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अमित शाह पर हिंदी थोपने का आरोप, स्टालिन ने कहा - टूटेगा देश

हिंदी दिवस के मौक़े पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब कहा कि पूरे देश की एक भाषा होना बेहद ज़रूरी है जो विश्व में भारत की पहचान बन सके तो इस पर संग्राम छिड़ गया। दक्षिण के कुछ नेताओं ने इसका पुरजोर विरोध किया और कहा कि शाह हिंदी को थोपने की कोशिश न करें। अमित शाह ने अपने ट्वीट में कहा कि आज देश को एकता की डोर में बाँधने का काम अगर कोई एक भाषा कर सकती है तो वह सर्वाधिक बोले जाने वाली हिंदी भाषा ही है। हालाँकि शाह ने यह भी कहा कि भारत विभिन्न भाषाओं का देश है और हर भाषा का अपना महत्व है। 

गृह मंत्री ने एक कार्यक्रम में कहा, ‘हिंदी दिवस के दिन हमें आत्मचिंतन करना चाहिए। दुनिया में कई ऐसे देश हैं जिनकी भाषाएं लुप्त हो गईं। जो देश अपनी भाषा छोड़ देता है वह अपना अस्तित्व भी कायम नहीं रख सकता। क्योंकि भाषा ही है जो व्यक्ति को देश के मूल के साथ, संस्कृति के साथ जोड़ती है।’

तमिलनाडु में विपक्ष के नेता एमके स्टालिन ने अमित शाह के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि यह इंडिया है हिंडिया नहीं। स्टालिन ने कहा, ‘गृह मंत्री के विचार भारत की एकता के लिए ख़तरा हैं और बेहद दुखद और निंदनीय भी हैं।’ डीएमके प्रमुख एमके स्‍टालिन ने कहा, ‘हम हमेशा से अपने ऊपर हिंदी को थोपने का विरोध करते रहे हैं। अमित शाह के आज के बयान से हमें झटका लगा है। यह देश की एकता को प्रभावित करेगा, हम मांग करते हैं कि वह अपने बयान को वापस लें।’ 
एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी शाह के हिंदी को एकता की डोर में बांधने वाली भाषा बताने पर निंदा की। ओवैसी ने कहा, ‘हिंदी सभी भारतीयों की मातृभाषा नहीं है। क्या आप भारत की विभिन्न मातृभाषाओं की विविधता और सुंदरता की तारीफ़ कर सकते हैं। संविधान का अनुच्छेद 29 सभी भारतीयों को भाषा, लिपि और संस्कृति का अधिकार देता है।’ ओवैसी ने तंज कसते हुए कहा कि भारत हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व से बहुत बड़ा है। 
कर्नाटक में शनिवार को स्‍थानीय नेताओं ने हिंदी दिवस का विरोध किया। 

पश्‍चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने हिंदी दिवस की शुभकामनाएं दीं और कहा कि हम कई भाषाएँ सीख सकते हैं लेकिन हमें अपनी मातृ-भाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए और सभी भाषाओं और संस्कृतियों का समान रूप से सम्मान करना चाहिए। 

याद दिला दें कि इस साल जून में नई एजुकेशन पॉलिसी का ड्राफ़्ट सामने आने के बाद दक्षिण के राज्यों में इसका जोरदार विरोध हुआ था क्योंकि इसमें भारत के सभी स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य किया गया था। तब दक्षिण के लोगों ने कहा था कि उन पर हिंदी थोपी जा रही है और ट्विटर पर #StopHindiImposition और #TNAgainstHindiImposition ट्रेंड कराया था। तमिलनाडु सरकार ने भी इसे लागू करने से इनकार कर दिया था और कहा था कि तमिलनाडु में सिर्फ़ तमिल और अंग्रेज़ी आगे बढ़ेगी। 

तब भी डीएमके नेता स्टालिन ने बीजेपी को चेतावनी देते हुए कहा था कि इससे उसे भयानक नुक़सान होगा। एमडीएमके नेता वाइको ने भी भाषा युद्ध की चेतावनी दी थी। टी. टी. दिनकरण ने कहा कि इससे देश का बहुलतावाद नष्ट हो जाएगा और ग़ैर हिंदी भाषियों पर हिंदी थोपने से वे दूसरे दर्जे के नागरिक बन कर रह जाएँगे।

तमिलनाडु के हिंदी विरोधी आंदोलन 

तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन का इतिहास बहुत पुराना है। साल 1937 में जब मद्रास प्रान्त में इंडियन नेशनल कांग्रेस की सरकार बनी थी और सरकार के मुखिया चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने हिंदी को अनिवार्य करने की कोशिश की थी तब द्रविड़ आंदोलन के नेता 'पेरियार' के नेतृत्व में हिंदी विरोधी आंदोलन हुआ था। यह आंदोलन इतना तीव्र और प्रभावशाली था कि सरकार को झुकना पड़ा था। इसके बाद 50 और 60 के दशकों में भी जब हिंदी को थोपने की कोशिश की गयी तब भी जमकर आंदोलन हुआ था और हिंसा भी हुई थी। 

तमिलनाडु ने हमेशा ही हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रस्ताव का भी विरोध किया है। तमिलनाडु की सभी द्रविड़ पार्टियाँ शुरू से ही हिंदी को अनिवार्य करने की कोशिश का विरोध करती रही हैं। पेरियार, अन्ना दुराई, एमजीआर, करुणानिधि, जयललिता जैसे सभी नेताओं ने तमिलनाडु में हिंदी को अनिवार्य किये जाने का विरोध किया। द्रविड़ पार्टियों का हिंदी विरोध इतना तीव्र है कि इन पार्टियों ने तमिलनाडु में राजमार्ग पर लगने वाले साइन बोर्ड/ दिशा-निर्देश पट्टिकाओं पर हिंदी में लिखे जाने का विरोध किया है। तब तमिलनाडु को तत्कालीन कांग्रेस-जेडीएस सरकार का भी समर्थन मिला था। 

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