कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर मतदाता रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में कथित तौर पर एकतरफा और गैरकानूनी बदलाव करने का आरोप लगाया है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में स्वतः संज्ञान (suo motu cognisance) लेने और CEC को जवाबदेह ठहराने की मांग की। रमेश ने कहा कि फॉर्म-6 में किए गए बदलाव से पहली बार वोट देने वाले युवाओं, खासकर Gen Z मतदाताओं के लिए मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की प्रक्रिया मुश्किल हुई है।
जयराम रमेश के मुताबिक, शुक्रवार देर रात चुनाव आयोग ने अधिकारियों को युवा मतदाताओं के लिए विशेष नामांकन शिविर लगाने और सोशल मीडिया के जरिए उनका व्यापक प्रचार करने का निर्देश दिया। लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि इससे पहले आयोग ने ऑनलाइन फॉर्म-6 में ऐसा नया प्रावधान जोड़ दिया था, जिससे नए मतदाताओं से उनके माता-पिता या दादा-दादी के पिछले Special Intensive Revision (SIR) में शामिल होने की जानकारी मांगी गई। रमेश का कहना है कि इससे ऐसे युवाओं के सामने मुश्किल पैदा हो सकती है जिनके माता-पिता या दादा-दादी पिछली SIR की मतदाता सूची में दर्ज नहीं थे।

कांग्रेस ने गिनाए तीन उल्लंघन

कांग्रेस महासचिव ने फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर तीन स्तरों पर कथित उल्लंघन का आरोप लगाया। उनका पहला आरोप हैः 
  • जुलाई 2026 की शुरुआत में ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव कर दिया गया, लेकिन इसकी कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई। 
  • दूसरा आरोप यह है कि चुनाव आयोग को स्वयं वैधानिक फॉर्म-6 में संशोधन करने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार Representation of the People Act, 1950 के तहत केंद्र सरकार के पास है।
  • तीसरा आरोप यह है कि फॉर्म में बदलाव के लिए Registration of Electors Rules, 1960 में भी कोई संशोधन नहीं किया गया।
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कांग्रेस का कहना है कि अगर वैधानिक फॉर्म में बदलाव करना था तो संबंधित नियमों में संशोधन की प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी। रमेश ने आरोप लगाया कि एक ऐसे फॉर्म में बदलाव किया गया जो कानून के तहत निर्धारित है और यह काम चुनाव आयोग ने एकतरफा तरीके से किया।

दो चुनाव आयुक्तों ने भी उठाई थी आपत्ति

यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने फॉर्म-6 से जुड़े बदलावों पर आपत्ति दर्ज की थी। इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के विभिन्न फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं। इनमें फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता नाम जोड़ने और हटाने तथा चुनावी डेटा के नियंत्रण से जुड़े मुद्दे शामिल थे।
रिपोर्ट के अनुसार, मई में विवेक जोशी ने कहा था कि SIR के लिए जारी निर्देशों के जरिये फॉर्म-6 में इस तरह बदलाव नहीं किया जा सकता और कानूनी रूप से टिकाऊ रास्ता यह होगा कि प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाए ताकि नियमों में आवश्यक संशोधन किया जा सके। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस राय से सहमति जताई थी। बाद में संधू ने अगस्त में ऑनलाइन फॉर्म में जोड़े गए प्रावधान को कथित तौर पर “unauthorised and illegal” बताते हुए तत्काल हटाने की बात कही थी।

फॉर्म में आखिर क्या जोड़ा गया था

फॉर्म-6 नए मतदाता के रूप में मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जुलाई में इसके ऑनलाइन संस्करण में SIR से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा/सेक्शन जोड़ा गया। इसमें आवेदक से यह बताने को कहा गया कि क्या उसका नाम या उसके माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में मौजूद था।
  • ऑनलाइन आवेदन में इस घोषणा को भरे बिना आवेदक आगे नहीं बढ़ पा रहा था। यही वजह है कि इस व्यवस्था पर सवाल उठे कि क्या पहली बार वोट देने वाले उन युवाओं के लिए अतिरिक्त बाधा पैदा की जा रही है जिनके परिवार का पिछली SIR की सूची में रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराई

