गृहमंत्री अमित शाह ने एसआईआर का ज़िक्र करते हुए घुसपैठियों को चुन-चुन कर निकालने की बात कही है। लेकिन सवाल है कि बिहार में कितने घुसपैठिये निकाले गए? असम में एनआरसी से बाहर रहे 19 लाख लोगों को वे क्यों निकाल नहीं पा रहे?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश भर में एसआईआर का ज़िक्र करते हुए कहा कि एक-एक घुसपैठिये को चुन-चुन कर बाहर निकालेंगे। उन्होंने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर को वोटर लिस्ट की शुद्धिकरण प्रक्रिया बताते हुए इसे लोकतंत्र की रक्षा का अभ्यास क़रार दिया। बिहार विधानसभा चुनावों में एनडीए की प्रचंड जीत को घुसपैठियों के खिलाफ जनादेश बताते हुए उन्होंने विपक्षी दलों पर आरोप लगाया कि वे एसआईआर का विरोध इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे अवैध प्रवासियों को वोट बैंक के रूप में संरक्षण देना चाहते हैं। लेकिन सवाल उठ रहे हैं कि बिहार में एसआईआर के दौरान कितने घुसपैठिये पाए गए? चुनाव आयोग ने इस पर क्या जवाब दिया? और असम में एनआरसी के तहत बाहर हुए 19 लाख लोगों की नागरिकता पर अनिश्चितता क्यों बनी हुई है, उन्हें क्यों नहीं निकाला जा रहा?
शाह का यह बयान शुक्रवार को गुजरात के भुज में बीएसएफ के डायमंड जुबिली समारोह के दौरान आया, जहां उन्होंने सीमा सुरक्षा बल की बहादुरी की सराहना की। उन्होंने कहा, 'कुछ राजनीतिक दल घुसपैठियों को संरक्षण देने की कोशिश कर रहे हैं। वे एसआईआर प्रक्रिया और चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट शुद्धिकरण का विरोध कर रहे हैं। लेकिन बिहार चुनावों ने साफ़ संदेश दिया है कि जनता ऐसे दलों को कभी माफ नहीं करेगी।'
गृहमंत्री शाह ने चेतावनी दी कि केंद्र सरकार का संकल्प अटल है, 'पहले पहचानेंगे, फिर वोटर लिस्ट से हटाएंगे, और अंत में बाहर करेंगे।' उन्होंने बिहार की जीत को पूरे देश के लिए घुसपैठ के खिलाफ जनादेश बताते हुए कहा कि केवल भारतीय नागरिक ही देश के मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का फ़ैसला कर सकते हैं, घुसपैठिये नहीं।
SIR क्या नागरिकता की परीक्षा है?
चुनाव आयोग ने जून 2025 में बिहार में एसआईआर की शुरुआत की थी। यह अब पूरे देश में किया जा रहा है। यह प्रक्रिया वोटर लिस्ट से मृत, स्थानांतरित, डुप्लिकेट और अयोग्य नामों को हटाने के लिए है। अमित शाह के अनुसार, यह घुसपैठियों को वोटिंग अधिकार से वंचित करने का माध्यम है। बिहार में कुल 7.89 करोड़ मतदाताओं में से 7.24 करोड़ ने फॉर्म भरे। यानी क़रीब 65 लाख वोट कटे। बाद में 3.66 लाख मतदाता और कटे। हालाँकि, इसके साथ ही 21 लाख नये मतदाता जोड़े गए। यानी कुल मिलाकर ड्राफ्ट लिस्ट में 47 लाख नाम कट गए। अंतिम लिस्ट में 7.42 करोड़ मतदाता बचे।बिहार में घुसपैठियों की संख्या पर सन्नाटा है। चुनाव आयोग ने अभी तक कोई आँकड़ा जारी नहीं किया है।
चुनाव आयोग ने क्या कहा था?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अक्टूबर महीने में प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रवास, मृत्यु, डुप्लिकेट रजिस्ट्रेशन और विदेशी नामों को SIR से हटाए जाने का कारण बताया था, लेकिन घुसपैठियों पर सीधा जवाब नहीं दिया था। जुलाई 2025 में जारी 'फैक्ट्स रिवील्ड फ्रॉम बिहार SIR' नोट में 18 लाख मृत, 26 लाख स्थानांतरित और 7 लाख डुप्लिकेट नामों का ज़िक्र था, लेकिन 'घुसपैठिये' या 'विदेशी' शब्द का कहीं उल्लेख नहीं। कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने सवाल उठाया, 'प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री तक घुसपैठ की बात करते हैं, लेकिन चुनाव आयोग ने कितने हटाए, इसका आंकड़ा क्यों नहीं दिया?' विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर 'नागरिकता परीक्षा' बन गई है, जो लाखों वैध वोटरों को वंचित कर रही है।असम एनआरसी: 19 लाख बाहर, पर अनिश्चितता क्यों?
