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दिल्ली एनसीआर से उत्तर प्रदेश में अपने गाँवों की ओर लौटते लोग। एनएच 24 की तसवीर।फ़ोटो साभार: ट्विटर/अजीत अंजुम

लॉकडाउन संकट: 'भूखे मरने से बेहतर 700 किलोमीटर पैदल चल घर पहुँच जाएँ'

कोरोना वायरस से बचें या भूखे मरने की नौबत आने से? लॉकडाउन के बाद यही डर शहरों में फँसे हज़ारों मज़दूरों के दिल और दिमाग़ में है। यही उलझन उन्हें जैसे-तैसे घर भागने पर मजबूर कर रही है। कोई वाहन नहीं है तो पैदल ही। 5-10 किलोमीटर तक ही नहीं, 600-700 किलोमीटर की दूरी भी। युवा मज़दूर हैं। अपेक्षाकृत उम्रदराज भी हैं और गर्भवती महिला भी। वह महिला जिसे डॉक्टर आराम करने और ज़्यादा नहीं चलने की नसीहतें देते हैं। लेकिन क्या करें। जान पर आफत जो आई है। शायद उनके सामने एक चुनौती है। एक रास्ता चुनने की। किससे बचें? कौन ज़्यादा ख़तरनाक है और कौन कम? क्या यह पढ़ते हुए आपकी रूह काँप रही है? उन तसवीरों और वीडियो को देखिए जिसमें हज़ारों लोग हाईवे पर पैदल जाते दिख रहे हैं। उनकी बातें सुनिए। यह कैसी व्यवस्था हो गई है? क्या कोरोना से लड़ने के लिए ऐसी तैयारी की गई?

देश के बाक़ी शहरों की तरह ही दिल्ली-एनसीआर से भी लोग अपने घर की ओर लौट रहे हैं। सबकी अलग-अलग कहानी है। अलग-अलग दर्द हैं। लेकिन कारण एक समान ही हैं। कोरोना का डर। लॉकडाउन की स्थिति। बाहर निकलने पर बेहद सख्ती। बिना कमाई के भूखे रहने की नौबत। नेशनल हाईवे पर जब ऐसे लोगों से बात करेंगे तो अहसास होगा कि उनके सामने बहुत बड़ा संकट है। कई लोगों के लिए घरों में रहना ज़्यादा मुश्किल नहीं है, लेकिन इनके लिए शायद असंभव सा हो।

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एनएच 24 हाइवे से अपने घरों की ओर हज़ारों लोग जा रहे हैं। किसी के पीठ पर बैग है तो किसी के सिर पर गठरी में बंधा सामान। ऐसे ही लोगों से वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने बात की है। उन्होंने अपने इन अनुभवों को ट्विटर पर साझा किया है। उन्होंने तसवीरें और वीडियो पोस्ट किए हैं। जिन लोगों से उन्होंने बात की, उन्होंने लगभग एक समान बात कही कि 'भूखे मरने से तो अच्छा है कि पैदल चलकर घर पहुँचने की कोशिश की जाए'। 

पीओपी मज़दूरी का काम करने वाला एक ग्रुप आजमगढ़ अपने घर लौट रहा है। इसमें से एक व्यक्ति ने कहा, 'सब काम बंद हो गए हैं।' एक व्यक्ति कहता है कि हम सब मज़दूरी करते हैं और हमें आजमगढ़ जाना है।

'घर क्यों जा रहे हैं' के सवाल पर दिल्ली के मंडावली में पीओपी का काम करने वाले एक मज़दूर शिवम ने कहा, 'मज़दूरी करते हैं... यहाँ रोज़-रोज़ खाने के लिए... तीन दिन से भूखे हैं तो क्या करेंगे यहाँ?' आसपास रैन बसेरे में जाने की बात पर वह कहते हैं, 'नहीं है न रैन बसेरा। बाहर निकलने पर पुलिस वाले डंडे से मारते हैं। रूम से बाहर न निकलो...। खाने के लिए कुछ नहीं है। जहाँ 26 रुपये किलो आटा था वहाँ अब 50 रुपये किलो हो गया। कैसे कमाएँगे?' 

