यदि भारत के दोस्त अमेरिका, इसराइल और ईरान तीनों ही हैं तो फिर इनके बीच युद्ध में पाकिस्तान के मध्यस्थता करने की ख़बर क्यों आ रही है? क्या मोदी सरकार की बड़ी चूक हुई है? क्या पाकिस्तान कूटनीति में आगे निकल रहा है?
ईरान युद्ध शुरू होने से दो दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी की इसराइल यात्रा ने क्या भारत को वो झटका दिया जिसमें वह पाकिस्तान से भी पीछे चला गया? कम से कम कांग्रेस ने तो ऐसा ही आरोप लगाया है।
ईरान युद्ध में पाकिस्तान की मध्यस्थता की रिपोर्टों के बाद कांग्रेस ने पीएम मोदी और बीजेपी सरकार की विदेश नीति पर बड़ा हमला किया है। इसने कहा है कि अगर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टें सही हैं तो ईरान युद्ध में पाकिस्तान की मध्यस्थता भारत के लिए बहुत बड़ा झटका और उपेक्षा है। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया और उन्हें 'स्वघोषित विश्वगुरु' क़रार दिया।
कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके यह बयान दिया। उन्होंने लिखा, 'प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की कई रिपोर्टों में पाकिस्तान को उन मध्यस्थों में से एक बताया गया है जिसका इस्तेमाल एक तरफ अमेरिका और इसराइल तथा दूसरी तरफ ईरान के बीच किया जा रहा है। अगर ये रिपोर्टें सही हैं तो यह भारत के लिए बड़ा झटका और उपेक्षा है। इसके लिए पूरी तरह स्वघोषित विश्वगुरु जिम्मेदार हैं।'
कांग्रेस ने यह हमला तब किया जब ब्रिटेन के अख़बार फाइनेंशियल टाइम्स ने ख़बर दी कि पाकिस्तान खुद को पश्चिम एशिया के युद्ध को ख़त्म करने में मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है। पाकिस्तान ने इस्लामाबाद को वार्ता के लिए जगह बनाने का प्रस्ताव भी दिया है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इस रिपोर्ट पर कोई ठोस टिप्पणी नहीं की, लेकिन कहा कि 'अटकलें अंतिम नहीं मानी जा सकतीं जब तक व्हाइट हाउस आधिकारिक रूप से घोषणा न करे।' ईरान ने भी माना कि पाकिस्तान और तुर्की जैसे देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं।
कूटनीति में पिछड़ा भारत?
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद जयराम रमेश ने कहा कि पिछले एक साल से ज़्यादा समय से साफ़ है कि ऑपरेशन सिंदूर में भारत की सैन्य सफलता के बावजूद, उसके बाद पाकिस्तान की कूटनीति और नैरेटिव प्रबंधन मोदी सरकार से कहीं बेहतर रहा। उन्होंने कहा,पाकिस्तान पहले राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और वैश्विक स्तर पर बहुत नाजुक स्थिति में था, लेकिन अब उसे नई ज़िंदगी मिल गई है। डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के उस नेता का बार-बार गर्मजोशी से स्वागत किया, जिसकी भड़काऊ बातों ने 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमलों की पृष्ठभूमि तैयार की।
जयराम रमेश ने आगे कहा कि पाकिस्तानी आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस में दो बार बुलाया गया, जिसमें एक बार विशेष लंच भी शामिल था। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी इस्टैब्लिशमेंट ने ट्रंप के क़रीबी लोगों के साथ बहुत घनिष्ठ रिश्ता बना लिया है।
पीएम की इसराइल यात्रा ने भारत को पीछे धकेला?
कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी की फ़रवरी 2026 में इसराइल की यात्रा की आलोचना की। यह यात्रा 25 और 26 फरवरी को हुई थी, ठीक दो दिन पहले जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमले शुरू किए।
उन्होंने कहा, "मोदी की अविवेकपूर्ण इसराइल यात्रा हमारे राजनीतिक इतिहास में एक विनाशकारी फ़ैसला साबित होगी। इससे हम उस स्थिति से पीछे धकेल दिए गए जहां भारत मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता था और निभानी भी चाहिए थी। प्रधानमंत्री की 'हगलोमेसी' (झप्पी कूटनीति) की पोल पूरी तरह खुल चुकी है। अब देश को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।"
भारत के ईरान से संबंध पहले घनिष्ठ रहे हैं, लेकिन पीएम मोदी की इसराइल नीति से ईरान दूर होता दिखा। और युद्ध शुरू होने से दो दिन पहले की उनकी इसराइल यात्रा के बाद तो स्थिति और भी बदल गई।
ईरान-यूएस-इसराइल युद्ध
28 फरवरी को अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमले शुरू किए। उन्होंने दावा किया कि ईरान इसराइल के अस्तित्व के लिए ख़तरा बन गया है। अमेरिका इसराइल की सुरक्षा की गारंटी देता है। इसराइल का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के बहुत क़रीब है। ईरान हमेशा कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए है।
ईरान ने जवाब में इसराइल और अमेरिका के ठिकानों पर हमले किए, खाड़ी देशों के बड़े शहरों और कुछ जहाजों को निशाना बनाया। युद्ध अब भी जारी है और क्षेत्र में तनाव बहुत बढ़ गया है।
कांग्रेस का कहना है कि भारत की मजबूत सैन्य कार्रवाई के बावजूद कूटनीति में पाकिस्तान आगे निकल गया। पाकिस्तान को ट्रंप प्रशासन का समर्थन मिल रहा है, जबकि भारत पीछे छूट गया। पार्टी ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि उनकी विदेश नीति से भारत को नुक़सान हो रहा है।
सरकार की तरफ़ से अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। विपक्ष इस घटनाक्रम को मोदी सरकार की कूटनीतिक विफलता बता रहा है।