CJP की लीगल हेड रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही को दिल्ली सरकार के वकील अमोल सिन्हा ने मंजूरी दी। मामला साकेत कोर्ट के मजिस्ट्रेट पर सोशल मीडिया टिप्पणी से जुड़ा है।
सीजेपी प्रवक्ता रत्ना सिंह
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की लीगल अफेयर्स प्रमुख रत्ना सिंह की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील (क्रिमिनल) अमोल सिन्हा ने उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt of Court) की कार्यवाही शुरू करने के लिए अपनी सहमति दे दी है। रत्ना सिंह ने साकेत कोर्ट के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) अभिनव पांडे के खिलाफ सोशल मीडिया पर टिप्पणी करते हुए आरोप लगाया था कि जज किसी ‘मास्टर’ के इशारे पर काम कर रहे हैं।
यह मामला उस समय का है जब रत्ना सिंह ने दिल्ली पुलिस पर उन्हें कथित तौर पर अवैध रूप से हिरासत में रखने और विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से रोकने का आरोप लगाया था। उन्होंने इस संबंध में पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन अदालत से उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर न्यायिक अधिकारी के खिलाफ टिप्पणियां की थीं।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद 10 अक्टूबर 2026 को हुई घटनाओं से जुड़ा है। कॉकroach जनता पार्टी के नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनाई थी। यह प्रदर्शन दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित था। पार्टी का आरोप था कि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी और उसके नेताओं को प्रदर्शन में शामिल होने से रोकने के लिए हिरासत में लिया।रत्ना सिंह का आरोप था कि दिल्ली पुलिस ने उन्हें उनके घर के बाहर कथित तौर पर गलत तरीके से रोका और हिरासत में रखा। उन्हें प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए आगे बढ़ने नहीं दिया गया। इसके बाद 10 अक्टूबर को उन्होंने साकेत कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें उन्होंने संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और कथित हिरासत के मामले में राहत देने की मांग की थी। इस मामले की सुनवाई दक्षिण-पूर्वी जिला साकेत कोर्ट के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अभिनव पांडे ने की। अदालत ने रत्ना सिंह को मांगी गई राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत के इस आदेश से नाराज रत्ना सिंह ने X पर न्यायिक अधिकारी की कार्यशैली और फैसले पर सवाल उठाए।
X पर रत्ना सिंह ने क्या लिखा था?
साकेत कोर्ट के आदेश के बाद रत्ना सिंह ने दो पोस्ट किए। इन पोस्ट में उन्होंने न्यायिक अधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए। एक पोस्ट में उन्होंने लिखा था: “Judge serving the master. Went for break/meeting 4 times during entire hearing. Order without any application of law.” इसका अर्थ है कि जज अपने ‘मास्टर’ की सेवा कर रहे हैं। पूरी सुनवाई के दौरान चार बार ब्रेक या मीटिंग के लिए गए और कानून लागू किए बिना आदेश दे दिया।एक अन्य पोस्ट में उन्होंने दिल्ली पुलिस और जज दोनों पर सवाल उठाते हुए लिखा: “@DelhiPolice is following order from master. Judge is following order from master.” यानी दिल्ली पुलिस भी मास्टर के आदेश का पालन कर रही है और जज भी मास्टर के आदेश पर चल रहे हैं। इन्हीं टिप्पणियों को लेकर अब रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का रास्ता खुला है।
किसने की अवमानना की कार्रवाई की मांग?
रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग वकील कौशिक चटर्जी ने की थी। उन्होंने इस संबंध में दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील अमोल सिन्हा को दो बार शिकायत भेजी।
- - 14 अक्टूबर 2026: पहली शिकायत में रत्ना सिंह की सोशल मीडिया पोस्ट और साकेत कोर्ट के न्यायिक अधिकारी के खिलाफ की गई टिप्पणियों पर कार्रवाई की मांग की गई।
- - 28 अक्टूबर 2026: दूसरी शिकायत के जरिए अतिरिक्त सामग्री और बाद के बयानों को भी मामले में शामिल करने का अनुरोध किया गया।
- - 2 नवंबर 2026: अमोल सिन्हा ने कौशिक चटर्जी को लिखे पत्र में रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए सहमति दे दी।
- - 4 नवंबर 2026: इस सहमति की जानकारी सार्वजनिक हुई।
अमोल सिन्हा ने अपनी छह पन्नों की राय में कहा कि रत्ना सिंह की टिप्पणियां केवल न्यायिक आदेश की आलोचना तक सीमित नहीं थीं। इनमें न्यायिक अधिकारी की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए थे। उनके मुताबिक, किसी जज पर बिना तथ्यात्मक आधार के यह आरोप लगाना कि वह किसी बाहरी व्यक्ति या सत्ता के निर्देश पर काम कर रहा है, न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता को कमजोर कर सकता है।
किन कानूनी प्रावधानों के तहत हो सकती है कार्रवाई?
