नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सर्वसम्मति से 'नई दिल्ली घोषणापत्र' अपनाया गया, जिसमें एकतरफा ट्रेड टैरिफ और वैश्विक सुरक्षा मुद्दों पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। घोषणापत्र में वैश्विक व्यापार के सुचारू रूप से चलने पर जोर दिया गया।
ब्रिक्स में शामिल पुतिन, मोदी और जिनपिंग
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से 'नई दिल्ली घोषणापत्र' को स्वीकार किया है। घोषणापत्र में दुनिया में बढ़ते युद्धों, परमाणु खतरे, एकतरफा व्यापार शुल्क यानी टैरिफ, गैर-टैरिफ बाधाओं और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में बढ़ते तनाव पर गंभीर चिंता जताई गई। ब्रिक्स देशों ने साफ़ कहा है कि अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान बातचीत, सलाह-मशविरा और कूटनीति के ज़रिए होना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को ब्रिक्स नेताओं की बैठक के बाद सर्वसम्मति से स्वीकार किए गए इस घोषणापत्र की घोषणा की। इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी यूएनएससी समेत बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की ज़रूरत पर जोर दिया गया। साथ ही आतंकवाद की कड़ी निंदा की गई और एकतरफा सैन्य कार्रवाई तथा युद्ध के बढ़ते खतरों को लेकर चिंता जताई गई।
घोषणापत्र में वैश्विक व्यापार व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने की ज़रूरत पर भी जोर दिया गया। ब्रिक्स देशों ने कहा कि बढ़ते एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपाय अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नुकसान पहुंचा सकते हैं और इनमें से वे उपाय जो विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ के नियमों के अनुरूप नहीं हैं, वैश्विक व्यापार के लिए चिंता का विषय हैं।
एकतरफा टैरिफ पर ब्रिक्स की चिंता
ब्रिक्स घोषणापत्र में दुनिया में बढ़ते एकतरफा व्यापार शुल्कों पर गंभीर चिंता जताई गई। सदस्य देशों ने कहा कि ऐसे टैरिफ और गैर-टैरिफ उपाय जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित या विकृत करते हैं और डब्ल्यूटीओ के नियमों के अनुसार नहीं हैं, वैश्विक व्यापार व्यवस्था के लिए नुक़सानदेह हैं। ब्रिक्स देशों ने यह भी कहा कि व्यापार से जुड़े विवादों और मतभेदों को बातचीत और बहुपक्षीय व्यवस्था के ज़रिए सुलझाया जाना चाहिए।
घोषणापत्र में एकतरफ़ा दबाव वाले आर्थिक और अन्य उपायों की भी निंदा की गई, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताया गया है। ब्रिक्स का संदेश यह है कि किसी एक देश द्वारा अपनी आर्थिक या राजनीतिक ताकत के आधार पर दूसरे देशों पर दबाव डालने के बजाय अंतरराष्ट्रीय नियमों और संस्थाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
युद्ध के बजाय बातचीत और कूटनीति पर जोर
नई दिल्ली घोषणापत्र में अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को लेकर भी काफ़ी अहम बात कही गई। ब्रिक्स देशों ने संघर्षों की रोकथाम के लिए ज्यादा सक्रिय प्रयासों की ज़रूरत बताई। इसके लिए केवल तत्काल हिंसा रोकना ही नहीं, बल्कि संघर्षों के मूल कारणों को समझना और उनका समाधान करना भी जरूरी बताया गया।
ब्रिक्स नई दिल्ली घोषणापत्र में अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के प्रति ब्रिक्स देशों की प्रतिबद्धता दोहराई गई। इसके लिए संवाद, परामर्श और कूटनीति को प्रमुख रास्ता बताया गया।
ब्रिक्स ने अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर ऐसा बहुपक्षीय दृष्टिकोण अपनाने की वकालत की, जिसमें अलग-अलग देशों के विचारों और राष्ट्रीय परिस्थितियों का सम्मान हो। संगठन ने कहा कि दुनिया की जटिल समस्याओं का समाधान सहयोग और बातचीत से ही निकाला जा सकता है।
परमाणु ख़तरे को लेकर भी चिंता
घोषणापत्र में दुनिया में बढ़ते परमाणु ख़तरे और संघर्षों के जोखिम पर भी चिंता जताई गई। ब्रिक्स देशों ने अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता के लिए संघर्षों को रोकने की कोशिशों को मज़बूत करने की ज़रूरत बताई। यह चिंता तब जताई गई है जब दुनिया के कई हिस्सों में सैन्य तनाव और संघर्ष जारी हैं। घोषणापत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि युद्ध और टकराव को बढ़ने देने के बजाय समय रहते बातचीत और कूटनीति का रास्ता अपनाया जाना चाहिए।
‘एकतरफ़ा युद्ध कार्रवाई’ की निंदा
ब्रिक्स नेताओं ने एकतरफ़ा युद्ध कार्रवाई की निंदा की और अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक रास्ते को प्राथमिकता देने की बात कही। घोषणापत्र में मध्य पूर्व में जारी सैन्य संघर्ष के बीच समुद्री सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई गई। इसमें नाविकों की सुरक्षा और वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित बनाए रखने की ज़रूरत पर जोर दिया गया। ब्रिक्स ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा बेहद अहम है। किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष का असर समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक बाजार पर पड़ सकता है।
UNSC में सुधार की ज़रूरत पर जोर
