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अयोध्या विवाद: क्या मुसलिम पक्ष का रुख बदला; राम चबूतरा ही जन्म स्थल?

बाबरी मसजिद राम मंदिर का मुद्दा गरमाने के बाद से ही यह विवाद का विषय रहा कि भगवान राम का जन्म किस जगह पर हुआ है। यह तो लगभग सभी ने माना है कि वह अयोध्या में ही पैदा हुए थे, लेकिन क्या वह वहाँ पैदा हुए जहाँ बाबरी मसजिद है या कहीं और? मंगलवार को पहली बार मुसलिम पक्ष की तरफ़ से यह तर्क दिया गया कि भगवान राम ने बाबरी मसजिद से दूर राम चबूतरे पर जन्म लिया था। यह बात मुसलिम पक्ष के वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने सुप्रीम कोर्ट के सामने कही और बाकायदा उन्होंने इसके लिए 1885 के एक ज़िला अदालत के फ़ैसले का ज़िक्र भी किया। 

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अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में हर रोज़ की सुनवाई चल रही है और फ़िलहाल मुसलिम पक्ष की ओर से दलीलें पेश की जा रही हैं। हिंदू पक्ष की ओर से दलीलें रखी जा चुकी हैं। मंगलवार को मुसलिम पक्ष के वकील राजीव धवन की दलील पूरी हुई तो ज़फ़रयाब जिलानी ने अपनी दलीलें शुरू कीं। इसी दौरान कोर्ट में जस्टिस एस. ए. बोबडे ने उनसे पूछा, ‘आपका विवाद सिर्फ़ जन्मस्थान का है?’ इस पर जिलानी ने दलीलें रखने की बात कही।

मंगलवार को जब सुनवाई के दौरान बहस चल रही थी तब जस्टिस एस. ए. बोबडे ने जिलानी से पूछा, 'आप को जन्म स्थान के रूप में चबूतरे पर आपत्ति नहीं है?' इस पर जिलानी ने कहा, 'पहले हमें (आपत्ति) थी। लेकिन ज़िला जज ने कहा है कि इसको (चबूतरे को) जन्म स्थान मानकर पूजा की जाती रही है।’ बता दें कि राम चबूतरा अयोध्या में विवादित स्थल के बाहरी हिस्से में है और यह बाबरी मसजिद से क़रीब 60 फ़ीट दूर है।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान राम के जन्म स्थल को लेकर यह मामला सनसनीखेज है। सनसनीखेज इसलिए कि राम के जन्म को लेकर मुसलिम पक्ष ने पहले साफ़ कुछ भी बयान नहीं दिया है। लेकिन मंगलवार को जब सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यीय संविधान पीठ सुनवाई कर रही थी तब सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने इस पर बयान दे दिया। इस पर मुसलिम समुदाय में तीखी प्रतिक्रिया हुई तो सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बुधवार को इस पर सफ़ाई दी। इसने कहा है कि बोर्ड ने यह स्वीकार नहीं किया है कि चबूतरा राम का जन्म स्थल है, बल्कि उसने सिर्फ़ यह ध्यान में लाया है कि उसने 1885 में फ़ैज़ाबाद कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती नहीं दी है। इस फ़ैसले में कोर्ट ने पाया था कि हिंदू चबूतरे को राम के जन्म स्थल की तरह पूजा करते आए हैं। 

इधर, बुधवार को ज़फ़रयाब जिलानी ने अपने मंगलवार के बयान से यू-टर्न लेते हुए कहा है कि उन्होंने राम चबूतरे को जन्मस्थान नहीं माना था, बल्कि ज़िला जज के फ़ैसले का हवाला दिया था।

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मध्यस्थता की पहल दुबारा क्यों?

चबूतरे पर राम के जन्म स्थल को लेकर यह मामला उस समय आया है जब इस मामले में मध्यस्थता की कोशिश दुबारा शुरू हुई है। इसके लिए सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने बाक़ायदा पत्र भी लिखा है। ऐसा ही पत्र हिंदू पक्ष की ओर से भी लिखा गया है।

जब मध्यस्थता का यह मामला आया तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता प्रक्रिया भी जारी रह सकती है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के मध्यस्थता पैनल को पत्र लिखने के बाद मध्यस्थों ने मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ को एक ज्ञापन सौंपा था। इसमें उन्होंने सुन्नी वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष और निर्वाणी अखाड़ा की ओर से मध्यस्थता प्रक्रिया को फिर से शुरू करने के लिए दिए गए पत्रों पर निर्देश माँगे थे। 

2.77 एकड़ ज़मीन का विवाद

सुप्रीम कोर्ट उन केसों की सुनवाई कर रहा है जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट के 30 सितंबर 2010 के फ़ैसले के ख़िलाफ़ 14 अपीलें दायर की गई हैं। हाई कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान के बीच समान रूप से विभाजित करने का आदेश दिया था। लेकिन हाई कोर्ट का यह फ़ैसला कई लोगों को पसंद नहीं आया। यही कारण है कि इस मामले के ख़िलाफ़ कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ दायर कीं। सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मई 2011 में हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी थी। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है।

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सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई काफ़ी अहम है क्योंकि इसी आधार पर अयोध्या विवाद का फ़ैसला आएगा। सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने उम्मीद जताई है कि यह सुनवाई 18 अक्टूबर तक पूरी हो जाएगी। इस फ़ैसले के आने तक यदि यह तय हो जाए कि राम का जन्म किस जगह पर हुआ था तो बहुत संभव है कि फ़ैसला भी उसी के अनुरूप होगा।

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