सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने की विपक्ष की यह पहली कोशिश नहीं है। विपक्ष 12 मार्च और 24 अप्रैल 2026 को भी उनके खिलाफ ऐसी कोशिश कर चुका है। दोनों ही बार विपक्ष के नोटिस को स्वीकार नहीं किया गया। लेकिन इस बार विपक्ष आक्रामक मूड में दिख रहा है।
चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर जारी विवाद अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी तक पहुंच गया है। कांग्रेस ने विपक्षी दलों से संपर्क शुरू कर दिया है और विपक्षी सूत्रों के मुताबिक लोकसभा और राज्यसभा- दोनों सदनों में ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देने की तैयारी है। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि नोटिस अगले दो सप्ताह के भीतर पेश किया जा सकता है।
यह घटनाक्रम उस रिपोर्ट के बाद तेज हुआ है जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयोग के कई फैसलों और आदेशों पर कम-से-कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं। इनमें मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने, बहाल करने, Form 6 में बदलाव और मतदाता सूची से जुड़े SIR जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
कांग्रेस ने विपक्षी दलों से शुरू की बातचीत
Times of India की रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस ने विपक्षी दलों से बातचीत शुरू कर दी है ताकि दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव के लिए जरूरी समर्थन जुटाया जा सके। कांग्रेस सूत्रों ने कहा है कि विपक्षी दल दोनों सदनों में प्रस्ताव का नोटिस देने की तैयारी कर रहे हैं और इसे अगले दो सप्ताह के भीतर पेश किया जा सकता है। NDTV ने भी सूत्रों के हवाले से बताया है कि INDIA ब्लॉक के भीतर इस कदम को लेकर सहमति बन रही है और कांग्रेस ने इस पहल की अगुवाई करते हुए सहयोगी विपक्षी दलों से संपर्क किया है।
विवाद की जड़ में SIR और चुनाव आयोग के भीतर मतभेद
महाभियोग की ताजा कोशिश की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की रिपोर्ट है। रिपोर्ट के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग मौकों पर आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया, डेटा और SIR से संबंधित फैसले शामिल बताए गए हैं। विपक्ष इन रिपोर्टों को चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल के रूप में पेश कर रहा है।
कांग्रेस का आरोप है कि यदि आयोग के दो अन्य सदस्यों ने बार-बार आपत्तियां दर्ज की थीं, तो उन आपत्तियों को किस तरह निपटाया गया और अंतिम फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए गए- इसकी सार्वजनिक स्पष्टता जरूरी है।पहले भी दो बार हटाने की कोशिश
यह ज्ञानेश कुमार को हटाने की विपक्ष की पहली कोशिश नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक विपक्ष ने 12 मार्च और 24 अप्रैल 2026 को भी उनके खिलाफ हटाने के नोटिस दिए थे। 12 मार्च के नोटिस को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति ने स्वीकार नहीं किया था। अप्रैल में दिया गया दूसरा नोटिस भी पहले ही विवाद का विषय बन चुका है।24 अप्रैल को विपक्ष के 73 राज्यसभा सांसदों ने ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए नया नोटिस दिया था। इसमें कांग्रेस, TMC, समाजवादी पार्टी, DMK समेत विपक्षी दलों के सांसद शामिल थे। अब SIR को लेकर सामने आई नई जानकारी के बाद विपक्ष एक बार फिर इस मुद्दे को संसद में उठाने की तैयारी कर रहा है।
महाभियोग के लिए कितने सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी?
CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया सामान्य सरकारी कर्मचारी को हटाने जैसी नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है।
किसी सदन में प्रस्ताव का नोटिस देने के लिए:
- लोकसभा में कम-से-कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।
- राज्यसभा में कम-से-कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।
- नोटिस मिलने के बाद संबंधित पीठासीन अधिकारी यह तय कर सकते हैं कि प्रस्ताव को स्वीकार किया जाए या नहीं।
- स्वीकार किए जाने की स्थिति में जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
CEC को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करनी होती है। यानी केवल नोटिस देने से CEC को पद से हटाने की प्रक्रिया पूरी नहीं होती; यह एक लंबी संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया है।
विपक्ष का आरोप- CEC ने पद की गरिमा को नुकसान पहुंचाया
विपक्षी दलों ने पिछले कुछ दिनों में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगातार हमले तेज किए हैं। कांग्रेस ने उनके इस्तीफे की मांग की है। कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि उनके मुताबिक ज्ञानेश कुमार को पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है। कांग्रेस ने यह भी सवाल उठाया है कि चुनाव आयोग जैसे बहुसदस्यीय संवैधानिक निकाय में निर्णय प्रक्रिया किस तरह संचालित हुई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी SIR और मतदाता सूची को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। वहीं विपक्ष के कई अन्य नेताओं ने ज्ञानेश कुमार को हटाने और कुछ मामलों में उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।BJP और चुनाव आयोग का जवाब भी महत्वपूर्ण
इस पूरे विवाद में चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ BJP का पक्ष अलग है। चुनाव आयोग ने कहा है कि किसी बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में लिखित टिप्पणियां, सुझाव, तकनीकी आपत्तियां और आंतरिक checks and balances सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। EC का कहना है कि अंतिम निर्णय और आधिकारिक आदेश पूरे आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग ने यह भी कहा कि केवल कुछ आंतरिक टिप्पणियों और आपत्तियों पर ध्यान केंद्रित करने से उसकी व्यापक निर्णय प्रक्रिया की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।BJP सांसद संबित पात्रा ने भी विपक्ष को चुनौती दी है कि यदि उसे लगता है कि CEC के खिलाफ महाभियोग का आधार है तो वह संसद में प्रस्ताव लाए। BJP का कहना है कि आयोग के भीतर अलग-अलग विचार सामने आना अपने आप में किसी संस्थागत विफलता का प्रमाण नहीं है।
अब संसद में आमने-सामने होगा विपक्ष और चुनाव आयोग
इस तरह SIR का विवाद अब सिर्फ मतदाता सूची और नामों के जुड़ने-कटने तक सीमित नहीं रह गया है। चुनाव आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया, दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियां और CEC की भूमिका विपक्ष के राजनीतिक और संसदीय अभियान का केंद्र बन चुके हैं। कांग्रेस के विपक्षी दलों से संपर्क और दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने की तैयारी से यह साफ है कि मामला अब संसद में एक बड़े संवैधानिक टकराव का रूप ले सकता है। हालांकि, महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देना और CEC को वास्तव में पद से हटाना दो अलग-अलग चरण हैं, और अंतिम रूप से हटाने के लिए पूरी संवैधानिक-संसदीय प्रक्रिया पूरी करनी होगी।