शाह का बयान असम के एनआरसी को भी चुनौती देता है, जहां 2019 में 3.3 करोड़ आवेदकों में से क़रीब 19 लाख बाहर हो गए। यह सूची 24 मार्च 1971 को कटऑफ के साथ बनी, जो असम समझौते पर आधारित है। बाहर हुए लोग मुख्य रूप से बंगाली हिंदू और मुस्लिम हैं, जिनमें कई दशकों से असम में रह रहे हैं। लेकिन उन्हें बाहर क्यों नहीं किया जा रहा है?
बाहर हुए लोग 120 दिनों में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स में अपील कर सकते हैं। फ़िलहाल, 100 ट्रिब्यूनल्स हैं, 200 और बन रहे हैं। प्रत्येक मामले का फ़ैसला 6 महीने में होना चाहिए, फिर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं। लेकिन लाखों अपीलें लंबित हैं, जिससे अनिश्चितता बनी हुई है।
बीजेपी ने कहा कि कई वैध नागरिक बाहर हो गए, जबकि अवैध शामिल हैं। 2020 में असम सरकार ने 'त्रुटिपूर्ण' NRC को संशोधित करने की मांग की।
असम में एसआईआर अलग मॉडल पर चलेगा, बिना नागरिकता जाँच के, क्योंकि राज्य में एनआरसी का मुद्दा लंबित है।शाह नाकाबिल गृहमंत्री: TMC
घुसपैठिये पर अमित शाह के बयान पर टीएमसी नेता सागरिका घोष ने कहा है कि अमित शाह एक बहुत ही नाकाबिल होम मिनिस्टर हैं क्योंकि वह फिर से कह रहे हैं कि घुसपैठिये इंडिया का बॉर्डर पार करके इंडिया में आ रहे हैं। सागरिका ने पीटीआई से कहा, 'मिस्टर अमित शाह एक बहुत ही नाकाबिल होम मिनिस्टर हैं। वह इंडिया के सामने आने वाली गंभीर नेशनल सिक्योरिटी चुनौतियों को सॉल्व करने में फेल रहे हैं क्योंकि वह पॉलिटिक्स में बहुत बिज़ी हैं और अपोज़िशन सरकारों को तोड़ने की कोशिश में बहुत बिज़ी हैं...। लेकिन बॉर्डर की रक्षा कौन करता है? मिस्टर अमित शाह, यह आप हैं। इंडिया के बॉर्डर की रक्षा करना आपकी ज़िम्मेदारी है। बॉर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स आपके अंडर आती है। इंडिया के बॉर्डर की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी आपको ही दी गई है। अगर घुसपैठिये आ रहे हैं, तो यह आपकी नाकामी है...और आपके मिनिस्ट्री की नाकामी है। वह एक नाकाबिल गृह मंत्री हैं और उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।'
संतुलन या ध्रुवीकरण?
बहरहाल, अमित शाह का संकल्प राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर देता है, लेकिन विपक्ष इसे 'ध्रुवीकरण का हथियार' मानता है। बिहार में एसआईआर से वैध वोटर प्रभावित हुए, जबकि असम में एनआरसी से 19 लाख की जिंदगियां लटकी हैं। क्या एसआईआर वाकई घुसपैठ रोकेगा, या लोकतंत्र को कमजोर करेगा? पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में आने वाले चुनावों में यह मुद्दा गरमाएगा।