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करगिल के शहीद सौरभ कालिया को कब मिलेगा इंसाफ़?

करगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान की क्रूरता के शिकार हुए हिमाचल प्रदेश के वीर योद्धा कैप्टन सौरभ कालिया को याद करते ही आँखें नम हो जाती हैं और दुश्मन देश की क्रूरता पर ख़ून भी खौलता है। लेकिन बीस साल के लंबे इंतजार के बाद भी इस बहादुर योद्धा को इंसाफ़ नहीं मिल पाया है।

कांगड़ा जिले के वीर सपूत शहीद सौरभ कालिया के पिता डॉक्टर एन.के. कालिया अपने बेटे से हुए अमानवीय बर्ताव के लिए पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहते हैं। है। वह इस लड़ाई को मरते दम तक लड़ना चाहते हैं। ताकि उनके बेटे को इंसाफ़ मिले और भारतीय सेना का सम्मान बहाल हो। 

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में रह रहे डॉक्टर कालिया कहते हैं कि उन्हें आज तक इंसाफ़ नहीं मिला। यह तो एक शहीद की शहादत का अपमान है। करगिल के शहीदों के लिए दो मापदंड नहीं होने चाहिए। वह कहते हैं कि उनके बेटे के साथ जो किया गया, वह साफ़ तौर पर जेनेवा समझौते का उल्लंघन है, परंतु भारत सरकार ने पाकिस्तान के समक्ष इस मामले को उठाने में संवेदनहीनता बरती। उन्होंने कहा, यह एक महत्वपूर्ण मसला है और यदि सरकार चाहे, तो वह इस मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में ले जा सकती है। डॉक्टर कालिया कहते हैं कि जब तक सांसें चलती रहेंगी, वह इस मुद्दे को उठाते रहेंगे। यह भारतीय सेना के मान-सम्मान का सवाल है।
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पंजाब के अमृतसर में 29 जून 1976 को जन्मे कैप्टन सौरभ कालिया की माँ का नाम विद्या है। सौरभ ने कांगड़ा जिले के पालमपुर में डीएवी स्कूल  व पालमपुर एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के बाद 1997 में सेना में कमीशन हासिल किया। अपनी छोटी सी उम्र में उन्होंने अपने अदम्य साहस व वीरता का परिचय देकर नया इतिहास रचा।

22 वर्षीय सौरभ भारतीय सेना की 4 जाट रेजीमेंट के अधिकारी थे। उन्होंने ही सबसे पहले करगिल में पाकिस्तानी सेना के नापाक इरादों की जानकारी सेना को मुहैया कराई थी। करगिल में अपनी तैनाती के बाद सौरभ कालिया 5 मई 1999 को अपने पाँच साथियों अर्जुन राम, भंवर लाल, भीखाराम, मूलाराम, नरेश के साथ लद्दाख की बजरंग पोस्ट पर पेट्रोलिंग कर रहे थे, तभी पाकिस्तानी सेना ने सौरभ कालिया को उनके साथियों सहित बंदी बना लिया। क़रीब  22 दिनों तक सभी को पाकिस्तानी सेना ने बंदी बनाकर रखा और अमानवीय यातनाएँ दीं। उनके शरीर को गर्म सरिये और सिगरेट से दागा गया। आँखें फोड़ दी गईं और निजी अंग काट दिए गए। पाकिस्तान ने इन शहीदों के शव 7 जून 1999 को भारत को सौंपे थे।

सौरभ के परिवार ने भारत सरकार से इस मामले को पाकिस्तान सरकार के सामने और इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में उठाने की माँग की थी। दरअसल, किसी युद्धबंदी की नृशंस हत्या करना जेनेवा संधि व भारत-पाक के बीच हुए द्विपक्षीय शिमला समझौते का भी उल्लंघन है। भारत ने पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा अपने बहादुर जवानों को बंदी बनाए जाने के एक दिन बाद 14 मई 1999 को उन्हें मिसिंग घोषित किया था। यह मामला तब प्रकाश में आया जब एक पाकिस्तानी सैनिक ने ऐसी नृशंसता की बात को स्वीकार किया था। 

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शहीद सौरभ कालिया के पिता डॉक्टर एन.के. कालिया।
भीषण यातना सहने के बाद जान गंवाने वाले देश के इस सपूत के परिवार को अपने ही देश से न्याय का इंतज़ार है। यह उस जवान का परिवार है, जिसने अपनी जवानी और जिंदगानी महज इसलिए लुटा दी थी कि हमारा जीवन बेफिक्र रहे और ख़ुशियों से भरा रहे। 
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विडंबना का विषय है कि कैप्टन सौरभ कालिया की शहादत शायद देश भुला चुका है। यही वजह है कि अपने बेटे के लिए इंसाफ़ माँग रहे बुजुर्ग माता-पिता दर-दर भटक रहे हैं। ठोस प्रमाण के बावजूद सरकार आज तक शांत है और यह दु:ख की बात है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने विपक्ष में रहते हुए इस मुद्दे को उठाया है, लेकिन सत्ता में रहने पर उनकी राजनीति व कार्यनीति में अंतर साफ नजर आता है। हैरानी की बात तो यह है कि सौरभ कालिया का नाम सीमा पर जान गंवाने वाले शहीदों की सूची में भी शामिल नहीं है।

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लेकिन सवाल यह उठता है कि वह पिता जो इस जंग में अकेला है, आख़िर किससे लड़ रहा है? इस देश की न्यायपालिका से या फिर अपनी सरकार से? या हमसे, जो इस सिस्टम से थककर गूंगे और बहरे हो चुके हैं? जाधव के मामले में सरकार अंतरराष्टरीय न्यायालय में जा सकती है तो सौरभ कालिया के मामले में क्यों नहीं।

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