कांग्रेस ने रविवार को चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को ‘शाह इंस्टिगेटेड रिमूवल’ नाम दिया। और इस तरह पार्टी ने चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया को गृह मंत्री अमित शाह से प्रेरित होने यानी उनके इशारों पर वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने का आरोप लगाया। कांग्रेस ने कहा है कि एसआईआर के तीसरे चरण में 32 फीसदी लोगों के नाम हटने का ख़तरा है।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में करोड़ों वोटरों के नाम हटाए जा रहे हैं या हटने का ख़तरा है। उन्होंने कहा कि 2026 के मध्य में 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में तीसरा चरण शुरू हुआ। 12 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों के आंकड़ों का हवाला देते हुए जयराम ने दावा किया कि कुल 36.06 करोड़ वोटरों में से 6.18 करोड़ नाम हटा दिए गए हैं। यह दर 17 प्रतिशत से ज्यादा है।
उन्होंने आगे कहा, '5.43 करोड़ और वोटरों को नोटिस भेजे गए हैं, जिनमें अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए हैं। इससे 15 प्रतिशत और लोगों के नाम हटने का ख़तरा बढ़ जाता है। इस तरह कुल 32 प्रतिशत यानी करीब हर तीसरे वोटर के नाम या तो हटा दिए गए हैं या हटने का खतरा है।' उन्होंने दिल्ली, चंडीगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, मेघालय, महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, हरियाणा, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और पंजाब का नाम लिया, जहां बड़ी संख्या में नाम कटने या कटने के खतरे का दावा किया गया।

SIR में नाम कटने का प्रतिशत बढ़ रहा: कांग्रेस

जयराम रमेश ने कहा है कि हर चरण में नाम कटने का प्रतिशत काफ़ी ज़्यादा बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि चुनाव आयोग ने जून 2025 में बिहार में SIR का पहला चरण शुरू किया था। इसके बाद नवंबर 2025 में नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में दूसरा चरण चला। उनके अनुसार पहले दो चरणों में 7.8 करोड़ नाम हटाए गए जो पहले की सूची का करीब 13 प्रतिशत है।

जयराम ने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों को ज्यादा प्रभावित कर रही है।

दस्तावेज कहां से लाएंगे आम लोग: कांग्रेस

जयराम रमेश ने SIR की पूरी प्रक्रिया में एक बड़ा सवाल दस्तावेजों के बोझ को लेकर उठाया। उनका आरोप है कि पहले मतदाता सूची को सत्यापित करने की जिम्मेदारी प्रशासन की थी, लेकिन SIR में बड़ी संख्या में नागरिकों पर अपनी पात्रता साबित करने का बोझ डाल दिया गया है।

उन्होंने कहा कि कई नागरिकों के पास ऐसे दस्तावेज हो ही नहीं सकते जो उनसे मांगे जा रहे हैं। खासकर गरीब, प्रवासी मजदूर, ग्रामीण आबादी और ऐसे परिवार जिनके पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, उनके लिए यह प्रक्रिया मुश्किल हो सकती है।
जयराम रमेश ने इसे ऐसी परीक्षा बताया जिसे बड़ी संख्या में नागरिकों के लिए पास करना मुश्किल हो सकता है और आरोप लगाया कि ऐसी व्यवस्था मतदाता सूची से लोगों को बाहर करने का माध्यम बन सकती है।

कांग्रेस का दावा- वंचित तबकों पर ज्यादा असर

जयराम रमेश ने SIR के सामाजिक प्रभाव को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का असर आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर लोगों पर अधिक पड़ सकता है। उनका कहना है कि जिन लोगों के पास पुराने दस्तावेज नहीं हैं या जो लंबे समय से एक जगह से दूसरी जगह जाते रहे हैं, उनके लिए अपनी पात्रता साबित करना मुश्किल हो सकता है।

कांग्रेस ने यह भी दावा किया कि कई प्रमुख राज्यों में महिलाओं के नाम पुरुषों की तुलना में ज्यादा संख्या में हटाए गए हैं।

जयराम ने एक्स पर पोस्ट किए बयान में बताया कि कर्नाटक, तेलंगाना और झारखंड में नाम कटने वाले लोगों की सूची सार्वजनिक कर दी गई है, ताकि वोटर चेक कर सकें। दिल्ली ने 19 सितंबर 2026 को दबाव के बाद सूची जारी की, जबकि अन्य बीजेपी शासित राज्यों और पंजाब ने अभी तक ऐसा नहीं किया।

दिल्ली में भी SIR को लेकर विवाद

SIR को लेकर दिल्ली में भी राजनीतिक और कानूनी विवाद चल रहा है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक दिल्ली में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए हैं और कई लोगों को नोटिस भेजे गए हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत कई चर्चित लोगों को भी नोटिस मिलने की रिपोर्ट सामने आई है। रेखा गुप्ता का नाम दस्तावेज सत्यापन के बाद सूची में बहाल किए जाने की बात भी सामने आई है।

इस बीच दिल्ली की SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई भी प्रस्तावित है। याचिका में 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज' के आधार पर नोटिस जारी करने की प्रक्रिया और उसकी पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए हैं।

चुनाव आयोग क्या कहता है?

चुनाव आयोग का कहना है कि SIR प्रक्रिया 22 साल बाद हो रही है। इसका मक़सद वोटर सूची साफ करना, अयोग्य और दोहरे नाम हटाना तथा पात्र नागरिकों को शामिल करना है। ग़लत तरीक़े से बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटने के विपक्षी दलों के आरोपों को आयोग ने खारिज किया है।

कपिल सिब्बल का हमला

इधर, राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधा। उन्हें वोटर रजिस्ट्रेशन को लेकर नोटिस मिला था। सिब्बल ने कहा कि ज्ञानेश कुमार उनकी नागरिकता को शक की नज़र से देख रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि वोटर सूची से नाम हटाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच सकता है।
सिब्बल ने तंज कसते हुए कहा, 'मैं ज्ञानेश कुमार को बधाई देता हूं। वे सोचते हैं मेरी नागरिकता शक के घेरे में है। मैं तथ्य सामने रखना चाहता हूं। ज्ञानेश कुमार कैसे लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा रहे हैं, यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट जाएगा।' उन्होंने अपने दस्तावेज दिखाते हुए बताया कि उनका नाम ड्राफ्ट रजिस्टर में है। वे पहले सांसद थे और पटना में वोट देते थे। बीएलओ आने पर उन्होंने फॉर्म भरा था, जिस पर उनके और बीएलओ दोनों के हस्ताक्षर हैं। फिर भी नोटिस कैसे मिला?

सिब्बल ने शिकायत की कि नोटिस फिजिकल रूप से नहीं भेजा गया, उन्होंने सिर्फ वेबसाइट पर देखा। उन्होंने कहा, 'अगर मेरे साथ ऐसा हो रहा है तो आम लोगों के कितने वोट कटेंगे, अंदाजा लगा सकते हैं। चुनाव आयोग कैसे काम कर रहा है, यह साफ दिख रहा है।' सिब्बल ने आम नागरिकों की चिंता जताई जो कानूनी जानकारी या संसाधन नहीं रखते और डिजिटल पोर्टल चेक नहीं कर सकते।