BRICS घोषणापत्र में न तो डोनाल्ड ट्रंप और न ही अमेरिका का नाम है, लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों, एकतरफा टैरिफ, IAEA की निगरानी वाले परमाणु ठिकानों पर हमलों और फलस्तीन के समर्थन का ज़िक्र है। पहलगाम हमलों, आतंकवाद, नस्ली व धार्मिक भेदभाव की निंदा की गई है।
ब्रिक्स देशों के राष्ट्राध्यक्ष
नई दिल्ली में BRICS के घोषणापत्र में न तो डोनाल्ड ट्रंप और न ही अमेरिका का नाम है, फिर भी अमेरिका को यह घोषणापत्र चुभेगा! आर्थिक प्रतिबंधों, एकतरफा टैरिफ, IAEA की निगरानी वाले परमाणु ठिकानों पर हमलों की निंदा और फलस्तीन के समर्थन पर दिए गए बयान को अमेरिका तो अपने पक्ष में नहीं ही मानेगा।
एकतरफा टैरिफ, आर्थिक प्रतिबंधों और सेकेंडरी प्रतिबंधों, युद्ध के दौरान परमाणु ठिकानों की सुरक्षा, गजा और लेबनान में इसराइली सैन्य कार्रवाई, फलस्तीनियों के आत्मनिर्णय और वापसी के अधिकार तथा नस्ली और धार्मिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर ब्रिक्स ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया है, वह वैश्विक शक्ति संतुलन को लेकर समूह की सोच का संकेत देती है।
हालाँकि घोषणापत्र में किसी देश का नाम लेकर आरोप नहीं लगाया गया है। लेकिन अमेरिकी टैरिफ नीति, ईरान और रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों तथा पश्चिम एशिया में अमेरिका के करीबी सहयोगी इसराइल की सैन्य कार्रवाई के संदर्भ में इसके कई हिस्सों को पढ़ा जा सकता है।
US का नाम नहीं, लेकिन टैरिफ पर सीधा संदेश
ब्रिक्स घोषणापत्र में एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। घोषणापत्र के मुताबिक़ ऐसे कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार को विकृत करते हैं और अगर वे विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप नहीं हैं तो वैश्विक व्यापार व्यवस्था के लिए समस्या पैदा करते हैं।
यह हिस्सा इसलिए अहम है क्योंकि अमेरिका की मौजूदा व्यापार नीति में टैरिफ को एक बड़े आर्थिक और कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। ब्रिक्स ने हालांकि अमेरिका का नाम नहीं लिया, लेकिन घोषणापत्र का संदेश यह है कि वैश्विक व्यापार में किसी एक देश द्वारा एकतरफा शुल्क या आर्थिक दबाव का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकता है। घोषणापत्र में व्यापार को नियम आधारित और बहुपक्षीय व्यवस्था के तहत चलाने पर जोर दिया गया है।
आर्थिक प्रतिबंधों को भी चुनौती
ब्रिक्स घोषणापत्र में एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और सेकेंडरी प्रतिबंधों की भी कड़ी आलोचना की गई है। घोषणापत्र में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ लगाए गए एकतरफा दबाव वाले उपायों का आम लोगों के मानवाधिकारों पर व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इनमें विकास, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा जैसे अधिकार भी शामिल हैं।
ब्रिक्स ने कहा कि ऐसे प्रतिबंध गरीब और कमजोर तबके के लोगों को ग़लत तरीक़े से प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा वे डिजिटल असमानता और पर्यावरणीय समस्याओं को भी बढ़ा सकते हैं। घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अधिकृत नहीं किए गए एकतरफा प्रतिबंधों का भी विरोध किया गया है।
यह मुद्दा ईरान और रूस जैसे देशों से विशेष रूप से जुड़ता है, जिन पर अमेरिका और उसके सहयोगियों ने अलग-अलग समय पर बड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। हालांकि घोषणापत्र में इन देशों का इस संदर्भ में नाम नहीं लिया गया है।
IAEA की निगरानी वाले परमाणु ठिकानों पर हमले की निंदा
घोषणापत्र का एक और बेहद अहम हिस्सा शांतिपूर्ण परमाणु ठिकानों पर हमले से जुड़ा है। ब्रिक्स देशों ने उन हमलों पर गंभीर चिंता जताई है, जिनमें नागरिक बुनियादी ढांचे और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA की पूरी निगरानी में चल रहे शांतिपूर्ण परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया।घोषणापत्र में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और IAEA से संबंधित प्रस्तावों का उल्लंघन करने वाले ऐसे हमले गंभीर चिंता का विषय हैं। परमाणु सुरक्षा, संरक्षा और निगरानी की व्यवस्था युद्ध के दौरान भी कायम रहनी चाहिए ताकि लोगों और पर्यावरण को नुकसान से बचाया जा सके।
