संसदीय पैनल में शामिल कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने कहा, "संसद की वित्त मामलों की स्थायी समिति ने UPI टैक्स के उस प्रस्ताव पर चर्चा नहीं की है, जिसकी घोषणा मोदी सरकार ने हाल ही में की है।" मनीष तिवारी ने भी गोगोई की बात का समर्थन किया।
कांग्रेस नेता गौरव गोगोई की UPI शुल्क मामले पर सफाई
क्या कांग्रेस सांसदों ने संसदीय समिति में UPI शुल्क का समर्थन किया था? मीडिया रिपोर्टों में आए इन दावों को कांग्रेस ने खारिज किया है। रिपोर्टों में कहा गया था कि यूपीआई शुल्क की रिपोर्ट तैयार करने वाली वित्त मामलों की स्थायी समिति में कांग्रेस सांसद पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ शामिल थे और उन्होंने शुल्क का समर्थन किया था। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई और मनीष तिवारी ने इस दावे को खारिज किया है।
दोनों सांसदों का कहना है कि 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले मौजूदा शुल्क का कोई स्पेसिफिक प्रस्ताव समिति के सामने नहीं रखा गया था। उनके मुताबिक समिति के सामने न तो प्रस्तावित दर तय थी, न प्रति लेन-देन शुल्क की सीमा, न छूट की श्रेणियां और न ही दूसरे विस्तृत प्रावधान। उन्होंने कहा कि हालाँकि समिति में यूपीआई पर एमडीआर के सिद्धांत और ज़रूरत को लेकर चर्चा ज़रूर हुई थी।
इस मुद्दे पर बड़ा विवाद इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि सरकार द्वारा लाए गए इस यूपीआई शुल्क का राहुल गांधी ने यूपीआई टैक्स कहकर सरकार की आलोचना की है और इसे वापस लेने के मांग की है। राहुल गांधी की आलोचना के बाद मीडिया में सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी का बयान आया कि वित्त संबंधी स्थायी समिति ने यूपीआई के लिए कई स्तरीय एमडीआर यानी राजस्व मॉडल की जरूरत बताई थी और इसे जल्द अधिसूचित और लागू करने की सिफारिश की थी। इस आधार पर सरकार ने कांग्रेस पर सवाल उठाया कि अगर उसके सांसद समिति में इस तरह के मॉडल के पक्ष में थे तो राहुल गांधी अब इसका विरोध क्यों कर रहे हैं। सरकार की ओर से यह तर्क रखे जाने के बाद कांग्रेस सांसदों ने सरकार के इस दावे को खारिज कर दिया कि उन्होंने 'यूपीआई टैक्स' का समर्थन किया है।
‘UPI टैक्स’ प्रस्ताव पर समिति में चर्चा नहीं हुई: गोगोई
वित्त संबंधी स्थायी समिति के सदस्य कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि समिति ने उस यूपीआई टैक्स प्रस्ताव पर चर्चा नहीं की, जिसे सरकार ने हाल में लागू करने का फ़ैसला किया है। गोगोई ने यह भी कहा कि मौजूदा यूपीआई शुल्क व्यवस्था छोटे कारोबारियों, दुकानदारों और उद्यमियों को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने सरकार से इस नीति को वापस लेने की मांग की। उनका आरोप है कि नई व्यवस्था का फायदा बड़े अमेरिकी कॉरपोरेट्स को हो सकता है, जबकि छोटे भारतीय व्यापारियों पर लागत का दबाव बढ़ सकता है।
गोगोई के मुताबिक़ जब वित्त विभाग के अधिकारी समिति के सदस्यों के सामने आए थे, तब उनके पास UPI पर शुल्क लगाने का कोई स्पेसिफिक और साफ़ प्रस्ताव नहीं था। उन्होंने कहा कि एमडीआर की ज़रूरत को लेकर सदस्यों ने सवाल जरूर पूछे थे, लेकिन उस समय सरकार के प्रतिनिधि इन सवालों पर कोई साफ़ या संतोषजनक जवाब नहीं दे सके थे।
गौरव गोगोई और मनीष तिवारी का कहना है कि सामान्य तौर पर एमडीआर या एक टिकाऊ राजस्व मॉडल पर चर्चा और मौजूदा सरकार द्वारा घोषित स्पेसिफिक एमडीआर व्यवस्था का समर्थन- दो अलग बातें हैं।
मनीष तिवारी भी गोगोई के समर्थन में
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी गोगोई के बयान का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि संसदीय स्थायी समितियों की कार्यवाही विशेषाधिकार प्राप्त और गोपनीय होती है। उनके मुताबिक़ समिति की कार्यवाही को राजनीतिक फायदे के लिए इस तरह पेश करना सही नहीं है। तिवारी ने कहा कि 15 अक्टूबर 2026 से यूपीआई लेनदेन पर लागू होने वाले नए एमडीआर के संबंध में समिति के सामने कोई स्पेसिफिक प्रस्ताव नहीं आया था। उन्होंने खास तौर पर कहा कि समिति के सामने यह तय प्रस्ताव नहीं रखा गया था कि-
- एमडीआर की दर कितनी होगी,
- शुल्क की वास्तविक राशि कितनी होगी,
- प्रति लेनदेन अधिकतम सीमा क्या होगी,
- किन लेनदेन पर छूट मिलेगी,
- और कौन-कौन से लेनदेन इस व्यवस्था के दायरे में आएंगे।
तिवारी के मुताबिक, एमडीआर के सिद्धांत को लेकर भी समिति की विभिन्न बैठकों में सदस्यों ने इसकी ज़रूरत और प्रभावशीलता पर सवाल उठाए थे। इसलिए यह कहना कि समिति के ‘कुछ सदस्यों’ ने मौजूदा व्यवस्था का समर्थन किया था, समिति की गोपनीय कार्यवाही का गलत अर्थ निकालना है।
सरकार ने क्या किया था दावा?