जयराम रमेश ने कहा कि CEC ज्ञानेश कुमार का पद पर बने रहना लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए गंभीर सवाल खड़ा करता है और उन्होंने तत्काल इस्तीफे की मांग दोहराई। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट को मामले का स्वतः संज्ञान लेकर जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। रमेश ने राहुल गांधी की उस मांग का भी उल्लेख किया जिसमें CEC से इस्तीफा देने की बात कही गई है।
यह विवाद चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की उन रिपोर्टों के बाद और बढ़ा है जिनमें दो चुनाव आयुक्तों द्वारा कई फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात सामने आई थी। चुनाव आयोग ने दूसरी ओर कहा है कि किसी भी संस्थान में अधिकारियों के बीच अलग-अलग विचार और टिप्पणियां होना deliberative process का हिस्सा है और आयोग के आदेश वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप हैं।

चुनाव आयोग ने किया बदलाव लेकिन माना नहीं, हकीकत जानिए

चुनाव आयोग ने कहा है कि फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है। आयोग के मुताबिक, SIR से संबंधित जानकारी को मूल फॉर्म-6 में संशोधन के रूप में नहीं बल्कि एक अलग annexure/घोषणा के रूप में जोड़ा गया था। आयोग ने यह भी कहा कि उसके सभी आदेशों को कानूनी आधार प्राप्त है और वे निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के तहत जारी किए गए हैं। लेकिन इसमें पेंच है। आगे पढ़िएः
  • यह घोषणा निर्देशों के जरिए जोड़ी गई थी और मूल फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं हुआ। लेकिन ऑनलाइन फॉर्म भरने वाले या आवेदन करने वाले व्यक्ति के लिए इस घोषणा को पूरा करना अनिवार्य था और इसके बिना वह आवेदन आगे जमा नहीं कर सकता था। 
विवाद का केंद्र यह है कि नए मतदाताओं से केवल उनकी अपनी पात्रता की जानकारी लेने के बजाय SIR में उनके माता-पिता या परिवार के पुराने रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी क्यों मांगी जा रही है। आलोचकों का कहना है कि इससे ऐसे युवाओं को परेशानी हो सकती है जिनके परिवार का नाम पिछली SIR सूची में नहीं था।

विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा

फॉर्म-6 और SIR को लेकर विवाद अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में एक अलग याचिका भी दायर की जा चुकी है, जिसमें CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कथित वैधानिक उल्लंघनों की जांच, मूल फॉर्म-6 बहाल करने और SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए करीब 13 करोड़ नामों की जांच के लिए SIT गठित करने की मांग की गई है। याचिका में डिप्टी चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और ECI की IT प्रमुख सीमा खन्ना के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की गई है।
इस तरह फॉर्म-6 का विवाद अब युवा मतदाताओं के नाम जोड़ने की प्रक्रिया, चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों, SIR की वैधानिकता और आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया- इन चारों सवालों से जुड़ गया है। फिलहाल कांग्रेस के आरोपों और चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण के बीच मूल विवाद यह है कि SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा को क्या महज एक अलग annexure माना जाए या व्यवहार में यह वैधानिक फॉर्म-6 में ऐसा बदलाव था जिसके लिए नियमों में औपचारिक संशोधन जरूरी था।

ज्ञानेश कुमार को जेल भेजा जाये

कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, "देश की मांग है कि उनके खिलाफ जांच हो, और सिर्फ जांच ही नहीं, उन्हें जेल भेजा जाना चाहिए। उन्हें अपने पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। किस अधिकार से वे इस पद पर हैं? न तो स्वतंत्र चुनाव हो रहे हैं और न ही निष्पक्ष चुनाव, और आप जो कर रहे हैं उससे देश की छवि धूमिल हो रही है।"