चुनावी चंदे को लेकर ADR ने चौंकाने वाली रिपोर्ट दी है। बीजेपी को मिला चंदा अन्य सभी राष्ट्रीय दलों के कुल चंदे से 10 गुना अधिक है। जानिए किस पार्टी को कितना फंड मिला और इसके राजनीतिक मायने क्या हैं।
चुनावी चंदे पर एडीआर की रिपोर्ट
बीजेपी को मिलने वाले चुनावी चंदे में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। इतना कि बाक़ी सभी राष्ट्रीय दलों को जोड़ने के बाद भी इनसे दस गुना ज़्यादा। यानी चुनावी बॉन्ड बंद होने के बाद भी बीजेपी का कोई मुक़ाबला नहीं है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी एडीआर की नई रिपोर्ट के अनुसार अकेले बीजेपी को वित्तीय वर्ष 2024-25 में 6074 करोड़ रुपये से ज्यादा चंदा मिला। इससे पिछले वित्त वर्ष में 2243 करोड़ रुपये मिले थे।
एडीआर की रिपोर्ट गुरुवार को जारी की गई। रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय दलों को 20 हज़ार रुपये से ऊपर के कुल 6648.563 करोड़ रुपये के चंदे मिले। इसमें से 6074 करोड़ तो अकेले बीजेपी के हैं। पीटीआई ने रिपोर्ट दी है कि कांग्रेस, आप, सीपीआई-एम, नेशनल पीपल्स पार्टी जैसे राष्ट्रीय दलों के कुल चंदे से 10 गुना से भी ज्यादा है। कुल 11343 डोनेशन थे। जिसमें से 5522 डोनेशन बीजेपी को मिले।
कांग्रेस को 2501 डोनेशन से 517.394 करोड़ रुपये मिले। अन्य दलों में आम आदमी पार्टी को 27.044 करोड़ रुपये मिले। नेशनल पीपुल्स पार्टी यानी एनपीईपी को 1.943 करोड़ रुपये मिले। बहुजन समाज पार्टी ने 19 साल से लगातार यह घोषणा की है कि उसे 20 हज़ार रुपये से ऊपर का कोई चंदा नहीं मिला। इस बार भी बीएसपी ने शून्य चंदा बताया है।
पिछले साल की तुलना में कितना बढ़ा चंदा?
राष्ट्रीय दलों को कुल चंदे में 161 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई। पिछले वित्तीय वर्ष यानी 2023-24 की तुलना में 4104.285 करोड़ रुपये ज्यादा चंदा आया।
बीजेपी के चंदे में 171 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। बीजेपी को पिछले साल 2243.947 करोड़ मिले थे, लेकिन इस बार बढ़कर यह 6074 करोड़ रुपये हो गया।
कांग्रेस के चंदे में 84 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। पिछले वित्त वर्ष में कांग्रेस को 281.48 करोड़ रुपये मिले थे और इस बार यह बढ़कर 517.394 करोड़ रुपये हो गया। आप के चंदे में 244 प्रतिशत की तेज बढ़ोतरी हुई और इसे 27 करोड़ रुपये मिले। एनपीईपी के चंदे में 1313 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई।
कंपनियों का चंदा सबसे ज्यादा बीजेपी को
कुल चंदे में कॉर्पोरेट का हिस्सा 92.18 प्रतिशत रहा। कंपनियों ने 6128.787 करोड़ रुपये दिए। बीजेपी को 2794 कॉर्पोरेट डोनेशन से 5717.167 करोड़ रुपये मिले। यह बाकी सभी राष्ट्रीय पार्टियों को मिले कुल योगदान से 13 गुना ज़्यादा है। बाकी पार्टियों को कुल 411.62 करोड़ रुपये मिले।
व्यक्तिगत चंदा देने वालों ने कुल 505.66 करोड़ रुपये दिए। इसमें से बीजेपी को 345.94 करोड़ रुपये मिले। कांग्रेस को कंपनियों से 383.86 करोड़ रुपये और व्यक्तिगत दाताओं से 132.39 करोड़ रुपये मिले।
बड़े इलेक्टोरल ट्रस्टों का योगदान
प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट ने सबसे ज्यादा चंदा दिया। इसने बीजेपी, कांग्रेस और आप को कुल 2413.465 करोड़ रुपये दिए। इसमें से बीजेपी को 2180.7119 करोड़ रुपये मिले। यह पार्टी को मिले कुल चंदे का 35.90 प्रतिशत है। कांग्रेस को 216.335 करोड़ रुपये मिले और यह पार्टी को मिले कुल चंदे का 41.81 प्रतिशत है। आप को 16.4178 करोड़ रुपये मिले। प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट ने 834.97 करोड़ रुपये दिए। एबी जनरल इलेक्टोरल ट्रस्ट ने 621 करोड़ रुपये दिए। न्यू डेमोक्रेटिक इलेक्टोरल ट्रस्ट ने 155 करोड़ रुपये दिए।
कुछ बड़ी कंपनियों ने भी सीधे बीजेपी को चंदा दिया। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने 100 करोड़ रुपये दिए। रुंगटा संस प्राइवेट लिमिटेड ने 95 करोड़ रुपये दिए।
क्या कहती है रिपोर्ट?
एडीआर की यह रिपोर्ट राष्ट्रीय दलों द्वारा चुनाव आयोग को दिए गए ऑडिट रिपोर्ट और चंदा विवरण पर आधारित है। रिपोर्ट दिखाती है कि 2024-25 में राजनीतिक फंडिंग में काफी बढ़ोतरी हुई, जिसमें सत्तारूढ़ पार्टी का हिस्सा बेहद बड़ा रहा। कॉर्पोरेट चंदा राजनीतिक फंडिंग का मुख्य स्रोत बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे बड़े चंदे राजनीतिक पार्टियों की गतिविधियों, चुनाव प्रचार और संगठन को मजबूत बनाने में मदद करते हैं, लेकिन पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल उठते रहते हैं।दलों के मिले चंदे में इतना बड़ा अंतर क्यों?
बीजेपी केंद्र में सरकार चला रही है और कई राज्यों में भी उसकी सरकारें हैं। कंपनियां अक्सर सत्ताधारी पार्टी को ज्यादा चंदा देती हैं क्योंकि उन्हें नीतियां, लाइसेंस, टेंडर और व्यवसायिक माहौल में मदद मिलने की उम्मीद रहती है। यह आम बात है, लेकिन इस बार फर्क बहुत ज्यादा है। इतना बड़ा अंतर लोकतंत्र में समता पर सवाल उठाता है। विपक्षी दल कम फंडिंग के कारण कम प्रचार कर पाते हैं। इसके अलावा सवाल यह भी है कि अगर कंपनियाँ सत्ताधारी पार्टी को इतना ज्यादा दे रही हैं, तो क्या बदले में नीतियां उनके पक्ष में बन रही हैं? कुछ लोग इसे क्विड प्रो क्वो यानी सौदा कहते हैं।यह रिपोर्ट साफ दिखाती है कि 2024-25 में बीजेपी ने फंडिंग की दौड़ में दूसरे दलों को काफी पीछे छोड़ दिया। सत्ता, संगठन की मजबूती और कंपनियों का भरोसा, इन तीनों का मिला-जुला असर है। लेकिन लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है कि सभी पार्टियों को समान मौका मिले। अगर फंडिंग का यह फर्क बढ़ता रहा तो विपक्ष कमजोर हो सकता है, जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं।