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अमेरिका ने कश्मीर को लेकर फिर जताई चिंता, कहा - चुनाव कराओ

कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाये जाने के बाद यह मुद्दा अब भारत-पाकिस्तान के बीच से निकलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक और दुनिया भर के कई देशों तक पहुंच चुका है। कश्मीर भारत के विभाजन के बाद से ही भारत और पाकिस्तान के बीच विवादास्पद मुद्दा रहा है।

देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान की कबायली सेना ने कश्मीर पर हमला कर दिया था तो कश्मीर के महाराजा ने भारत से मदद माँगी थी। इस पर भारत ने उनसे भारत में विलय करने को कहा था तब राजा हरि सिंह मजबूरी में भारत के साथ विलय को तैयार हुए। लेकिन उन्होंने विलय की संधि में कश्मीर की स्वायत्तता की शर्त रख दी थी। यदि राजा हरि सिंह बिना किसी शर्त के विलय के तैयार हो जाते तो अनुच्छेद 370 का बखेड़ा ही खड़ा नहीं होता।

कश्मीर को लेकर पाकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ तीन बार जंग छेड़ चुका है और तीनों ही बार उसे क़रारी हार मिली है। 1971 के युद्ध में तो भारत ने पाकिस्तानी सेना को इस्लामाबाद तक खदेड़ दिया था। लेकिन जब से भारत ने अनुच्छेद 370 को हटाया है तभी से एक बार फिर यह मुद्दा लगातार चर्चा में है। कश्मीर के हालात पर विदेशी मीडिया भी लगातार ख़बरें कर रहा है और अमेरिका ने पिछले एक महीने में इस पर लगातार बयान दिये है। 

समझ नहीं आता कि अमेरिका क्यों बार-बार इस मुद्दे पर बात करता है, बावजूद इसके कि भारत उसे कई बार कह चुका है कि पाकिस्तान के साथ कोई भी बातचीत द्विपक्षीय स्तर पर होगी और इसमें तीसरे पक्ष को बीच में पड़ने की ज़रूरत नहीं है। दूसरी ओर ख़बरों के मुताबिक़, कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाये जाने के एक महीने बाद भी हालात सामान्य नहीं हो सके हैं। कई इलाक़ों में अभी भी टेलीफ़ोन चालू नहीं हैं, माता-पिता बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार नहीं हैं, अस्पतालों में दवाइयाँ नहीं हैं जिस वजह से मरीजों को ख़ासी परेशानी हो रही है। 

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हाल ही में श्रीनगर के मेयर जुनैद अज़ीम मट्टू ने भी कहा था कि अगर कश्मीर में लाशें नहीं मिल रही हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि हालात सामान्य हो गए हैं।

अमेरिका ने शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर की स्थितियों को लेकर एक बार फिर चिंता ज़ाहिर करते हुए भारत से अपील की कि वह मानवाधिकारों का सम्मान करे। अमेरिका ने भारत से यह भी कहा है कि वह राज्य के स्थानीय नेताओं के साथ राजनीतिक जुड़ाव को फिर से शुरू करे और वहाँ से जल्द से जल्द चुनाव कराये। 

अंग्रेजी अख़बार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक़, अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मोर्गन ऑर्टेगस ने कहा, ‘हम कश्मीर में जारी प्रतिबंधों को लेकर बेहद चिंतित हैं, इसमें राजनेताओं, व्यवसायियों और उस क्षेत्र के निवासियों पर लगे प्रतिबंध शामिल हैं। हम वहाँ के कुछ इलाक़ों में इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन को लेकर जारी प्रतिबंध पर भी चिंतित हैं।’ मोर्गन ने आगे कहा, ‘हम अपील  करते हैं कि वे मानवाधिकारों का सम्मान करें और ज़रूरी सुविधाएं जैसे इंटरनेट और मोबाइल को फिर से चालू करें।’ 

याद दिला दें कि पिछले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कश्मीर में मध्यस्थता करने की बात कहकर सनसनी फैला दी थी। ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के साथ एक मुलाक़ात के दौरान कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे कश्मीर मामले पर मध्यस्थता करने की गुजारिश की थी। लेकिन तब भारत ने ट्रंप के इस बयान का जोरदार खंडन किया था। तब भारत के साथ-साथ अमेरिका में भी ट्रंप के बयान पर बवाल हो गया था। अमेरिकी मीडिया और कई सांसदों ने ट्रंप के इस बयान की आलोचना की थी। 

इसके बाद ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि वह कश्मीर पर मध्यस्थता करने के लिए तैयार हैं और धर्म भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का एक प्रमुख कारण है। ट्रंप ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान लंबे समय से साथ नहीं आए हैं और स्थिति बेहद ही ख़राब है।

ट्रंप बाज़ नहीं आये और जी-7 की बैठक के एक दिन पहले उन्होंने कहा था कि वह कश्मीर के मुद्दे पर दोनों देशों की मदद करना चाहते हैं। लेकिन इस बार सवाल उठा था कि आख़िर वाशिंगटन बिना माँगे और द्विपक्षीय मामला बताये जाने के बाद भी ‘मदद करूंगा’ की रट क्यों लगाये हुए है।

पेरिस में हुए जी-7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप से स्पष्ट कहा था, ‘भारत-पाकिस्तान के बीच कई द्विपक्षीय मामले हैं, लेकिन हम किसी तीसरे पक्ष को तकलीफ़ नहीं देना चाहते। जो भी मामले हैं, हम आपसी बातचीत से सुलझा लेंगे।’

लेकिन बावजूद इसके अमेरिका और ट्रंप कश्मीर पर बयान देने से बाज़ नहीं आते और कुछ दिन पहले ही अमेरिका ने एक बार फिर कश्मीर में स्थानीय लोगों पर पाबंदी जारी रहने को लेकर चिंता जताई थी और कहा था कि वह हालात पर नज़र रखे हुए है। 

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अब जिस तरह का ताज़ा बयान अमेरिका की ओर से आया है जिसमें उसने राज्य में जल्द से जल्द चुनाव कराने के लिए कहा है, उससे सवाल यही खड़ा होता है कि आख़िर ट्रंप प्रशासन को इस बारे में भारत का रुख स्पष्ट बताने के बावजूद कश्मीर को लेकर बात करने की क्या ज़रूरत है। भारत की ओर से अभी इस बारे में कोई जवाब नहीं दिया गया है। 

अमेरिका का यह बयान ऐसे समय में आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुछ समय बाद न्यूयार्क में होने वाली संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में भाग लेने के लिए अमेरिका जाना है।

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने से पहले और बाद में अमेरिका लगातार कश्मीर मुद्दे पर बयानबाज़ी कर रहा है। इसका जो कारण समझ में आता है वह यह कि इसमें अमेरिका और पाकिस्तान, दोनों बहुत चतुराई से ‘खेल’ खेल रहे हैं। 

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अमेरिका में अगले साल राष्ट्रपति चुनाव हैं और ट्रंप चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। ट्रंप प्रशासन अफ़ग़ानिस्तान से अपनी फ़ौज़ें वापस बुलाने के लिए तालिबान से वार्ता में जुटा है जिससे कि वह इसका चुनाव में लाभ ले सके। इस काम में उसे पाकिस्तान की मदद की ज़रूरत हो सकती है। यही सवाल पाकिस्तान में भी पूछा जा रहा है कि अगर पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में शांति वार्ता में मदद करेगा तो इसके एवज में उसे क्या मिलेगा? इसका मतलब साफ़ है कि पाकिस्तान अमेरिका की इस काम में मदद के बदले कुछ सहयोग जैसे आर्थिक मदद आदि चाहता है।

क्योंकि अमेरिका का मानना है कि भारत-पाक के बीच जब तक कश्मीर को लेकर विवाद रहेगा तब तक अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध ख़त्म नहीं होगा और वह अपनी सेनाओं को वापस नहीं बुला पाएगा। क्योंकि पाकिस्तान पर यह आरोप लगता है कि वह अफ़ग़ानिस्तान में भारत के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए तालिबान को समर्थन देता है। 

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क़मर वहीद नक़वी
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