इस मामले में दो कानूनी प्रावधान महत्वपूर्ण हैं।
- 1. अवमानना अधिनियम की धारा 2(c)(i)
अदालत की आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की परिभाषा में ऐसे प्रकाशन या बयान शामिल हैं जो किसी अदालत की प्रतिष्ठा को बदनाम करें या उसकी न्यायिक सत्ता को कम करने की प्रवृत्ति रखते हों।
अमोल सिन्हा ने अपनी राय में कहा कि रत्ना सिंह की पोस्ट प्रथम दृष्टया इस प्रावधान के दायरे में आ सकती हैं।
- 2. अवमानना अधिनियम की धारा 15(2)
इस प्रावधान के तहत अधीनस्थ अदालत की आपराधिक अवमानना के मामले में हाई कोर्ट में कार्यवाही शुरू करने के लिए संबंधित कानून अधिकारी की सहमति आवश्यक होती है। अमोल सिन्हा की सहमति मिलने के बाद शिकायतकर्ता कौशिक चटर्जी अब इस आधार पर दिल्ली हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि रत्ना सिंह को अदालत ने अवमानना का दोषी घोषित कर दिया है। अभी यह कार्यवाही शुरू करने की कानूनी अनुमति है।
सरकार के वकील ने आलोचना और अवमानना के बीच क्या अंतर बताया?
अमोल सिन्हा ने अपनी राय में एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किया है। उनके मुताबिक, किसी न्यायिक आदेश की आलोचना करना अपने आप में अदालत की अवमानना नहीं है। किसी भी व्यक्ति को अदालत के फैसले की वैधता, तर्क और कानूनी आधार पर असहमति जताने का अधिकार है। यदि कोई व्यक्ति फैसले से असहमत है तो वह कानून में उपलब्ध अपील और अन्य कानूनी उपायों का इस्तेमाल कर सकता है।उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले P.N. Duda v. V.P. Shiv Shankar (1988) का भी उल्लेख किया। इस फैसले में न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष आलोचना और अदालत की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली टिप्पणियों के बीच अंतर को मान्यता दी गई थी। लेकिन अमोल सिन्हा के मुताबिक, रत्ना सिंह के मामले में विवाद केवल न्यायिक आदेश की आलोचना का नहीं है। उन्होंने जज पर किसी अज्ञात बाहरी ताकत के निर्देश पर काम करने का आरोप लगाया है। उनकी राय में इस तरह के आरोप न्यायिक अधिकारी की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सीधा सवाल खड़ा करते हैं। इससे न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
दिल्ली पुलिस और स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट पर टिप्पणियों को अलग रखा गया
इस पूरे विवाद में एक और महत्वपूर्ण पहलू है। वकील कौशिक चटर्जी ने रत्ना सिंह की बाद की टिप्पणियों को भी अपनी शिकायत में शामिल किया था। इनमें दिल्ली पुलिस और स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) की कार्यप्रणाली की आलोचना की गई थी। दरअसल, CJP के सह-संयोजक सौरव दास और अशुतोष रंका के खिलाफ भी निवारक कार्रवाई की गई थी। इस कार्रवाई और स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की भूमिका पर रत्ना सिंह ने सवाल उठाए थे। लेकिन अमोल सिन्हा ने इन टिप्पणियों को साकेत कोर्ट के जज के खिलाफ की गई टिप्पणियों से अलग माना।उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस और SEM व्यवस्था की आलोचना को केवल इसलिए आपराधिक अवमानना नहीं माना जा सकता कि उसमें कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। उनके मुताबिक, अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की सहमति मुख्य रूप से उन शुरुआती पोस्ट पर आधारित है, जिनमें साकेत कोर्ट के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट पर किसी अज्ञात ‘मास्टर’ के निर्देश पर काम करने का आरोप लगाया गया था।
अब आगे क्या होगा?
अमोल सिन्हा की सहमति के बाद शिकायतकर्ता कौशिक चटर्जी दिल्ली हाई कोर्ट में आपराधिक अवमानना की याचिका दाखिल कर सकते हैं। इसके बाद हाई कोर्ट इस मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार करेगा। यहां यह समझना जरूरी है कि दिल्ली सरकार के वकील की सहमति को अदालत का फैसला नहीं माना जा सकता। यह केवल आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की दिशा में एक कानूनी कदम है। अदालत को यह तय करना होगा कि रत्ना सिंह की टिप्पणियां वास्तव में आपराधिक अवमानना के दायरे में आती हैं या वे न्यायिक आदेश और न्यायिक प्रक्रिया की आलोचना की स्वीकार्य सीमा के भीतर थीं। अमोल सिन्हा ने भी अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि उनकी राय केवल प्रथम दृष्टया (Prima Facie) आकलन है। यह आपराधिक अवमानना के मामले में अंतिम निर्णय नहीं है और दिल्ली हाई कोर्ट इस पर स्वतंत्र रूप से विचार करेगा।CJP के लिए एक और कानूनी चुनौती
कॉकroach जनता पार्टी पिछले कुछ समय से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने को लेकर चर्चा में रही है। पार्टी के नेताओं का आरोप रहा है कि दिल्ली पुलिस ने उनके विरोध प्रदर्शनों को रोकने और नेताओं को हिरासत में लेने की कार्रवाई की। रत्ना सिंह की याचिका भी इसी घटनाक्रम से जुड़ी थी। अब पार्टी की कानूनी मामलों की प्रमुख के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की सहमति ने CJP के लिए एक नई कानूनी चुनौती खड़ी कर दी है। हालांकि, इस मामले का अंतिम परिणाम दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर निर्भर करेगा। फिलहाल रत्ना सिंह के खिलाफ अवमानना साबित नहीं हुई है।