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धार्मिक आज़ादी के अधिकार में धर्मांतरण का अधिकार शामिल नहीं: केंद्र

केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार में दूसरे लोगों को धर्मांतरण करने का मौलिक अधिकार शामिल नहीं है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर यह बात कही है। क़रीब पखवाड़ा भर पहले ही शीर्ष अदालत ने केंद्र को हलफनामा दायर करने को कहा था।

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने देश में जबरन धर्मांतरण के मुद्दे पर चिंता जताई थी और इसने केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। अदालत ने कहा था कि जबरन धर्म परिवर्तन एक बेहद गंभीर मुद्दा है। इसने केंद्र सरकार से कहा था कि ऐसे मामलों को रोकने के लिए क़दम उठाया जाए। 

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सुप्रीम कोर्ट वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है। याचिका में दावा किया गया था कि देश भर में धोखाधड़ी और धोखे से धर्मांतरण हो रहा है और केंद्र सरकार इसके ख़तरे को नियंत्रित करने में विफल रही है।

केंद्र ने हलफनामा में कहा है कि इस मुद्दे की गंभीरता इसके संज्ञान में है। एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा है कि धर्मांतरण के इस तरह के मुद्दे को केंद्र द्वारा पूरी गंभीरता से लिया जाएगा और उचित कदम उठाए जाएंगे क्योंकि केंद्र सरकार खतरे से अवगत है। रिपोर्ट के अनुसार इसने कहा, 'धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में निश्चित रूप से किसी व्यक्ति को धोखाधड़ी, धोखे, जबरदस्ती, लालच या ऐसे अन्य तरीकों से धर्मांतरण करने का अधिकार शामिल नहीं है।'

केंद्र सरकार ने आगे कहा है कि नौ राज्यों ने इस प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए अधिनियम पारित किए। हलफनामे में कहा गया है कि ओडिशा, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और हरियाणा ऐसे राज्य हैं जहाँ पहले से ही धर्मांतरण पर क़ानून है।

हलफनामे में कहा गया है कि 'इस तरह के कानून महिलाओं और आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों सहित समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए ज़रूरी हैं।'

खंडपीठ ने अब मामले की सुनवाई के लिए पांच दिसंबर की तारीख तय की है।

बता दें कि क़रीब एक पखवाड़ा पहले जस्टिस एम आर शाह और हिमा कोहली की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा था कि वे प्रलोभन के ज़रिए की जा रही इस तरह की प्रथा को रोकने के उपाय बताएँ। इसने केंद्र सरकार से हलफनामा में यह भी बताने को कहा था कि इस तरह के जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए क्या क़दम उठाए जा सकते हैं।

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जस्टिस एमआर शाह ने कहा था, 'जबरन धर्मांतरण देश की सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए बेहतर है कि केंद्र अपना रुख साफ़ करे कि वह जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए क्या क़दम उठा रही है।'

बहस के दौरान इस मामले में याचिकाकर्ता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने कहा था कि या तो इस तरह के धर्मांतरण को नियंत्रित करने के लिए एक अलग क़ानून बनाया जाना चाहिए या अपराध को मौजूदा भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी में जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने कहा था कि यह मुद्दा क्षेत्र विशेष का नहीं है और एक पूरे देश की समस्या है जिसमें तत्काल दखल दिए जाने की ज़रूरत है।

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याचिकाकर्ता ने कहा था कि पूरे देश में हर हफ्ते प्रलोभन-धमकी, काले जादू आदि के ज़रिए जबरन धर्मांतरण की घटनाएँ सामने आती हैं।

याचिका में कहा गया है कि वास्तव में इस तरह के जबरन धर्मांतरण के शिकार अक्सर सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोग होते हैं, ख़ासकर, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग। याचिका में कहा गया है कि यह न केवल संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 25 का उल्लंघन करता है, बल्कि धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के भी खिलाफ है।

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