दोबारा रैन बसेरा की बात छेड़ने पर फिर वह कहते हैं, 'रैन बसेरा पर तभी जाएँगे न जब पुलिस वाले जाने दें। पुलिस गली से मारकर रूम पर भगा देती है...।

'पैदल कैसे जाओगे' के सवाल पर कहते हैं, 'पैदल चलेंगे, इधर से गाड़ी-घोड़ा मिलती जाएगी, सवारी करते जाएँगे।' 

दिल्ली से आजमगढ़ की ओर अपने घर को लौट रहे एक मज़दूर कहते हैं, किसी तरह तो जाना ही है, भूखे थोड़े न मरना है।'

उपेंद्र नाम के एक व्यक्ति कहते हैं कि वह इटावा जाने वाले हैं। वह पेंट का काम करते हैं। वह भी एक जत्थे में जा रहे हैं। रैन बसेरे के सवाल पर जत्थे में शामिल एक अन्य मज़दूर कहते हैं, 'कमरे में रह रहा था, लेकिन मकान मालिक ने भी बोला, भाई बीमारी चल रही है आप लोग जाइए घर पर।' वह आगे कहते हैं, 'मकान मालिक तो कहेंगे ही बीमारी चल रही है तो।'

'कैसे जाएँगे' के सवाल पर एक साथ कई लोग कहते हैं कि ऐसे ही चले जाएँगे आराम-आराम से। रास्ते में खाने के लिए है भी या नहीं, इस सवाल पर वे कहते हैं कि कुछ बिस्किट-विस्किट ले लेंगे, खा लेंगे। 

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सरकार से क्या कहना चाहते हैं लोग?

क्या सरकार से कुछ कहना है, इस सवाल पर एक मज़दूर कहते हैं, 'हाँ सर, कहना तो चाहते हैं थोड़ा-बहुत। कहना यह चाहते हैं कि जैसे बाहर के लोग- बिहार के, यूपी के। सभी लोग फँसे हुए हैं जगह-जगह। सरकारी नौकरी नहीं है जिनकी, फुटकर वाले, प्राइवेट वाले....। यानी राज मिस्त्री का काम, बिजली का काम करने वाले, फुटकर वाले। वो फँसे पड़े हैं। उनका जाने का कोई रास्ता नहीं है। पंजाब में हमारे रिश्तेदार फँसे पड़े हैं। कोई रास्ता नहीं है आने का...।

कुछ लोग एक झुंड में बुलंदशहर जा रहे हैं। इसमें साथ में परिवार की एक गर्भवती महिला भी हैं। कुछ बदायूँ और दूसरे शहरों के लोग भी हैं।

गुजरात से राजस्थान लौट रहे मज़दूर

ऐसी ही रिपोर्टें देश के दूसरे शहरों से भी आ रही हैं। गुजरात में काम करने वाले राजस्थान के मज़दूर भी बड़ी संख्या में पैदल ही घर की ओर लौट रहे हैं। कई लोग सामान लादे तो कई लोग अपने कंधों पर बच्चों टांगे हुए दिख जाते हैं। उन्हें सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना है। 'स्क्रॉल' की रिपोर्ट के अनुसार 32 साल के दशरथ यादव अहमदाबाद में मज़दूरी करते हैं। मंगलवार को बस स्टॉप पर बैठे थे तभी प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा कर दी। इसके बाद उन्हें पैदल ही निकलना पड़ा। कई अन्य लोग भी पैदल चल रहे थे।

रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा, 'हम पूरी रात चले। हमारे पास पानी नहीं था। हमारे पास भोजन नहीं था और हम आराम करने के लिए कुछ मिनट के लिए भी मुश्किल से ही रुके। किसी का पैर सूज गया, कोई व्यक्ति बेहोश हो गया।'

वे क़रीब 90 किलोमीटर पैदल चलकर हापा गाँव पहुँचे थे तो ग्रामीणों ने निजी गाड़ी से उन्हें राजस्थान की सीमा तक पहुँचवाया। राजस्थान में सीमा पर सरकारी अधिकारियों को अपनी पूरी जानकारी और पता देने के बाद वे राज्य में आ सके। फिर वे राजस्थान रोडवेज की बस से सागवाड़ा ज़िले में पहुँचे। इसके बाद भी उनका घर 54 किलोमीटर दूर था। 

उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसे पैदल चल रहे हज़ारों लोगों को देखा। वह यह भी कहते हैं कि हज़ारों लोग अहमदाबाद में फँसे हुए हैं। 

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चाहे जिस नज़रिए से भी इनकी दिक्कतों को देखा जाए, लेकिन इन सबकी चिंताएँ हैं वाजिब। ग़रीबों-मज़दूरों के सामने सबसे बड़ा सवाल आजीविका का तो है ही, इसके साथ ही इनके सामने सवाल तात्कालिक तौर पर भूखे रहने का भी पैदा हो गया है। लेकिन सवाल है कि क्या इसे टाला जा सकता था या इनकी चिंताओं को कम किया जा सकता था? शायद इसे बेहतर सरकार समझती हो!

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अमित कुमार सिंह
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