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बिना आरक्षण कैसे कर दी 9 संयुक्त सचिवों की नियुक्ति?

सरकारी नौकरियों में आरक्षण को कैसे ख़त्म किया जा सकता है, इसकी मिसाल देखनी है तो केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव के 9 पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया को देखिए। यदि इससे साफ़-साफ़ पता नहीं चले तो पहले कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग यानी डीओपीटी और फिर संघ लोकसेवा आयोग यानी यूपीएससी की प्रतिक्रिया को पढ़ें। संयुक्त सचिव के 9 पदों पर नियुक्तियों के मामले में यूपीएससी ने तो साफ़ शब्दों में कहा है कि डीओपीटी ने कहा था कि इस भर्ती मामले में कोई आरक्षण नहीं होगा।

यह ख़बर इस लिहाज़ से काफ़ी अहम हो जाती है कि सरकार प्रवेश स्तर पर ही सिविल सेवाओं के बाहर से लोगों को नौकरी पर रखने की महत्वाकांक्षी योजना बना रही है। इसी बीच एक आरटीआई से मिली जानकारी से पता चला है कि इस साल अप्रैल में संयुक्त सचिव स्तर पर निजी क्षेत्र से प्रतिभाओं को शामिल करने के दौरान कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने एक ऐसी प्रक्रिया अपनाई जिससे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को आरक्षण देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। डीओपीटी के सामने आरटीआई दायर की गई थी और इसने जो जवाब दिया है उसी आधार पर अंग्रेज़ी अख़बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने इस पर एक रिपोर्ट छापी है।

यह आरटीआई संयुक्त सचिव रैंक वाले नौ पदों पर नियुक्ति के मामले में दायर की गई थी। इसमें आरक्षण, आरक्षित वर्ग से संबंधित उम्मीदवारों के बारे में सवाल किए गए थे। बता दें कि संयुक्त सचिव रैंक वाले नौ उम्मीदवारों- अम्बर दुबे, राजीव सक्सेना, सुजीत कुमार बाजपेयी, दिनेश दयानंद जगदाले, काकोली घोष, भूषण कुमार, अरुण गोयल, सौरभ मिश्रा और सुमन प्रसाद सिंह के नाम को अप्रैल में यूपीएससी द्वारा मंजूरी दे दी गई थी। इनके जल्द ही ज्वाइन करने की संभावना है।

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इन नियुक्तियों में क्यों नहीं मिला आरक्षण?

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, डीओपीटी ने आरटीआई के तहत जो जानकारी दी है इसमें बताया गया है कि ‘एक पद होने पर आरक्षण लागू नहीं होता है। चूँकि इस योजना के तहत भरा जाने वाला प्रत्येक पद एकल पद है, इसलिए आरक्षण लागू नहीं है।’ उन्हें विभिन्न विभागों के लिए चुना जाता है और यदि उन्हें नौ के समूह के रूप में माना जाता तो ओबीसी के लिए कम से कम दो सीटें और एससी उम्मीदवार के लिए एक सीट आरक्षित होती।

यह साफ़ तौर पर इशारा करता है कि जिस भर्ती में आरक्षण नहीं देना हो वहाँ पर ऐसी व्यवस्था लागू कर दी जाए तो नियम-क़ानून के दायरे से चुपके से बच निकला जा सकता है। क्या दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के साथ यह अन्याय नहीं है? कब सामाजिक असमानता का दौर ख़त्म होगा? इसे दूर करने के लिए ही दलितों, आदिवासियों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की बात संविधान में की गई है। लेकिन ऐसा लगता है कि देश में ऐसी व्यवस्था बन गई है कि तमाम कोशिशों के बाद भी उनको पूरा आरक्षण नहीं मिल पाता। इससे बचने के भी रास्ते निकाल लिए गए। डीओपीटी की ओर से दिया गया जवाब भी इसी ओर इशारा करता है।

डीओपीटी ने क्या दिया है जवाब?

रिपोर्ट में कहा गया है कि डीओपीटी की अतिरिक्त सचिव सुजाता चतुर्वेदी द्वारा 29 नवंबर, 2018 को संघ लोक सेवा आयोग के सचिव राकेश गुप्ता को भेजे गए पत्र के अनुसार, चयन प्रक्रिया में कहा गया था, ‘राज्य सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र, स्वायत्त संस्थाओं, वैधानिक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों के उम्मीदवारों पर विचार किया जाएगा। उन्हें अपने मूल विभाग में कार्यभार के साथ प्रतिनियुक्ति (अल्पकालिक अनुबंध सहित) पर लिया जाएगा। प्रतिनियुक्ति पर नियुक्ति के लिए अनिवार्य आरक्षण निर्धारित करने के कोई निर्देश नहीं हैं।’

इस पत्र में उल्लेख किया गया है, ‘इन पदों को भरने की वर्तमान व्यवस्था को प्रतिनियुक्ति के काफ़ी क़रीब समझा जा सकता है, जहाँ एससी, एसटी, ओबीसी के लिए अनिवार्य आरक्षण ज़रूरी नहीं है। हालाँकि, यदि विधिवत एससी, एसटी, ओबीसी के उम्मीदवार योग्य हैं, तो उन पर विचार किया जाना चाहिए और समग्र प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए इसी तरह के मामलों में ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जा सकती है।’

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यूपीएससी का साफ़ जवाब

हालाँकि, यूपीएससी की प्रतिक्रिया अधिक स्पष्ट है। इन पदों के लिए विभिन्न सामाजिक श्रेणियों के कितने उम्मीदवारों का चयन किया गया है, इस सवाल पर यूपीएससी ने कहा, ‘कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग की आवश्यकता के अनुसार, अनुबंध के आधार पर संयुक्त सचिव स्तर के पदों के लिए उम्मीदवारों का चयन किया जाना था। डीओपीटी ने साफ़ किया था कि इस भर्ती मामले में कोई आरक्षण नहीं होगा।’

अलग-अलग सामाजिक वर्गों से कितने उम्मीदवारों ने आवेदन किया था, इस सवाल के जवाब में यूपीएससी ने कहा, ‘कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग की आवश्यकता के अनुसार, संयुक्त सचिव के कोई पद किसी भी श्रेणी यानी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित नहीं थे।  इसलिए आपके द्वारा माँगा गया श्रेणीवार डाटा नहीं दिया जा सकता है।’

डीओपीटी का नियम- आरक्षण होना चाहिए

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, हालाँकि, डीओपीटी ने 15 मई 2018 को एक परिपत्र में ज़िक्र किया था कि ‘केंद्र सरकार के पदों और सेवाओं के लिए नियुक्तियों के संबंध में एससी, एसटी और ओबीसी के उम्मीदवारों के लिए 45 दिनों या उससे अधिक के लिए होने वाली अस्थायी नियुक्तियों में आरक्षण होगा।’

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