सरकार की ओर से सामने आए दावे के मुताबिक़ वित्त संबंधी स्थायी समिति ने यूपीआई के लिए कई स्तरीय मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी अलग-अलग स्तर वाला एमडीआर मॉडल अपनाने की सिफारिश की थी। मीडिया रिपोर्टों में सरकार से जुड़े सूत्रों ने कहा कि 12 अगस्त को समिति की रिपोर्ट को अपनाए जाने के समय कांग्रेस के पांच सांसद- पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ- मौजूद थे। रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया कि प्रकाशित कार्यवाही में इन सांसदों की ओर से कोई असहमति दर्ज नहीं की गई थी।
समिति की रिपोर्ट में क्या कहा गया था?
मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि वित्त संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट में यूपीआई इकोसिस्टम के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल की ज़रूरत का ज़िक्र किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, समिति ने पहले की अपनी सिफारिश का उल्लेख करते हुए कहा कि एक व्यवहार्य राजस्व मॉडल ज़रूरी है और यूपीआई के लिए कई स्तरीय एमडीआर ढाँचे को सक्षम बनाने वाले क़ानूनी प्रावधान आगे बढ़ाए गए हैं।
रिपोर्ट में सरकार की ओर से 2026-27 के लिए दिए गए करीब 2000 करोड़ रुपये के आवंटन और उद्योग की अनुमानित करीब 20,700 करोड़ रुपये की परिचालन लागत के बीच बड़े अंतर पर भी चिंता जताई गई थी। समिति का तर्क था कि अगर भुगतान सेवा प्रदाताओं के पास पर्याप्त और स्थायी राजस्व मॉडल नहीं होगा तो साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने और नेटवर्क इन्फ्रास्ट्रक्चर में ज़रूरी निवेश प्रभावित हो सकता है।
राहुल गांधी ने क्या कहा था?
इस पूरे विवाद की शुरुआत कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के यूपीआई की नई शुल्क व्यवस्था के विरोध से भी जुड़ी है। राहुल गांधी ने सरकार से इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का यह फैसला अमेरिका और अमेरिकी कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाला है।
सरकार ध्यान भटकाने की कोशिश में?
गौरव गोगोई के बयान के बाद कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने गोगोई के बयान को सरकार के दावे का जवाब बताते हुए कहा कि यह पूरा विवाद सरकार द्वारा यूपीआई शुल्क को लेकर पैदा हुए विरोध से ध्यान हटाने की कोशिश है। कांग्रेस का कहना है कि संसदीय समिति में किसी नीति के व्यापक सिद्धांत पर चर्चा और किसी खास नीति के अंतिम स्वरूप का समर्थन अलग-अलग चीजें हैं।
सरकार का पक्ष है कि संसदीय समिति ने यूपीआई के लिए एक टिकाऊ, स्तरीय राजस्व मॉडल की जरूरत बताई थी और उसे लागू करने में देरी नहीं करने को कहा था। समिति की रिपोर्ट में भी ऐसे राजस्व मॉडल की जरूरत और मौजूदा फंडिंग अंतर का उल्लेख है।
वहीं, गौरव गोगोई और मनीष तिवारी का कहना है कि समिति के सामने 15 अक्टूबर से लागू होने वाली मौजूदा व्यवस्था का कोई प्रस्ताव नहीं आया था। उनके अनुसार, दर, शुल्क की सीमा और छूट जैसी अहम शर्तों पर समिति के सामने कोई स्पेसिफिक प्रस्ताव नहीं रखा गया था।