बीजेपी ने राहुल गांधी की आर्थिक सुनामी वाली चेतावनी पर कहा कि नेता विपक्ष पैनिक फैलाना बंद करें। लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों के सवाल का जवाब क्यों नहीं दे रही है मोदी सरकार। BJP responded to Rahul Gandhi's warning of an economic tsunami, but silent on economic experts questions?
राहुल गांधी और पीएम मोदी का एआई से तैयार फोटो
भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने लोकसभा विपक्ष के नेता राहुल गांधी के 'आर्थिक सुनामी' (economic tsunami) की चेतावनी का जवाब दिया है। BJP ने इसे 'क्लासिक फियर-मॉन्गरिंग' यानी डर फैलाने की पुरानी रणनीति करार दिया और कहा कि राहुल गांधी घबराहट बेचना बंद करें। हालांकि बीजेपी राहुल गांधी का राजनीतिक मुकाबला कर रही है लेकिन वो आर्थिक विशेषज्ञों के सवालों पर चुप है। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग, आर्थिक विशेषज्ञ डॉ सुरजीत भल्ला और राजेश महापात्रा आदि ने सरकार की आर्थिक नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं लेकिन सरकार ने उनके सवालों का सीधा जवाब नहीं दिया।
नेता विपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी बार-बार कह रहे हैं कि भारत 'आर्थिक सुनामी' की ओर बढ़ रहा है। उनका इस संबंध में एक वीडियो सोशल मीडिया पर गुरुवार 4 जून को वायरल रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP सरकार ने अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से भारत की सुरक्षा प्रणाली (शॉक एब्जॉर्बर) को हटा दिया है। राहुल ने कहा, "एक खतरनाक आर्थिक सुनामी आ रही है। कीमतें बढ़ रही हैं और यह सिर्फ शुरुआत है।"
राहुल गांधी के बयान की तीन खास बातें
आर्थिक सुनामी का दावा: राहुल गांधी का आरोप है कि सरकार की आर्थिक नीतियां (जैसे बेरोजगारी, महंगाई और कथित तौर पर चुनिंदा उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाना) देश को एक बड़े आर्थिक संकट की ओर धकेल रही हैं, जिसे उन्होंने 'आर्थिक सुनामी' का नाम दिया।
सरकार गिरने की भविष्यवाणी: उन्होंने दावा किया कि वर्तमान गठबंधन सरकार (NDA) के भीतर आंतरिक मतभेद हैं और यह सरकार अपनी अंतर्विरोधों के कारण एक साल के भीतर गिर जाएगी।
इमरजेंसी की आशंका: राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि जनता के बढ़ते आक्रोश और विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए मोदी सरकार देश में अघोषित या घोषित 'इमरजेंसी' (आपातकाल) जैसी स्थितियां पैदा कर सकती है।
भाजपा का पलटवार: "राहुल गांधी पैनिक बेचना बंद करें"
भाजपा ने राहुल गांधी के इन दावों को पूरी तरह से खारिज करते हुए इसे देश में अस्थिरता फैलाने की कोशिश करार दिया। भाजपा नेताओं के मुख्य तर्क इस तरह हैं:
'डर और भ्रम' की राजनीति: भाजपा का कहना है कि राहुल गांधी के पास कोई ठोस नीतिगत विकल्प नहीं है, इसलिए वे जनता के बीच डर और भ्रम (Panic Selling) पैदा कर रहे हैं।
मजबूत आर्थिक आंकड़े: भाजपा ने वैश्विक रेटिंग एजेंसियों और देश के जीडीपी (GDP) आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसलिए 'आर्थिक सुनामी' की बात पूरी तरह काल्पनिक है।
इमरजेंसी पर घेरा: भाजपा ने पलटवार करते हुए याद दिलाया कि भारत में वास्तविक आपातकाल (1975) कांग्रेस सरकार के दौरान लगाया गया था, और वर्तमान मोदी सरकार संविधान के दायरे में काम कर रही है।क्या कह रहे हैं आर्थिक विशेषज्ञ
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र बोस का एक लेख प्रकाशित हुआ है। उन्होंने लिखा है कि प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्री यूपीए सरकार में जिस कमजोर आर्थिक हालत का ताना 13 साल से मारते आ रहे हैं, उसमें मोदी सरकार में भी सुधार तो हुआ नहीं, उल्टे हालत 'नाजुक' हो गई है। यानी हालात बदतर हो गए हैं। उन्होंने मॉर्गन स्टेनली की 'फ्रेजाइल फाइव' और भारत की ख़राब अर्थव्यवस्था रिपोर्ट का हवाला दिया है। मॉर्गन स्टेनली ने 2013 में भारत को, ब्राज़ील, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ़्रीका और तुर्की के साथ, 'फ्रेजाइल फाइव' यानी 'कमज़ोर पाँच' देशों के तौर पर बताया था। यह वह समय था जब अमेरिका के फेडरल रिज़र्व की 'टेपर टैंट्रम' नीति के बाद भारतीय रुपए में भारी गिरावट आई थी। ये रुपये की गिरावट मौजूदा समय में तो रिकॉर्ड 97 रुपये प्रति डॉलर के क़रीब तक पहुँच गई है।
गर्ग ने लिखा है कि मोदी सरकार की नीतियों का कम से कम 7 साल समर्थक रहे मॉर्गन स्टेनली ने पिछले साल से 'फ्रेजाइल फाइव' की सूची को में ऊपर नहीं किया है। सुभाष चंद्र गर्ग ने डेक्कन हेराल्ड अख़बार में लिखे एक लेख में कहा है कि भारत ‘फ्रेजाइल फाइव’ यानी कमजोर पांच देशों की लिस्ट से अब ‘वल्नरेबल वन’ यानी 'असुरक्षित' या 'नाजुक हालत में पहुँच गया है। गर्ग ने लिखा है, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्री 13 साल से ‘फ्रेजाइल फाइव’ का लेबल यूपीए सरकार पर लगाकर उसकी आलोचना करते रहे हैं। लेकिन अब खुद मोदी सरकार की स्थिति क्या है?"