घोषणापत्र में ईरान का नाम नहीं है। लेकिन इस भाषा का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि हाल के पश्चिम एशियाई संघर्ष के दौरान ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद हुआ था और उन प्रतिष्ठानों में IAEA की निगरानी वाली सुविधाएं भी शामिल थीं। इसलिए ब्रिक्स का यह बयान पश्चिम एशिया में हालिया सैन्य घटनाक्रम के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
अमेरिका-ईरान युद्ध का सीधे जिक्र नहीं
दिलचस्प बात यह है कि घोषणापत्र में अमेरिका-ईरान युद्ध का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया गया है। इसके बजाय ब्रिक्स ने व्यापक सिद्धांतों की भाषा इस्तेमाल की है- अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन, परमाणु ठिकानों की सुरक्षा, एकतरफा सैन्य कार्रवाई का विरोध और विवादों का शांतिपूर्ण समाधान।यह रणनीति ब्रिक्स के भीतर अलग-अलग देशों के दृष्टिकोण को देखते हुए भी अहम है। समूह में रूस, चीन, भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अन्य सदस्य शामिल हैं और सभी देशों के अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के साथ संबंध एक जैसे नहीं हैं। इसलिए घोषणापत्र में किसी एक देश को सीधे निशाना बनाने के बजाय ऐसे सिद्धांतों पर जोर दिया गया है जिन्हें व्यापक समर्थन मिल सके।
गजा और लेबनान पर इसराइल की आलोचना
फलस्तीन के मुद्दे पर घोषणापत्र में अपेक्षाकृत विस्तार से बात की गई है। घोषणापत्र में चार पैराग्राफ फलस्तीन के मुद्दे को समर्पित हैं। ब्रिक्स ने इसराइल-फलस्तीन संघर्ष के न्यायपूर्ण और स्थायी समाधान के लिए शांतिपूर्ण रास्ते की जरूरत बताई। साथ ही फलस्तीनियों के आत्मनिर्णय के अधिकार और अपने देश में वापस लौटने के अधिकार का समर्थन किया।
ब्रिक्स में शामिल पुतिन, मोदी और जिनपिंग
घोषणापत्र में फलस्तीन को संबंधित अंतरराष्ट्रीय संगठनों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की ज़रूरत भी बताई गई है। ब्रिक्स ने संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन की पूर्ण सदस्यता के समर्थन को दोहराया और दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया।
1967 की सीमाओं के आधार पर फलस्तीन का समर्थन
घोषणापत्र में एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फलस्तीनी राज्य की स्थापना का समर्थन किया गया है। इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त 1967 की सीमाओं के आधार पर फलस्तीन राज्य की स्थापना की बात कही गई है। इसमें गजा पट्टी और वेस्ट बैंक शामिल हैं और पूर्वी यरुशलम को उसकी राजधानी बनाने की बात कही गई है। ब्रिक्स ने कहा कि लक्ष्य ऐसा दो-राष्ट्र समाधान होना चाहिए जिसमें दोनों देश शांति और सुरक्षा के साथ एक-दूसरे के साथ रह सकें।
इस भाषा से यह साफ़ है कि ब्रिक्स फलस्तीन के सवाल को केवल मानवीय संकट के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक और अधिकारों से जुड़े प्रश्न के रूप में भी देख रहा है।
गजा और लेबनान में सैन्य कार्रवाई पर सवाल
घोषणापत्र में गजा और लेबनान में इसराइल की सैन्य कार्रवाइयों को लेकर भी कड़ी चिंता और आलोचना दर्ज की गई है। अमेरिका लंबे समय से इसराइल का प्रमुख रणनीतिक और सैन्य सहयोगी रहा है। ऐसे में ब्रिक्स द्वारा इसराइली सैन्य कार्रवाई की आलोचना और फलस्तीन के राजनीतिक अधिकारों के समर्थन को पश्चिम एशिया की मौजूदा शक्ति राजनीति के संदर्भ में अहम माना जा सकता है।
फलस्तीनियों के ‘वापसी के अधिकार’ का समर्थन
