loader
फ़ोटो साभार - ट्विटर

कोरोना: शहरों में काम चौपट, 80 किमी. तक पैदल ही गांवों को जा रहे मजदूर

कोरोना वायरस के कहर की सबसे ज़्यादा मार रोज कमाने-खाने वालों पर पड़ रही है। यह वह वर्ग है जो गांव-घर छोड़कर बड़े शहरों में प्राइवेट नौकरी करता है। लेकिन इस वायरस के कारण काम-धंधे बंद हो चुके हैं और कंप्लीट लॉकडाउन की घोषणा के बाद इन लोगों के लिये शहर छोड़कर गांव जाना मजबूरी हो गया है क्योंकि शहरों में रहने के लिये इनके पास कोई स्थायी आशियाना नहीं है। 

ताज़ा ख़बरें
एनडीटीवी ने ऐसे ही कुछ लोगों से बात की है, जो शहर छोड़कर अपने गांवों की ओर जा रहे हैं। तेज चमकते सूरज के बीच ये लोग भूखे-प्यासे अपने घरों की ओर बढ़ रहे हैं। 20 साल के अवधेश कुमार उन्नाव की एक फ़ैक्ट्री में काम करते हैं। वहां से बाराबंकी जिले में उनका गांव 80 किमी. दूर पड़ता है। अवधेश एनडीटीवी को बताते हैं कि उन्होंने मंगलवार शाम को चलना शुरू किया था और गुरुवार सुबह तक अपने गांव पहुंच पायेंगे। इस दौरान उनके साथ उनकी ही फ़ैक्ट्री में काम करने वाले कई और साथी भी थे। अवधेश कहते हैं कि इस दौरान उन्हें 80 किमी. पैदल चलना होगा और इसमें 36 घंटे लगेंगे। 

एनडीटीवी की ओर से यह कहने पर कि प्रधानमंत्री ने अपील की है कि जो लोग जहां हैं, वहीं रहें, इस पर अवधेश कहते हैं कि उनके पास कोई रास्ता नहीं था। अवधेश के मुताबिक़, ‘वायरस के प्रकोप के कारण कंपनी की ओर से कहा गया कि कॉलोनी को खाली कर दो। जाने के लिये कोई गाड़ी नहीं थी और हम कुछ लोग एक ही गांव के थे, इसलिये हम लोगों ने पैदल ही निकलने का फ़ैसला किया।’ 

देश से और ख़बरें
एक अन्य व्यक्ति राजमल कहते हैं, ‘मजबूरी में इतना लंबा जाना पड़ रहा है। रुकने की कहीं कोई जगह नहीं है। हम लोगों को रोड पर रुकने नहीं दिया जा रहा है।’ ये जितने भी लोग अपने गांव की ओर जा रहे हैं, उनके पास एक बैग, पानी और थोड़े बिस्कुट हैं। इन लोगों ने धूप से बचने के लिये तौलिया लपेटा हुआ था। 
दिल्ली-नोएडा से भी कुछ ऐसे ही वीडियो सामने आये हैं। इन वीडियो में दिल्ली-नोएडा में मजदूरी करने वाले लोग बुलंदशहर-आगरा तक पैदल जा रहे हैं। इनका भी यही कहना है कि शहर में रहने का कोई ठिकाना नहीं है, काम चौपट हो गया है, ऐसे में यहां क्या करें।

यह साफ है कि कोरोना वायरस के कारण दिहाड़ी मजदूरी करने वाले, प्राइवेट कंपनियों में काम करने वाले लोग सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं। ऐसे में अगर कंप्लीट लॉकडाउन के बाद भी हालात नहीं सुधरे तो इस तबक़े के लिये ख़ासी मुश्किलें खड़ी हो जायेंगी। 

Satya Hindi Logo Voluntary Service Fee स्वैच्छिक सेवा शुल्क
गोदी मीडिया के इस दौर में पत्रकारिता को राजनीति और कारपोरेट दबावों से मुक्त रखने और 'सत्य हिन्दी' को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए आप हमें स्वैच्छिक सेवा शुल्क (Voluntary Service Fee) चुका सकते हैं। नीचे दिये बटनों में से किसी एक को क्लिक करें:
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

देश से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें