राहुल गांधी पर एफ़आईआर दर्ज करने का आदेश देने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज ने राहुल की ब्रिटिश नागरिकता वाले केस से खुद को अलग कर लिया है। जज ने यह फ़ैसला तब लिया जब राहुल के ख़िलाफ़ मुक़दमा करने वाले बीजेपी कार्यकर्ता ने इस मामले में जज पर आरोप लगाए, सोशल मीडिया पर हाईकोर्ट के ख़िलाफ़ पोस्टें लिखीं और मीडिया में कोर्ट की आलोचना करने वाले बयान दिए। खुद जज ने ये बातें कही हैं और बीजेपी कार्यकर्ता को फटकार लगाते हुए खुद को केस से अलग कर लिया।
राहुल गांधी के ख़िलाफ़ दोहरी नागरिकता का यह मामला भी कोर्ट में रोचक अंदाज में चला। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने पहले एफ़आईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। लेकिन बाद में उन्होंने अपने ही आदेश को संशोधित करते हुए पहले राहुल गांधी का भी पक्ष सुनने की बात कही थी। इसके बाद केस दायर करने वाले बीजेपी नेता ने पूरे फ़ैसले पर सवाल खड़े किए और जज के खिलाफ कई सोशल मीडिया पोस्टें कीं। ऐसी पोस्ट पर आपत्ति दर्ज करते हुए जस्टिस विद्यार्थी ने केस से ख़ुद को अलग करने का फ़ैसला लिया।

किसकी ग़लती से FIR का आदेश देना पड़ा था?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अप्रभावी कानूनी सहायता देने के लिए डिप्टी सॉलिसिटर जनरल की आलोचना की है। कोर्ट ने कहा कि उचित सहायता न मिलने के कारण ही उसे गांधी की बात सुने बिना ही उनके खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश देना पड़ा था।

क्या हुआ अदालत में?

जस्टिस विद्यार्थी ने सोमवार को मौखिक रूप से टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता विग्नेश शिशिर ने अदालत पर गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए सोशल मीडिया पर कंटेंट पोस्ट कीं। उन्होंने कहा कि शिशिर ने अदालत का इस्तेमाल अपने राजनीतिक फायदे के लिए किया। जज ने नाराजगी जताते हुए कहा, 'पीछे कीचड़ उछालना कैसे उचित है? अदालत के खिलाफ बोलना सही है? मीडिया में तरह-तरह के बयान कैसे दे रहे हैं... आप अदालत को अपने राजनीतिक अखाड़े का हिस्सा बना रहे हैं।'
अदालत ने यह भी कहा कि शिशिर ने सोशल मीडिया पर लोगों से पूछा कि क्या उन्हें इस बेंच के सामने केस जारी रखना चाहिए या नहीं। उन्होंने चीफ़ जस्टिस से भी हस्तक्षेप की मांग की। कोर्ट ने माना कि इन पोस्टों से अदालत पर आरोप लगाए गए और अदालत की बदनामी हुई। सरकार की ओर से पेश वकीलों और डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ने भी माना कि शिशिर के सोशल मीडिया पोस्टों का बचाव नहीं किया जा सकता।

शिशिर ने बचाव में क्या कहा?

शिशिर ने कहा कि वे जो पोस्ट कर रहे थे वो अदालत के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए थे जो उन्हें केस छोड़ने का दबाव डाल रहे थे। उन्होंने बताया कि उन्होंने अदालत के पहले के आदेश की तारीफ़ भी सोशल मीडिया पर की थी और उसे लैंडमार्क ऑर्डर कहा था।

जस्टिस विद्यार्थी ने जवाब दिया कि अदालत को किसी की तारीफ़ की ज़रूरत नहीं है। अगर शिशिर को कुछ कहना है तो वे अपील कोर्ट में जा सकते हैं। अब इस मामले का विस्तृत लिखित आदेश आने वाला है। केस अब चीफ जस्टिस द्वारा नामित किसी दूसरी बेंच के सामने जाएगा।

राहुल से जुड़ा यह पूरा विवाद क्या है?

