कांग्रेस नेताओं जयराम रमेश और पी. चिदंबरम ने बुधवार 15 अप्रैल को परिसीमन विधेयक को लेकर प्रधानमंत्री मोदी पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस नेताओं ने कहा देश को मोदी ने गुमराह किया। यह बिल दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक प्रभाव को कम करने का "शैतानी कदम" है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश और पी चिदम्बरम (दाएं)
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं जयराम रमेश और पी. चिदंबरम ने परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सरकार पर दक्षिणी राज्यों के साथ धोखाधड़ी करने और संघीय ढांचे को बिगाड़ने का आरोप लगाया है।
कांग्रेस के जयराम रमेश ने मोदी को गुमराह करने वाला नेता कहा
कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रधानमंत्री पर कड़े शब्दों में प्रहार किया।
झूठ बोलने का आरोप: जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री पर हमला हुए कहा कि उनकी एकमात्र विशेषता "गुमराह करने की बेजोड़ क्षमता" (Misleader) है। उन्होंने पीएम को "आदतन झूठ बोलने वाला" बताया जो गलती से भी सच नहीं बोल सकते।
परिसीमन पर धोखा: रमेश ने आरोप लगाया कि संसद के विशेष सत्र के लिए सरकार द्वारा लाए गए विधेयक प्रधानमंत्री के पुराने आश्वासनों के बिल्कुल विपरीत हैं।
राज्यों को नुकसान: उनके अनुसार, इस नए परिसीमन से दक्षिण भारतीय राज्य, उत्तर-पश्चिम भारत के छोटे राज्य और पूर्वी राज्य लोकसभा में अपनी ताकत खो देंगे।
वादे से मुकरना: उन्होंने सवाल किया कि सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में एकसमान आनुपातिक वृद्धि (Uniform Proportionate Increase) के वादे का क्या हुआ?
अंबेडकर की विरासत का अपमान: जयराम रमेश ने कहा कि ये विधेयक डॉ. आम्बेडकर की जयंती (14 अप्रैल) पर अपलोड किए गए, जो उनकी विरासत का अपमान है। उन्होंने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में आम्बेडकर द्वारा दी गई चेतावनी को याद दिलाते हुए कहा कि यह सरकार "संवैधानिक नैतिकता" से नहीं चल रही है।
चिदम्बरम ने विरोध का आह्वान किया
पूर्व वित्त मंत्री और तमिलनाडु के प्रमुख कांग्रेस नेता पी. चिदम्बरम ने भी ज़ोरदार हमला बोला। उन्होंने बुधवार को एक्स पर लिखा- पिछले सप्ताह मैंने जो आशंकाएँ व्यक्त की थीं, वे सही साबित हुईं। जब लोकसभा की संख्या 50% बढ़कर 543 से 815 हो जाएगी, तो तमिलनाडु की संख्या 39 से बढ़कर 58 हो जाएगी। लेकिन यह एक भ्रम है। परिसीमन होने पर यह घटकर 46 रह जाएगी। उत्तर प्रदेश की संख्या पहले 80 से बढ़कर 120 हो जाएगी और परिसीमन के बाद लगभग 140 तक पहुँच जाएगी। सभी दक्षिणी राज्यों, जिनका वर्तमान में प्रतिनिधित्व 24.3% है, का प्रतिनिधित्व घटकर 20.7% हो जाएगा। यह संघीय संतुलन को पूरी तरह से बिगाड़ने का एक कुटिल और शातिर प्रयास है। इसका विरोध होना चाहिए।
क्या है परिसीमन विवाद
परिसीमन (Delimitation) भारत में लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं को जनसंख्या के आधार पर नए सिरे से तय करने की संवैधानिक प्रक्रिया है। 84वें संशोधन के अनुसार 2026 तक सीटों की कुल संख्या फ्रीज थी, लेकिन 2026 के बाद (या 2011 जनगणना के आंकड़ों पर आधारित संशोधन के जरिए) परिसीमन की तैयारी हो रही है। सरकार लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 815 करने की योजना बना रही है ताकि 2029 चुनावों से पहले 33% महिला आरक्षण लागू हो सके। उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान) में जनसंख्या वृद्धि दर दक्षिण भारत (तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना) की तुलना में काफी अधिक रही है। इससे उत्तर के राज्यों को ज्यादा सीटें मिलने जा रही हैं, जबकि दक्षिण के राज्यों की हिस्सेदारी घटेगी। उदाहरण के लिए, अगर सीटें नहीं बढ़ाई जातीं तो उत्तर के राज्यों को कुल 43 अतिरिक्त सीटें मिलतीं और दक्षिण को 24 सीटों का नुकसान होता।
उत्तर भारत को इसका ज्यादा फायदा
उत्तर भारत को इस परिसीमन से सबसे बड़ा लाभ मिल रहा है क्योंकि इन राज्यों की जनसंख्या दक्षिण की तुलना में तेजी से बढ़ी है। उत्तर प्रदेश की मौजूदा 80 सीटें बढ़कर 120 (कुछ अनुमानों में 128) हो जाएंगी, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान को भी बड़ी बढ़ोतरी मिलेगी। सिर्फ जनसंख्या आधारित गणना में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 79% सीटों की वृद्धि हो सकती है। दक्षिण के राज्यों में केरल की सीटों में 0% बढ़ोतरी, तमिलनाडु में सिर्फ 26% और कर्नाटक-आंध्र में औसतन 30-40% बढ़ोतरी का अनुमान है। पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने आश्वासन दिया है कि दक्षिण के किसी भी राज्य की एक भी सीट नहीं घटेगी, लेकिन कुल सीटों के विस्तार के बावजूद उत्तर की राजनीतिक ताकत बढ़ जाएगी क्योंकि वहां की आबादी 40% से बढ़कर संसद में 50% से ज्यादा प्रतिनिधित्व पर काबिज हो जाएगी।
दक्षिण भारत इस प्रक्रिया को 'जनसंख्या नियंत्रण का दंड' मान रहा है क्योंकि उसने परिवार नियोजन नीतियों को बेहतर तरीके से लागू किया और आर्थिक रूप से मजबूत रहा है। दक्षिण के पांच राज्य कुल जीडीपी का 30% योगदान देते हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन समेत दक्षिणी नेता चेतावनी दे रहे हैं कि इससे संघीय ढांचा कमजोर होगा और उत्तर के राज्यों के बिना दक्षिण की सहमति से संवैधानिक संशोधन हो सकते हैं। कुल मिलाकर दक्षिण भारत की आवाज कमजोर पड़ेगी। राजनीतिक विश्लेषक इसे उत्तर-दक्षिण विभाजन का कारण बता रहे हैं, जो लोकतंत्र और संघवाद को चुनौती दे सकता है।
एम.के. स्टालिन की चुनौती
इस विवाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने मोर्चा खोल दिया है। कल जारी एक वीडियो संदेश में उन्होंने सीधे मोदी सरकार को चुनौती दी। स्टालिन ने तमिलनाडु में 1950 और 60 के दशक के आंदोलनों को याद दिलाते हुए केंद्र को चेतावनी दी कि राज्य अपने अधिकारों के हनन को बर्दाश्त नहीं करेगा।