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क्लेरेंस हाई स्कूल, बेंगलुरु में बाइबल पढ़ने और रखने का आरोप हिन्दू संगठनों ने लगाया है

कर्नाटक के स्कूल में बाइबल का मुद्दा उछला, सरकार ने कहा- एक्शन होगा

अल्पसंख्यकों से जुड़े मामलों को कैसे मुद्दा बनाया जाता है, एक ताजा मामला फिर से कर्नाटक में सामने आया है। हिंदू जनजागृति समिति और हिन्दू सेना ने आरोप लगाया है कि बेंगलुरु में क्लेरेंस हाई स्कूल स्टूडेंट्स पर जबरन बाइबल थोप रहा है। हालांकि बीजेपी यह कहती रही है कि हिंदू जनजागृति समिति से उसका कोई संबंध नहीं है। लेकिन यह दक्षिणपंथी संगठन जब भी कोई मुद्दा उठाती है तो उसे राज्य सरकार से पूरा समर्थन मिलता है। हिंदू जनजागृति समिति ने जैसे ही क्लेरेंस हाई स्कूल, बेंगलुरु पर बाइबिल थोपने का आरोप लगाया, शिक्षा विभाग का अधिकारी सोमवार को स्कूल में जांच करने पहुंच गया। एएनआई ने प्रखंड (ब्लॉक) शिक्षा अधिकारी को कोट करते हुए खबर दी है कि मैं स्कूल से इस मामले की रिपोर्ट लेने यहां आया हूं। शिक्षा मंत्री ने भी सोमवार को कहा है कि अगर आरोप सही हुआ तो स्कूल पर कार्रवाई होगी। 
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क्लेरेंस हाई स्कूल के प्रिंसिपल जेरी जॉर्ज मैथ्यू ने कहा कि हम जानते हैं कि कुछ लोग हमारे स्कूल की नीतियों में से एक के बारे में परेशान हैं। हम एक शांतिप्रिय और कानून का पालन करने वाले स्कूल हैं। हमने इस मामले में अपने वकीलों से सलाह की है और हम उनकी सलाह का पालन करेंगे। हम देश का कानून नहीं तोड़ेंगे।हिंदू संगठनों ने स्कूल का लाइसेंस रद्द करने की मांग की है। श्रीराम सेना के संस्थापक प्रमोद मुतालिक ने सोमवार को आरोप लगाया कि स्कूल प्रबंधन ने अपने घरों और चर्चों में बाइबल रखने को कहा है। सवाल ये है कि हिंदू छात्रों के बीच बाइबल का प्रचार क्यों किया जा रहा है, जो स्कूल में कुल छात्र संख्या का 90 फीसदी हैं?' उसने सवाल किया कि स्कूल को टेकओवर कर लिया जाए या इसकी मान्यता रद्द कर छात्रों को दूसरे स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया जाए।

हिंदू जन जागृति समिति ने आरोप लगाया है कि छात्रों को अनिवार्य रूप से हर रोज बाइबल पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है। सभी विद्यार्थियों को एक बाइबल दी गई है जो एक पुस्तिका के रूप में है, उसे प्रतिदिन लाने-ले जाने को कहा गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि अगर कोई आपत्ति करता है तो उसे एडमिशन कैंसल करने की धमकी दी जाती है।
समिति ने आरोप लगाया है कि स्कूल ने संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन और दुरुपयोग किया है। यह कदम सुप्रीम कोर्ट, कर्नाटक शिक्षा अधिनियम और बाल संरक्षण कानूनों के दिशानिर्देशों का उल्लंघन है। समिति ने शिक्षा मंत्री बी.सी. नागेश से इस मामले में गैर-ईसाई छात्रों को ईसाई धर्म का उपदेश जबरदस्ती थोपने के लिए स्कूल का लाइसेंस रद्द करने की मांग की। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए, शिक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि स्कूलों में बाइबल पढ़ना अनिवार्य करने का कोई प्रावधान नहीं है, अगर यह सच पाया जाता है, तो स्कूल के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। कर्नाटक में यह पहला मामला नहीं है जब इस तरह किसी अल्पसंख्यक संस्था से जुड़े मुद्दे को उछाला गया है। इसकी शुरुआत हिजाब से हुई थी। हिन्दू संगठनों ने सबसे पहले स्कूल-कॉलेजों में हिजाब का विरोध शुरू किया। इसके बाद सरकारी स्कूल-कॉलेजों में हिजाब पर रोक लगाई गई। इसके बाद इसमें कर्नाटक की बीजेपी सरकार भी कूदी। उसने आदेश दिया कि स्कूल-कॉलेजों को अपना ड्रेस कोड लागू करने का अधिकार है। 
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इसके बाद हलाल मीट का मुद्दा उछला। हिन्दू संगठनों ने आह्वान किया कि मुस्लिम दुकानदारों से कोई भी चीज न खरीदें। इसके बाद तमाम मंदिरों में होने वाले सांस्कृतिक त्यौहारों के दौरान मुस्लिम दुकानदारों को दुकान लगाने की अनुमति नहीं दी गई। इसे भी राज्य सरकार ने जायज ठहराया। इसके बाद अज़ान और लाउडस्पीकर का मामला उठा। अब हनुमान चालीसा विवाद भी कर्नाटक में जोर पकड़ रहा है। एक हिन्दू संगठन ने कहा कि वो पांच वक्त की नमाज के समय रामधुन बजाएगा। इन्हीं तमाम विवादों के बीच बाइबल विवाद भी आ गया है।
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