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अयोध्या विवाद: क्या किसी दबाव में उड़ी मुसलिम पक्ष के केस वापस लेने की ख़बर?

अयोध्या मामले की सुनवाई के अंतिम दिन इस तरह की ख़बर सामने आई कि सुन्नी वक्फ़ बोर्ड अयोध्या विवाद से अपना दावा वापस ले सकता है। हालांकि बाद में साफ़ हुआ कि इस मामले के एक पक्षकार की ओर से ऐसी पेशकश मध्यस्थता पैनल के सामने की गई थी और ऐसी कोई भी अपील सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने नहीं की गई थी। सुनवाई के अंतिम दिन इस तरह की ख़बरें सामने आने के कारण माहौल गर्म रहा। 

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ख़बरों के मुताबिक़, यूपी सुन्नी वक़्फ बोर्ड के चेयरमैन ज़फर फ़ारूक़ी ने अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाये गये मध्यस्थता पैनल के सामने यह प्रस्ताव रखा था कि इस विवाद में चल रहे केस को वापस ले लिया जाये। कुछ मीडिया चैनलों ने यह ख़बर चलाई थी कि वह कुछ शर्तों पर अपना दावा वापस लेने के लिए तैयार हैं और फ़ारूक़ी के प्रस्ताव में इन बातों का जिक्र भी किया गया था। 

न्यूज़ चैनल सीएनएन-न्यूज़ 18 ने ख़बर दिखाई कि वक्फ़ बोर्ड ने प्रस्ताव में कहा है कि सरकार को इसके बदले अयोध्या में 22 मसजिदों के देखभाल की जिम्मेदारी लेनी होगी। ख़बर में कहा गया कि प्रस्ताव के मुताबिक़, मुसलिम पक्ष यह भी चाहता है कि अन्य धार्मिक स्थानों की स्थिति को देखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में एक समिति बनाई जाए। ये धार्मिक स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के नियंत्रण में हैं। सुन्नी वक्फ़ बोर्ड की ओर से Religious Worship Act 1991 को निर्विवाद रुप से लागू करने की भी मांग की गई। 

इस तरह की ख़बरों के सामने आने के थोड़ी देर बाद ही बाबरी मसजिद के मुद्दई इक़बाल अंसारी के वकील का बयान आ गया और उन्होंने साफ़ कहा कि मीडिया और सोशल मीडिया में आ रही इस तरह की ख़बरें पूरी तरह ग़लत हैं। सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के वकील ज़फरयाब जिलानी ने भी कहा कि ऐसा कुछ नहीं है और इस तरह की ख़बरें सत्य से परे हैं। मुसलिम पक्ष के वकील राजीव धवन के कार्यालय की ओर से भी जिलानी और अंसारी की बात को दोहराया गया। 
हिन्दी न्यूज़ चैनल आज तक ने यह ख़बर दी कि सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच के सामने ऐसी कोई अपील नहीं की गई है और अगर सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ऐसा करना भी चाहता है तो उसे इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की अनुमति की ज़रूरत होगी।

‘सरकार के दबाव में है वक्फ़ बोर्ड’

इस मामले में मुसलिम विद्वान और वक्फ़ बोर्ड के सदस्य एसक्यूआर इलियासी के बयान से कई सवाल खड़े होते हैं। इलियासी ने सीएनएन-न्यूज़18 से कहा कि वक्फ़ बोर्ड मुसलमानों की सिर्फ़ प्रतिनिधि संस्था है। इलियासी ने दावा किया कि क़ानूनी मामलों में भी कोई अकेला व्यक्ति वक्फ़ बोर्ड का नेतृत्व नहीं कर सकता। उन्होंने न्यूज़ चैनल से कहा कि इस मुद्दे पर सर्वसम्मति बनाने की कोई मांग नहीं की गई। उन्होंने यह भी कहा कि बोर्ड के अध्यक्ष देश के लाखों मुसलमानों की ओर से ऐसा कोई दावा करने के हक़दार नहीं हैं। इलियासी ने आरोप लगाया कि वक्फ बोर्ड यूपी सरकार के दबाव में है।

मुसलिम पक्ष की ओर से दावा वापस लेने की ख़बर उड़ी तो पहले तो यह बात किसी के गले नहीं उतरी क्योंकि जो मुसलिम पक्ष कई सालों से इस मुक़दमे को पूरी मजबूती के साथ लड़ रहा है वह आख़िर अपना दावा क्यों वापस ले लेगा।
कुछ दिन पहले ही ज़फर फ़ारुक़ी ने ख़ुद की जान को ख़तरा बताया था और मध्यस्थता पैनल के सदस्य श्रीराम पांचू को इसकी जानकारी दी थी। पांचू ने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट को बताया था और दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया था कि वह ज़फर फ़ारुक़ी को तत्काल प्रभाव से सुरक्षा दे।
याद दिला दें कि योगी सरकार ने कुछ दिनों पहले ही वक्फ़ बोर्ड की ज़मीनों की ख़रीद के मामले में गड़बड़ी को लेकर सीबीआई जांच का आदेश दिया था और इसमें सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के चेयरमैन ज़फर फ़ारूक़ी से भी पूछताछ होनी है। 
मीडिया में इस तरह की ख़बरों के सामने आने और एसक्यूआर इलियासी के बयान के बाद यह यह सवाल ज़रूर खड़ा होता है कि क्या फ़ारुक़ी यूपी सरकार के सीबीआई जांच का आदेश देने के बाद किसी तरह के दबाव में हैं और इस वजह से ही उन्हें अयोध्या विवाद में से अपना दावा वापस लेने का प्रस्ताव मध्यस्थता पैनल के सामने रखना पड़ा। 
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