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जज नियुक्ति : सुप्रीम कोर्ट कॉलीजियम-केंद्र में फिर टकराव?

सुप्रीम कोर्ट कॉलीजियम और केंद्र सरकार के बीच फिर से टकराव बढ़ने के आसार हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि केंद्र सरकार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में 10 वकीलों को जज बनाने की सुप्रीम कोर्ट कॉलीजियम की सिफ़ारिश को फ़िलहाल टाल दिया है। तीन अन्य वकीलों को जज के रूप में नियुक्ति की सिफ़ारिश भी लंबित है। केंद्र ने 10 वकीलों के मामले में फिर से उसी बात पर आपत्ति की है कि ये वकील न्यूनतम आय की योग्यता पूरी नहीं करते हैं। पहले भी सुप्रीम कोर्ट कॉलीजियम की इस सिफ़ारिश पर केंद्र ने इसी बात पर आपत्ति की थी, लेकिन कॉलीजियम ने इसे विशेष परिस्थिति होने का हवाला देते हुए न्यूनतम आय योग्यता से छूट देने की दोबारा सिफ़ारिश की थी। 

ऐसी स्थिति तब है जब मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने हाल ही में सरकार से कहा है कि लंबित पड़ी सिफ़ारिशों को सरकार हरी झंडी दे, लेकिन सरकार इससे सहमत नहीं हुई। बताया जा रहा है कि केंद्र ने उन मामलों को टाल दिया है जिनमें वकील जज होने की योग्यता पूरी नहीं करते हैं।

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सरकारें आम तौर पर कॉलीजियम के फ़ैसलों को मानती रही हैं लेकिन हाल के दिनों में इसमें टकराव देखने को मिलते रहे हैं। मोदी सरकार ने हाल ही में गुजरात हाई कोर्ट के वरिष्ठतम जज जस्टिस अकील क़ुरैशी को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का चीफ़ जस्टिस बनाने की कॉलीजियम की सिफ़ारिश को लौटा दिया था। इससे पहले जस्टिस जोसफ़ के मामले में भी ऐसा ही हुआ था।

मोदी सरकार अपने पहले कार्यकाल में कई बार न्यायपालिका से टकराती रही। तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक बार कहा था कि भारत की न्यायपालिका लगातार विधायिका और कार्यपालिका की शक्तियों का अतिक्रमण कर रही है और अब केंद्र सरकार के पास केवल बजट बनाने का और वित्तीय अधिकार रह गए हैं। जेटली के इस बयान के बाद साफ़ हो गया था कि सरकार और न्यायपालिका में टकराव की स्थिति है। मोदी सरकार ने पहले कार्यकाल में कॉलीजियम को नेशनल जुडिशल अपॉइंटमेंट कमीशन यानी एनजेएसी से रिप्लेस करने की कोशिश की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच ने 2015 में इस प्रस्ताव को 4-1 से ठुकरा दिया था। तब कहा गया था कि एनजेएसी के जरिए सरकार सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में ख़ुद नियुक्तियाँ करना चाहती थी और इसके बाद से ही सरकार और न्यायपालिका में विवाद बढ़ गया था।

बता दें कि कॉलीजियम शीर्ष न्यायपालिका में जजों को नियुक्त करने और प्रमोशन देने की सिफ़ारिश करने वाली सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों की एक समिति है। यह समिति जजों की नियुक्तियों और उनके प्रमोशन की सिफ़ारिशों को केंद्र सरकार को भेजती है और सरकार इसे राष्ट्रपति को भेजती है। राष्ट्रपति के कार्यालय से अनुमति मिलने का नोटिफ़िकेशन जारी होने के बाद ही जजों की नियुक्ति होती है।

केंद्र सरकार की क्या है आपत्ति?

बहरहाल, इलाहाबाद हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति का जो मामला है वह भी टकराव की ओर ही इशारा करता है। ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, इलाहाबाद हाई कोर्ट में कम से कम 13 जजों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलीजियम की सिफ़ारिश केंद्र सरकार के पास लंबित है। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से दस वकील न्यूयनतम आय की योग्यता पूरी नहीं करते हैं। हालाँकि तीन अन्य वकील सभी योग्यता पूरी करते हैं।

बता दें कि हाई कोर्ट जज होने के लिए एक वकील को सिफ़ारिश किए जाने से पहले आख़िरी के पाँच साल में इस पेशे से औसत रूप से सात लाख रुपए वार्षिक आय होनी चाहिए।

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कॉलीजियम ने ही बनाए थे नियम

‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी और एस.ए. बोबडे ने इन वकीलों के नामों की सिफ़ारिश की है। अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार की राय है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलीजियम का निर्णय हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में कुछ शर्तों का उल्लंघन है, क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट के अपने बनाए नियम के अनुरूप नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के पाँच शीर्ष न्यायाधीशों द्वारा 10 मार्च, 2017 को मेमोरेंडम ऑफ़ प्रोसीज़र (एमओपी) तय किया गया है जिसमें हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए दिशा-निर्देश हैं। इन पाँच जजों में तत्कालीन सीजेआई जे.एस. खेहर, जस्टिस दीपक मिश्रा, जे चेलामेश्वर, रंजन गोगोई और मदन बी लोकुर शामिल थे। इसमें ही अन्य योग्यताओं के अलावा सात लाख रुपये के न्यूनतम आय की योग्यता भी शामिल है।

रिपोर्ट के अनुसार, तब से मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाले कॉलीजियम ने उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कई सिफ़ारिशें की हैं और कई उम्मीदवारों को संबंधित हाई कोर्ट कॉलेजियम द्वारा उनके नाम की सिफ़ारिश किए जाने के बावजूद न्यूनतम आय मानदंडों को पूरा नहीं करने के लिए नामंज़ूर भी किया है।

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कॉलीजियम छूट देने के पक्ष में क्यों?

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट कॉलीजियम द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के लिए 10 वकीलों की सिफ़ारिशों को केंद्र ने उनकी अयोग्यता की ओर इशारा करते हुए टाल दिया था। हालाँकि, छह महीने बाद इस साल फ़रवरी में कॉलीजियम ने फिर से इन नामों को दोहराया। इसमें कॉलीजियम ने कहा कि उन मामलों में आय की सीमा में कुछ हद तक ढील देना उचित है जहाँ ऐसी सिफ़ारिशें एससी/एसटी/ओबीसी की श्रेणियों की हों या फिर ऐसे वकील से संबंधित हों जो अपनी क्षमता के अनुरूप स्थायी/पैनल वकील के रूप में सरकार का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट कॉलीजियम ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति का मामला दूसरी बार भेजा है और यह दूसरी बार है कि केंद्र सरकार ने इसे टाल दिया है। इसका मतलब साफ़ है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलीजियम और केंद्र सरकार के अलग-अलग विचार हैं। अब यदि दोनों में से कोई भी पक्ष लचीला रुख नहीं अपनाएगा तो टकराव की स्थिति तो बनेगी ही।
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