नई दिल्ली घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग भी प्रमुखता से सामने आई। ब्रिक्स देशों ने बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की ज़रूरत बताई और यूएनएससी के ‘संरचनात्मक बदलाव’ की वकालत की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने समापन संबोधन में कहा कि बदलती दुनिया को पुरानी संस्थाओं के ज़रिए नहीं चलाया जा सकता है और प्रतिनिधित्व, जवाबदेही तथा नियम बनाने की प्रक्रिया में सुधार ज़रूरी है।पीएम मोदी ने कहा कि ग्लोबल साउथ को वैश्विक संस्थाओं में केवल भागीदारी ही नहीं, बल्कि फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में भी बराबर की जगह मिलनी चाहिए।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और इसके विस्तार की मांग करता रहा है। भारत का तर्क रहा है कि मौजूदा वैश्विक संस्थाओं की संरचना आज की आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती।
‘ग्लोबल साउथ’ की बराबर भागीदारी
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वैश्विक संस्थाओं में ग्लोबल साउथ के देश कई बार सामने की पंक्ति में दिखाई देते हैं, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भूमिका पीछे रह जाती है। उन्होंने ऐसी व्यवस्था की ज़रूरत बताई जिसमें दुनिया के अलग-अलग देशों की आवाज सुनी जाए और उन्हें वैश्विक नियम बनाने की प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी मिले।
पीएम मोदी के अनुसार भविष्य की तकनीकों और उनके लिए बनाए जाने वाले नियमों के निर्माण में भी ग्लोबल साउथ की बराबर भागीदारी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि दुनिया को ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा जिसमें किसी एक शक्ति या सीमित देशों का प्रभुत्व न हो, बल्कि साझेदारी और सहयोग के आधार पर वैश्विक व्यवस्था आगे बढ़े।'ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार हो'
घोषणापत्र में ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार को लेकर भी अहम बात कही गई। इसमें कहा गया कि ब्रिक्स के भीतर होने वाला व्यापार धीरे-धीरे स्थानीय मुद्राओं में बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम की जा सके। इसका उद्देश्य ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार और भुगतान को अधिक सुविधाजनक बनाना तथा सीमा-पार लेनदेन से जुड़ी व्यावहारिक समस्याओं को कम करना है। घोषणापत्र में ब्रिक्स देशों के बीच सीमा-पार भुगतान के लिए व्यावहारिक समाधान तलाशने को लेकर बातचीत जारी रखने का भी समर्थन किया गया।
ब्रिक्स देशों ने वित्तीय सहयोग को मज़बूत करने की दिशा में भी काम जारी रखने पर सहमति जताई। विशेष रूप से अलग-अलग देशों की मुद्राओं में सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने के उपायों पर चर्चा जारी रखने की बात कही गई। ब्रिक्स के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने का विचार इसी व्यापक वित्तीय सहयोग का हिस्सा है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच व्यापार को आसान बनाना और अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में विकल्पों को मज़बूत करना है।
बहुपक्षवाद पर ब्रिक्स का जोर
नई दिल्ली घोषणापत्र का एक बड़ा संदेश बहुपक्षवाद को मज़बूत करना है। ब्रिक्स देशों ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों का समाधान किसी एक देश या कुछ देशों के फ़ैसलों से नहीं, बल्कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग से होना चाहिए। घोषणापत्र में अलग-अलग देशों के राष्ट्रीय हितों और दृष्टिकोणों के सम्मान की बात कही गई। ब्रिक्स ने कहा कि बड़े वैश्विक मुद्दों पर देशों के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इन मतभेदों को बातचीत और सहयोग के ज़रिए सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए।
घोषणापत्र को जमीन पर उतारना जरूरी: मोदी
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि शिखर सम्मेलन में हुई चर्चा से यह साफ़ है कि बदलती दुनिया को पुरानी संस्थाओं के ज़रिए नहीं चलाया जा सकता है। उन्होंने प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाने की प्रक्रिया में सुधार को जरूरी बताया। मोदी ने कहा कि नई दिल्ली घोषणापत्र ब्रिक्स देशों के साझा संकल्प को साफ़ दिशा देता है। अब जरूरत इन फैसलों को केवल घोषणाओं तक सीमित रखने के बजाय उन्हें जमीनी स्तर पर ठोस परिणामों में बदलने की है। उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिक्स किसी के खिलाफ नहीं है। संगठन का जोर आम सहमति, सहयोग और साझा समाधान तलाशने पर है।
घोषणापत्र का संदेश क्या?
नई दिल्ली घोषणापत्र में व्यापार से लेकर युद्ध और वित्तीय सहयोग तक कई ऐसे मुद्दों को शामिल किया गया है जिनका सीधा संबंध मौजूदा वैश्विक व्यवस्था से है।
एकतरफा टैरिफ और आर्थिक दबाव के खिलाफ चिंता, युद्ध और सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत पर जोर, परमाणु जोखिम को लेकर चेतावनी, समुद्री व्यापार की सुरक्षा, यूएनएससी में सुधार और ग्लोबल साउथ की अधिक भागीदारी- इन सभी मुद्दों को एक साथ रखकर ब्रिक्स ने बहुपक्षीय और सहयोग आधारित वैश्विक व्यवस्था की ज़रूरत पर जोर दिया है। घोषणापत्र का मूल संदेश यही है कि मौजूदा वैश्विक तनावों का समाधान टकराव बढ़ाने में नहीं, बल्कि संवाद, कूटनीति, सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार के जरिए तलाशना होगा।