषी व्यक्ति को इतनी बार रिहाई देना गलत है। कई लोग इसे राजनीतिक बताते हैं, क्योंकि डेरा सच्चा सौदा के लाखों अनुयायी हरियाणा, पंजाब और अन्य राज्यों में हैं और चुनाव में असर डाल सकते हैं।
हरियाणा सरकार कहती है कि पैरोल कानून के तहत दी गई है और कोई विशेष सुविधा नहीं है। रविवार को भी जब पत्रकारों ने राज्य के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से सवाल किया तो उन्होंने जवाब में इतना ही कहा कि पैरोल देना कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में है।
उमर खालिद की कहानी: बिना ट्रायल लंबी कैद
दूसरी तरफ़, उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य की कहानी बिलकुल अलग है। उमर एक छात्र एक्टिविस्ट और जेएनयू के पूर्व छात्र हैं। उन्हें सितंबर 2020 में दिल्ली पुलिस ने 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े एक बड़े साजिश के मामले में गिरफ्तार किया था। उन पर यूएपीए के तहत आरोप हैं, जो आतंकवाद से जुड़े मामलों में लगाया जाता है। आरोप है कि उन्होंने दंगों की साजिश रची, लेकिन उमर इसे झूठा बताते हैं और कहते हैं कि वे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।
उमर को गिरफ्तार हुए अब 5 साल 4 महीने हो चुके हैं और अभी तक उनका मुकदमा चला नहीं है। वे दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं। कई बार जमानत की अर्जी दी गई, लेकिन ट्रायल कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। दिसंबर 2025 में उन्हें बहन की शादी के लिए सिर्फ कुछ दिनों की अंतरिम जमानत मिली थी, लेकिन उसके बाद फिर जेल लौटना पड़ा।अब 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा और अन्य आरोपियों की जमानत याचिका पर फैसला सुनाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में इस पर सुनवाई की थी और फैसला सुरक्षित रख लिया था। उमर के समर्थक कहते हैं कि बिना सबूत और ट्रायल के इतने साल जेल में रखना गलत है।
दोनों मामलों में अंतर क्यों?
ये दोनों मामले न्याय व्यवस्था की दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाते हैं। राम रहीम जैसे गंभीर अपराधी को बार-बार पैरोल मिल रही है, जबकि उमर खालिद जैसे एक्टिविस्ट को ज़मानत भी नहीं मिल रही। जानकार कहते हैं कि यूएपीए जैसे सख्त कानूनों में ज़मान मिलना मुश्किल होता है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा जुड़ा होता है। लेकिन राम रहीम के मामले में पैरोल आसानी से मिल जाती है, क्योंकि यह अच्छे व्यवहार पर आधारित होती है। हालाँकि, कई संगठन और लोग कहते हैं कि यह राजनीतिक प्रभाव का नतीजा है। राम रहीम के डेरे का बड़ा प्रभाव है, जबकि उमर जैसे एक्टिविस्ट सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलते हैं।