कर्नाटक के बीजेपी कार्यकर्ता विग्नेश शिशिर ने राहुल गांधी पर आरोप लगाया था कि वे ब्रिटिश नागरिक हैं। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने 2003 में ब्रिटेन में M/S Backops Ltd. नाम की कंपनी बनाई थी। कंपनी के दस्तावेजों में उन्होंने अपनी राष्ट्रीयता ब्रिटिश बताई थी। उनके पास लंदन और हैम्पशायर के पते थे और डायरेक्टर आईडी भी थी। शिशिर का दावा है कि राहुल ने 2004 के लोकसभा चुनाव में भी इस कंपनी और अपने विदेशी बैंक अकाउंट (बार्कलेज बैंक, लंदन) का ज़िक्र किया था। बाद में कंपनी 2009 में बंद हो गई। उन्होंने राहुल गांधी पर भारतीय न्याय संहिता, पासपोर्ट एक्ट, फॉरेनर्स एक्ट और ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत FIR दर्ज करने की मांग की थी।

क्या हुआ था 17 और 18 अप्रैल को?

17 अप्रैल को जस्टिस विद्यार्थी ने खुली अदालत में मौखिक रूप से कहा कि राहुल गांधी के खिलाफ पहली नजर में गंभीर अपराध बनते दिख रहे हैं। उन्होंने यूपी सरकार को एफ़आईआर दर्ज करने या मामले को केंद्रीय एजेंसी को सौंपने का निर्देश दिया। लेकिन 18 अप्रैल को अदालत ने अपना फ़ैसला रोक लिया। कोर्ट ने कहा कि राहुल गांधी को भी सुनवाई का मौक़ा मिलना चाहिए। हाईकोर्ट के पुराने फुल बेंच फैसले का हवाला देते हुए जज ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी को सुनने का अधिकार होता है।
19 अप्रैल को अदालत ने राहुल गांधी को नोटिस जारी करने का प्रस्ताव रखा और मामले को 20 अप्रैल के लिए पोस्ट कर दिया। लेकिन सोमवार को सोशल मीडिया पोस्टों को लेकर नाराजगी के बाद जज ने खुद केस से अलग कर लिया। अब यह मामला किसी दूसरे जज के पास जाएगा।

पहले अदालत ने खारिज कर दी थी याचिका

इस मामले से पहले दिसंबर 2025 में रायबरेली की स्पेशल एमपी-एमएलए कोर्ट में राहुल के ख़िलाफ़ पहली शिकायत दर्ज कराई गई थी। बाद में इसे लखनऊ ट्रांसफर कर दिया गया। जनवरी 2026 में लखनऊ की स्पेशल कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि नागरिकता का फ़ैसला करने का अधिकार उनके पास नहीं है। इसके खिलाफ विग्नेश शिशिर हाईकोर्ट पहुंचे। 

स्वामी ने भी उठाए थे सवाल

राहुल गांधी की नागरिकता पर बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने पहले आरोप लगाया था कि राहुल गांधी के पास भारत के साथ साथ ब्रिटेन की भी दोहरी नागरिकता है। ऐसा ही आरोप बीजेपी के दूसरे कार्यकर्ता भी लगाते रहे हैं। वे आरोप लगाते रहे हैं कि 2003 में राहुल गांधी ने ब्रिटेन में एक कंपनी में डायरेक्टर के रूप में काम किया था। दावा किया जाता है कि कंपनी के रजिस्ट्रेशन या वार्षिक रिटर्न में उन्होंने खुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था।
कुछ याचिकाओं में दावा किया गया कि ब्रिटेन सरकार से दस्तावेज़ मांगे गए थे और ब्रिटेन ने भारत सरकार को कुछ रिकॉर्ड साझा किए हैं। हालांकि इसकी कभी पुष्टि नहीं हुई। अब तक इस मामले में अदालतों ने बार बार याचिकाएँ खारिज की हैं। 28 जनवरी 2026 में लखनऊ एमपी-एमएलए कोर्ट ने याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया। इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने भी पहले ऐसी पीआईएल को पिछले साल यानी 2025 में खारिज किया था।

क्या कहता है क़ानून?

भारतीय क़ानून के अनुसार कोई व्यक्ति दोहरी नागरिकता नहीं रख सकता। अगर कोई लोकसभा सदस्य विदेशी नागरिक साबित होता है तो उसकी सदस्यता रद्द हो सकती है। लेकिन अंतिम फैसला जांच और कोर्ट के बाद ही होगा। यह मामला काफी संवेदनशील है, इसलिए हाईकोर्ट ने कुछ सुनवाइयां चैंबर में की थीं।