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मोदी को पत्र लिखने वाले 49 हस्तियों पर 62 फ़िल्म वालों का पलटवार

मॉब लिन्चिंग पर प्रधानमंत्री मोदी को खुला ख़त लिखने वाले 49 हस्तियों पर फ़िल्म जगत के ही प्रसून जोशी, कंगना रनौत, विवेक अग्निहोत्री समेत 62 लोगों ने भी खुला ख़त लिखकर सीधा हमला बोला है। 49 हस्तियों ने जहाँ लिन्चिंग और ‘जय श्रीराम’ के नाम पर हो रहे हमले को रोकने का प्रधानमंत्री मोदी से आग्रह किया था वहीं 62 फ़िल्मी हस्तियों ने उन सभी पर ‘गिने-चुने मामलों में ग़ुस्सा दिखाने’, ‘झूठे नैरेटिव तैयार करने’ और ‘राजनीतिक पूर्वाग्रह रखने’ का आरोप लगाया। उन्होंने सरकार की आलोचना करने वाले 49 लोगों को लिखा, ‘...वास्तव में हम मानते हैं कि मोदी शासन में सरकार की आलोचना करने और अलग-अलग विचारों के रखने की सबसे ज़्यादा आज़ादी है। असहमति की भावना रखने की छूट इससे ज़्यादा कभी भी नहीं रही।’

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प्रधानमंत्री को मंगलवार को ख़त लिखने वालों में पुरस्कार विजेता फ़िल्म निर्माता अपर्णा सेन व मणि रत्नम और इतिहासकार रामचंद्र गुहा जैसी हस्तियाँ शामिल थीं। इन हस्तियों को ख़त लिखकर निशाना बनाने वालों में सेंसर बोर्ड ऑफ फ़िल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफ़सी) के प्रमुख प्रसून जोशी, बॉलीवुड अभिनेता कंगना रनौत, फ़िल्म निर्माता मधुर भंडारकर व विवेक अग्निहोत्री, शास्त्रीय नृत्यांगना व राज्यसभा सदस्य सोनल मानसिंह जैसी हस्तियाँ शामिल हैं।

62 हस्तियों द्वारा हस्ताक्षर किए गए ख़त में लिखा है, ‘एक खुला ख़त जो 23 जुलाई 2019 को प्रकाशित किया गया है और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को संबोधित किया गया है, चौंकाने वाला है। देश के 49 स्वयंभू 'अभिभावक और विवेक रखने वालों' ने चुनिंदा मामलों में चिंता व्यक्त की है और उन्होंने साफ़ तौर पर राजनीतिक पूर्वाग्रह दिखाया है।’

‘झूठा नैरेटिव तैयार नहीं करें’

62 लोगों ने पत्र में लिखा है कि उनका प्रयास है कि इसका पर्दाफ़ाश किया जाए कि किस तरह चुनिंदा मामलों का हवाला देते हुए झूठा नैरेटिव तैयार कर प्रधानमंत्री मोदी के अथक प्रयासों को नकारात्मक रूप में पेश करने की कोशिश की गई है। पत्र में लिखा है, ‘पिछले दिनों जब आदिवासी और हाशिए के लोग नक्सल आतंक के शिकार हो गए तब 'खुले पत्र' के हस्ताक्षरकर्ताओं ने चुप्पी साध रखी थी। वे तब भी चुप थे जब अलगाववादियों ने कश्मीर में स्कूलों को जलाने के लिए हुक्मनामा जारी किया था। जब भारत को टुकड़े करने की माँग की गई थी तब भी उन्होंने चुप्पी साध ली थी...।’ उन्होंने पत्र में ऐसे ही कई और मामलों का ज़िक्र किया है।

49 फ़िल्मी हस्तियों ने लिखा था...

खुला ख़त लिखने वाले 49 फ़िल्मी हस्तियों को शायद अपने पत्र पर कुछ ऐसी प्रतिक्रियाओं की आशंका थी, इसी कारण उन्होंने यह भी कहा था कि ‘सत्तारूढ़ दल की आलोचना का मतलब यह नहीं है कि यह राष्ट्र की आलोचना है’। उन्होंने पत्र में लिखा था, ‘हम उम्मीद करते हैं कि हमारे सुझावों को इस भावना से लिया जाएगा कि हम भारतीय के रूप में सच में चिंतित हैं।’ 

पत्र में कहा गया है कि बेहद दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि ‘जय श्री राम’ का नारा युद्धोन्माद पैदा करने वाला बन गया है और इस वजह से क़ानून व्यवस्था की स्थिति ख़राब होती जा रही है और इसके नाम पर ही कई हत्या की घटनाएँ हो चुकी हैं। 

पत्र में यह भी कहा गया है कि बिना असहमति के लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। लोगों को सिर्फ़ सरकार का विरोध करने के कारण राष्ट्रद्रोही या अर्बन नक्सल न करार दे दिया जाए या उन्हें जेल में न डाल दिया जाए। 23 जुलाई को लिखे इस पत्र में कहा गया था कि प्रधानमंत्री जी आपने तबरेज़ वाली घटना की संसद में कड़ी निंदा की थी, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। सवाल पूछा गया है कि ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई की गई है।

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लिन्चिंग की घटनाएँ बढ़ी हैं

बता दें कि हाल के दिनों में कई ऐसी घटनाएँ घटी हैं जिसमें लोगों को पीट-पीट (लिन्चिंग) कर मार डाला गया है। हाल ही में झारखंड के गुमला ज़िले में 10-12 लोगों ने काला जादू करने के शक में तीन परिवारों के चार लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।

पिछले महीने झारखंड के ही जमशेदपुर में मोटर साइकिल चोरी के शक में 24 साल के युवक तबरेज अंसारी को भीड़ ने रात भर पीटा था और बाद में उसकी मौत हो गई थी। भीड़ ने उसे ‘जय हनुमान’ का नारा लगाने के लिए भी कहा था। कुछ दिन पहले ही भीड़तंत्र के क्रूर होने की एक घटना बिहार के सारण में हुई थी। सारण जिले के बनियापुर गाँव में गाँव के लोगों ने तीन लोगों को पकड़ा था और आरोप लगाया कि ये उनके पशुओं को चोरी करने के लिए आए थे। इसके बाद ग्रामीणों ने तीनों को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया था। 

निशाने पर अधिकांश अल्पसंख्यक

वेबसाइट फ़ैक्टचेकर.इन के मुताबिक़, पिछले कुछ सालों में भीड़ प्रायोजित हिंसा की घटनाएँ बढ़ी हैं और इनमें से अधिकांश घटनाओं में निशाने पर अल्पसंख्यक रहे हैं। आँकड़ों के मुताबिक़, पिछले दशक में देश भर में ऐसी 297 घटनाएँ हुई थीं। इनमें 98 लोग मारे गए थे और 722 लोग घायल हुए थे। 2015 के बाद, पशु चोरी या पशु तस्करी को लेकर भीड़ के द्वारा हमले करने की 121 घटनाएँ हो चुकी हैं, जबकि 2012 से 2014 के बीच ऐसी कुल 6 घटनाएँ हुई थीं।

अगर 2009 से 2019 के बीच हुई ऐसी घटनाओं को देखें तो 59 फ़ीसदी मामलों में हिंसा का शिकार होने वाले मुसलिम थे और इसमें से 28% घटनाएँ पशु चोरी और पशुओं की तस्करी से संबंधित थीं। आँकड़े यह भी बताते हैं कि ऐसी 66% घटनाएँ बीजेपी शासित राज्यों में हुईं जबकि 16% घटनाएँ कांग्रेस शासित राज्यों में।

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