ब्रिक्स घोषणापत्र में फलस्तीनियों के आत्मनिर्णय और वापसी के अधिकार का स्पष्ट समर्थन किया गया है। यह शब्दावली अहम है क्योंकि फलस्तीनी मुद्दे पर ‘राइट टू रिटर्न’ लंबे समय से सबसे विवादित मुद्दों में से एक रहा है। ब्रिक्स ने यह भी कहा कि फलस्तीन को संबंधित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व और उनके संसाधनों तक पहुंच मिलनी चाहिए। इससे ब्रिक्स का संदेश यह है कि फलस्तीन के भविष्य पर फैसला केवल सैन्य ताकत या किसी एक पक्ष की शर्तों से नहीं होना चाहिए।
पहलगाम हमले की भी कड़ी निंदा
घोषणापत्र केवल पश्चिम एशिया के मुद्दों तक सीमित नहीं है। इसमें 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की भी कड़ी निंदा की गई है। घोषणापत्र में कहा गया है कि इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हुए। ब्रिक्स ने आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। इसमें सीमा पार आतंकवाद, आतंकवाद की फंडिंग और आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाने देने का भी विरोध किया गया है। भारत के लिए यह हिस्सा खास महत्व रखता है क्योंकि पहलगाम हमले के बाद आतंकवाद का मुद्दा भारत की विदेश नीति और सुरक्षा कूटनीति में प्रमुख मुद्दा बना रहा है।
ब्रिक्स घोषणापत्र में कहा गया है कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। घोषणापत्र में आतंकवादी गतिविधियों और उन्हें समर्थन देने वालों को जवाबदेह ठहराने की बात कही गई है। साथ ही आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में दोहरे मानदंड नहीं अपनाने की अपील की गई है। ब्रिक्स ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक प्रयास अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकार कानून, शरणार्थी कानून और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के अनुरूप होने चाहिए।
नस्ली और धार्मिक भेदभाव पर भी सख्त संदेश
घोषणापत्र में नस्लवाद, नस्ली भेदभाव, विदेशियों के प्रति घृणा और धार्मिक भेदभाव के खिलाफ भी आवाज उठाई गई है।
ब्रिक्स देशों ने दुनिया में बढ़ती हेट स्पीच, गलत सूचना और दुष्प्रचार के रुझान पर चिंता जताई। यह हिस्सा भी मौजूदा वैश्विक राजनीति के संदर्भ में अहम है। दुनिया के कई देशों में प्रवासियों, धार्मिक समुदायों और नस्ली अल्पसंख्यकों के खिलाफ राजनीतिक बयानबाजी बढ़ी है। ब्रिक्स ने कहा कि नस्ल, धर्म, आस्था या विश्वास के आधार पर भेदभाव और उत्पीड़न से लड़ने की जरूरत है।
क्या यह ट्रंप के खिलाफ साझा मोर्चा है?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नई दिल्ली घोषणापत्र को ट्रंप के अमेरिका के खिलाफ ब्रिक्स का साझा राजनीतिक संदेश माना जाए? सीधे तौर पर ऐसा कहना मुश्किल है। घोषणापत्र में न तो डोनाल्ड ट्रंप का नाम है और न ही अमेरिका का। इसमें किसी एक देश को व्यापार, प्रतिबंध या युद्ध के मुद्दे पर सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है। लेकिन घोषणापत्र में जिन नीतियों पर आपत्ति जताई गई है- एकतरफा टैरिफ, एकतरफा आर्थिक प्रतिबंध, सेकेंडरी प्रतिबंध, सैन्य कार्रवाई, परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले और पश्चिम एशिया में इसराइली कार्रवाई- उनमें से कई का सीधा संबंध मौजूदा अमेरिकी विदेश और व्यापार नीति से जुड़ता है।
BRICS का बड़ा संदेश क्या है?
नई दिल्ली घोषणापत्र से एक बात साफ़ है कि ब्रिक्स खुद को केवल आर्थिक सहयोग के मंच तक सीमित नहीं रखना चाहता। समूह वैश्विक व्यापार, युद्ध, सुरक्षा, आतंकवाद, परमाणु सुरक्षा, फलस्तीन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर भी अपनी सामूहिक आवाज दर्ज कर रहा है। घोषणापत्र में बार-बार बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीति और संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था पर जोर दिया गया है।
इसका एक अर्थ यह भी है कि ब्रिक्स ऐसी वैश्विक व्यवस्था की वकालत कर रहा है जिसमें किसी एक देश को व्यापार, वित्तीय प्रतिबंधों या सैन्य ताकत के जरिए बाकी दुनिया पर अपनी शर्तें थोपने की सीमित गुंजाइश हो। यही वजह है कि भले ही इसमें अमेरिका या ट्रंप का नाम नहीं है, लेकिन नई दिल्ली घोषणापत्र को मौजूदा अमेरिकी नीतियों के संदर्भ में पढ़े जाने की पर्याप्त वजह मौजूद है।