सुरजीत भल्ला ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए क्या लिखा
सुभाष चंद्र गर्ग ने लिखा कि पहले भारत सहित पांच देशों को ‘फ्रेजाइल फाइव’ कहा गया था। मोदी सरकार के समर्थक माने जाने वाले अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने अब इसे घटाकर ‘फ्रेजाइल टू’ यानी कमजोर दो देशों की श्रेणी में रख दिया है जिसमें भारत और तुर्की शामिल हैं। मशहूर अर्थशास्त्री और आईएमएफ (IMF) के पूर्व कार्यकारी निदेशक सुरजीत भल्ला ने हाल ही में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति, जीडीपी ग्रोथ और रुपये की स्थिति को लेकर कई महत्वपूर्ण और बेबाक बातें कही हैं।
आमतौर पर माना जा रहा था कि फरवरी 2026 से शुरू हुए पश्चिम एशिया (Middle East) के सैन्य टकराव और तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त हुई है। लेकिन सुरजीत भल्ला ने इसे खारिज करते हुए कहा: अर्थव्यवस्था में सुस्ती का मुख्य कारण वैश्विक संकट नहीं, बल्कि देश के भीतर निजी निवेश (Private Investment) की कमी है। निजी क्षेत्र का निवेश बढ़ने के बजाय नीचे गया है। उन्होंने कहा कि कुछ महीने पहले तक आ रहे मजबूत जीडीपी आंकड़े और कम महंगाई दर एक तरह का भ्रम पैदा कर रहे थे कि 'सब कुछ बहुत अच्छा है'। उनके अनुसार, यह विकास दर मुख्य रूप से सरकारी खर्च और निवेश (Government Spending) के दम पर दिख रही थी। भल्ला का तर्क है कि सरकारी खर्च की तुलना में निजी निवेश कहीं अधिक कुशल (Efficient) होता है। सरकारी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भ्रष्टाचार की गुंजाइश और लागत के मुकाबले मिलने वाला रिटर्न (Bang for the buck) कम होता है।
रुपया मजबूत होना चाहिए, लेकिन नीतियां आड़े आ रही हैं
रुपये की ऐतिहासिक गिरावट पर भल्ला ने कहा कि भारत के आर्थिक फंडामेंटल्स (जैसे कम चालू खाता घाटा और नियंत्रित महंगाई) रुपये को मजबूत करने के पक्ष में हैं, न कि कमजोर करने के। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है क्योंकि: नीतिगत अनिश्चितता (Policy Uncertainty): भारत की आर्थिक नीतियों में स्पष्टता की कमी से निवेशकों का भरोसा डगमगाया है। भारत में विदेशी निवेशकों पर बहुत अधिक टैक्स दरें हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि 'गिफ्ट सिटी' (GIFT City) को इंटरनेशनल फाइनेंशियल हब बनाने की कोशिशें भी इसीलिए उम्मीद के मुताबिक कामयाब नहीं हुईं, क्योंकि वहां कैपिटल गेन्स टैक्स अभी भी बहुत ज्यादा है। हालांकि मोदी सरकार ने गुरुवार 4 जून को ही एफपीआई के लिए सरकारी बांडों पर कैपिटव गेन्स टैक्स खत्म कर दिया। साल 2015 के बाद द्विपक्षीय निवेश संधियों (Bilateral Investment Treaties) में जो बदलाव हुए, उससे विदेशी पूंजी भारत आने के बजाय बाहर (जैसे वियतनाम या बांग्लादेश) जाना ज्यादा पसंद कर रही है।क्या भाजपा राहुल गांधी के हमलों से डर गई है?
राजनीतिक विश्लेषक यही कह रहे हैं कि राहुल गांधी की "आक्रामकता" से मोदी सरकार सहमी हुई है। वो राहुल के आर्थिक सवालों का जवाब देने की बजाया इधर-उधर से व्यक्तिगत हमले कर रही है। राजनीति में धारणा बहुत मायने रखती है। अगर भाजपा राहुल के आर्थिक दावों पर चुप रहती है, तो जनता के बीच यह संदेश जा सकता है कि विपक्ष की बात सच है। इसलिए भाजपा तुरंत पलटवार कर अपनी मजबूत आर्थिक छवि को बनाए रखना चाहती है। बहरहाल, भारत 2024 में वैश्विक FDI रैंकिंग में 15वें स्थान पर आ गया। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी एफ़पीआई भारत से निकल रहे हैं। 700 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार होने के बावजूद रुपए को बचाना मुश्किल हो रहा है। इसके बावजूद अगर सरकार की नज़र में भारत की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी है तो फिर जनता खुद सोचे कि वो कितनी अच्छी है।