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39 महिला सेना अधिकारियों को मिला स्थायी कमीशन

लंबी क़ानूनी लड़ाई के बाद 39 महिला सेना अधिकारियों को आख़िरकार स्थायी कमीशन मिल ही गया। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा था कि सात कार्य दिवसों के दौरान उन्हें नयी सेवा का पद दिया जाए। कुल 71 महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारी स्थायी कमीशन की मांग के लिए सुप्रीम कोर्ट गई थीं। पहले उन्हें स्थायी कमीशन से वंचित कर दिया गया था।

केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि 71 अधिकारियों में से 39 को स्थायी कमीशन के लिए योग्य पाया गया। इसने कहा है कि सात अधिकारी चिकित्सकीय रूप से अनुपयुक्त थे और 25 के साथ अनुशासन का मसला है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को एक विस्तृत रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है कि 25 स्थायी कमीशन के लिए पात्र क्यों नहीं हैं।

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बता दें कि स्थायी कमीशन का मतलब सेना में सेवानिवृत्ति तक करियर है, जबकि शॉर्ट सर्विस कमीशन 10 साल के लिए है। शॉर्ट सर्विस कमीशन में 10 साल के अंत में स्थायी कमीशन छोड़ने या चुनने का विकल्प होता है। यदि किसी अधिकारी को स्थायी कमीशन नहीं मिलता है तो अधिकारी चार साल का विस्तार चुन सकता है।

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने 1 अक्टूबर को सरकार से कहा था कि वह किसी भी अधिकारी को सेवा से मुक्त न करे। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की दो-न्यायाधीशों की पीठ मामले की सुनवाई कर रही थी। 

महिला अधिकारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने अदालत को बताया था कि उनकी अयोग्यता मार्च में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ थी, जब उसने भारतीय सेना को मानदंडों को पूरा करने वाली सभी महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने का निर्देश दिया था। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए सरकार को तीन महीने का समय दिया गया था।

इससे पहले मार्च महीने में एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया था कि सेना में सबसे उँचे पद यानी सेना की कमान महिलाओं के हाथ देने में कितना पक्षपात होता रहा है।

कोर्ट ने तब कहा था कि सेना में पर्मानेंट कमीशन पाने के लिए महिलाओं के लिए मेडिकल फिटनेस का जो नियम है वह 'मनमाना' और 'तर्कहीन' है। इसने कहा था कि ये नियम महिलाओं के प्रति पक्षपात करते हैं। तब सुप्रीम कोर्ट सेना में पर्मानेंट कमीशन को लेकर क़रीब 80 महिला अधिकारियों द्वारा दायर याचिकाओं पर फ़ैसला सुना रहा था। कोर्ट ने कहा था कि हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि समाज का जो ढाँचा है वह पुरुषों द्वारा और पुरुषों के लिए तैयार किया गया है। 

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सेना की चयनात्मक वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट मूल्यांकन और चिकित्सा फिटनेस मानदंड देर से लागू होने से महिला अधिकारियों के ख़िलाफ़ भेदभाव होता है। अदालत ने कहा था, 'मूल्यांकन के पैटर्न से एसएससी (शॉर्ट सर्विस कमीशन) महिला अधिकारियों को आर्थिक और मनोवैज्ञानिक नुक़सान होता है।'

बता दें कि इससे पहले पिछले साल फ़रवरी में सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारियों के लिए बड़ा फ़ैसला सुनाया था। सेना में सबसे उँचे पद यानी सेना की कमान महिलाओं के हाथ देने के ख़िलाफ़ सरकार जो तर्क देती रही थी उसे सुप्रीम कोर्ट ने तब एक झटके में खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि पुरुष अफ़सर की तरह ही महिला अफ़सर सेना की कमान संभाल सकती हैं। यानी सीधे-सीधे कहें तो यह कहा गया था कि महिला अफ़सर कर्नल रैंक से ऊँचे पदों पर अपनी योग्यता के दम पर जा सकती हैं। 

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