जाति जनगणना को लेकर कांग्रेस ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर एक बार फिर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जाति जनगणना के लिए इस्तेमाल की जा रही मौजूदा प्रश्नावली को वापस लेने की मांग की है। दोनों नेताओं ने कहा है कि जातियों की सही संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का आकलन तभी संभव है, जब जाति की गणना सही और वैज्ञानिक तरीके से की जाए।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने मंगलवार को मीडिया के सामने खड़गे और राहुल के पत्रों को रखा। दोनों नेताओं ने 20 अगस्त को पीएम मोदी को लिखा था कि मौजूदा प्रश्नावली को रद्द कर राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और आम जनता से व्यापक सलाह-मशविरा करने के बाद नई प्रश्नावली तैयार की जाए। उन्होंने जाति सर्वेक्षण के लिए तेलंगाना और बिहार में अपनाए गए तरीकों को भी उदाहरण के तौर पर सामने रखा।

जाति दर्ज करने का तरीका गलत, नाम बिखरने का खतरा

कांग्रेस नेताओं की सबसे बड़ी आपत्ति जाति की जानकारी दर्ज करने के लिए अपनाए गए 'ओपन-एंडेड' सवाल को लेकर है। इस व्यवस्था में व्यक्ति अपनी जाति का जो नाम बताएगा, उसे उसी रूप में दर्ज किया जाएगा। खड़गे और राहुल का तर्क है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में एक ही जाति के अलग-अलग नाम, उपजातियां और स्थानीय या भाषाई रूप प्रचलित हैं। ऐसे में एक ही जाति के लोग अलग-अलग नाम दर्ज करा सकते हैं।
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उनका कहना है कि इससे एक ही जाति हजारों अलग-अलग नामों में बंट सकती है और अंततः जातियों के नामों की संख्या इतनी अधिक हो सकती है कि जाति जनगणना से मिलने वाला डेटा व्यावहारिक रूप से बेकार हो जाए। कांग्रेस नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि किसी समुदाय की वास्तविक आबादी सही तरीके से दर्ज नहीं होती है तो उसकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति का आकलन भी गलत होगा।

OBC की वास्तविक आबादी पता ही नहीं चल पाएगी

खड़गे और राहुल गांधी ने विशेष रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC की आबादी को लेकर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि मौजूदा प्रक्रिया में 'Backward Class' यानी पिछड़ा वर्ग के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इसलिए इस तरीके से देश में OBC आबादी का वास्तविक आकार सामने नहीं आ पाएगा।
कांग्रेस नेताओं के मुताबिक, गलत या अधूरा जातिगत डेटा पिछड़े, अति पिछड़े और दूसरे वंचित समुदायों के लिए नुकसानदेह हो सकता है। इसका असर शिक्षा, रोजगार, कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों पर पड़ सकता है। उनका तर्क है कि सामाजिक न्याय की नीतियां तभी प्रभावी ढंग से लागू की जा सकती हैं, जब सरकार के पास विभिन्न समुदायों की वास्तविक संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़ा विश्वसनीय डेटा हो।

कांग्रेस ने दिया 'ड्रॉप-डाउन लिस्ट' का सुझाव

खड़गे और राहुल गांधी ने जातियों की पहचान के लिए ड्रॉप-डाउन लिस्ट बनाने का सुझाव दिया है। उनका कहना है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की गणना में जिस तरह पहले से निर्धारित सूची का इस्तेमाल किया जाता है, उसी तरह जातियों की एक मानकीकृत सूची तैयार की जा सकती है।
कांग्रेस नेताओं के मुताबिक यह सूची पहले से उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर तैयार की जा सकती है। इसमें सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की सरकारी सूचियों तथा Anthropological Survey of India से उपलब्ध सूचनाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि तेलंगाना और बिहार में हुए जाति सर्वेक्षणों में भी इसी तरह की सूची आधारित व्यवस्था अपनाई गई थी।

तेलंगाना और बिहार के सर्वे की सूची भी PM को भेजी

खड़गे और राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र के साथ तेलंगाना जाति सर्वेक्षण 2024 और बिहार जाति सर्वेक्षण 2022 में इस्तेमाल की गई जातियों की सूचियों की प्रतियां भी भेजी हैं। उनका कहना है कि इन राज्यों के अनुभव से सीख लेकर राष्ट्रीय स्तर पर जाति गणना को अधिक सटीक बनाया जा सकता है।
दोनों नेताओं ने साफ कहा कि वे मौजूदा तरीके से की जा रही जाति जनगणना को स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है कि नई प्रश्नावली राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और आम लोगों से सलाह के बाद तैयार होनी चाहिए, ताकि हर जाति और समुदाय की वास्तविक संख्या सामने आ सके और जाति जनगणना सटीक, सार्थक और सामाजिक न्याय की नीतियों के लिए उपयोगी बन सके।

जयराम रमेश बोले- 'सरकार का प्रयास महज व्हाइटवॉश'

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर और तीखा हमला बोला। उन्होंने मौजूदा जाति जनगणना की प्रक्रिया को 'व्हाइटवॉश' करार दिया। रमेश ने कहा कि यह कांग्रेस नेतृत्व की ओर से प्रधानमंत्री मोदी को इस मुद्दे पर लिखा गया तीसरा पत्र है, लेकिन पिछले पत्रों का कोई जवाब नहीं मिला है।
रमेश के मुताबिक, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सबसे पहले 16 अप्रैल 2023 को प्रधानमंत्री को जाति जनगणना के संबंध में पत्र लिखा था। इसके बाद 5 मई 2025 को खड़गे ने प्रधानमंत्री को दो पन्नों का एक और विस्तृत पत्र भेजा था, जिसमें कई सुझाव दिए गए थे। रमेश ने दावा किया कि इन दोनों पत्रों पर प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्री या किसी अन्य अधिकारी की ओर से कोई जवाब नहीं मिला। रमेश ने यह भी कहा कि मौजूदा व्यवस्था में कुल 40 सवाल पूछे जाने की बात कही गई है और इनमें 10वां सवाल जाति से संबंधित होगा। उन्होंने इस व्यवस्था को 'सेल्फ-सैबोटाज' बताते हुए कहा कि इससे सामाजिक न्याय सुनिश्चित नहीं होगा।

जाति जनगणना पर बढ़ सकता है राजनीतिक दबाव

खड़गे और राहुल गांधी की यह मांग ऐसे समय आई है जब जाति जनगणना का मुद्दा कांग्रेस और विपक्ष के लिए सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बहस का एक प्रमुख विषय बना हुआ है। कांग्रेस का कहना है कि जातिगत आंकड़े सिर्फ संख्या जानने के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, सरकारी योजनाओं और सामाजिक न्याय की नीतियों को सही दिशा देने के लिए जरूरी हैं।
दूसरी ओर, कांग्रेस द्वारा प्रश्नावली में बदलाव और मानकीकृत जाति सूची की मांग से जाति जनगणना की पद्धति और डेटा की विश्वसनीयता को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होने के संकेत हैं। अब निगाहें केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया पर हैं कि वह कांग्रेस की इस मांग पर क्या रुख अपनाती है।