सचाई: वैक्सीन हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को प्राकृतिक तरीक़े से ही रोग संक्रमण से लड़ने के क़ाबिल बनाती है। ये किसी भी तरह से हमारे शरीर को कमज़ोर नहीं करती। अगर आप किसी रोग से संक्रमित हो जाएँ और आपका शरीर किसी वैक्सीन की सहायता के बग़ैर इस रोग से लड़ने की कोशिश करे तो ऐसे में आपकी जान को ख़तरा पहुँचने की संभावना बढ़ जाती है।
सचाई: ऐसा नहीं है। वैक्सीन सिर्फ़ हमारे शरीर को उस बीमारी की मौजूदगी का एहसास दिलाता है ताकि हमारा प्रतिरक्षा तंत्र उससे लड़ने के लिए एंटीबाडीज़ तैयार कर सके। एंटीबॉडीज़ तैयार होने के दौरान हमें हल्का बुखार या सूजन जैसी सामान्य तकलीफ़ हो सकती है लेकिन वो बीमारी कभी नहीं होगी।
सचाई: वैक्सीन में मर्क्युरी, एल्युमीनियम और फ़ॉर्मैलडेहाइड जैसे रासायनिक तत्वों का इस्तेमाल ज़रूर किया जाता है, पर ये बहुत ही कम मात्रा में होते हैं और शरीर को हानि नहीं पहुँचाते हैं।
सचाई: किसी रोग के लिए वैक्सीन निकाले जाने के बाद उस रोग के संक्रमण के मामलों की संख्या में काफ़ी घटाव देखने को मिलता है। आज से तीन हज़ार साल पहले 'स्मॉल पॉक्स' या छोटी चेचक को दुनिया के सबसे ख़तरनाक रोगों में गिना जाता था, जिसके संक्रमण से हर रोज़ सैकड़ों लोगों की मृत्यु हुआ करती थी। आज वैक्सीन की बदौलत दुनिया से स्माल पॉक्स का अस्तित्व ही मिट गया है। एक ज़माने में पोलियो और सिफलिस से लाखों लोग ग्रसित होते थे पर आज ये बीमारियाँ बहुत कम नज़र आती हैं। वैक्सीन हर साल पूरी दुनिया में दो से तीन करोड़ ज़िंदगियाँ बचाती हैं।
सचाई: वैक्सीन और ऑटिज़्म का कोई संबंध नहीं है। ऑटिज़्म के कारक गर्भावस्था के समय ही पाए जाते हैं। 1998 में एक शोधपत्र में ये साबित करने की कोशिश की गई थी कि बच्चों में ऑटिज़्म का कारण उन्हें दिया गया मीज़ल्स-मम्प्स-रूबेला (एमएमआर) वैक्सीन ही है, पर ये शोधपत्र फ़र्ज़ी साबित हो चुका है। ये उस पत्रिका से हटा दिया गया है जिसमें ये छपा था और इसे लिखनेवाले डॉक्टर का मेडिकल लाइसेंस रद्द कर दिया गया है।
भारत में कोरोना टीकाकरण की शुरुआत।
सचाई: किसी क्षेत्र में रह रहे ज़्यादा से ज़्यादा लोग अगर किसी रोग से प्रतिरक्षितया इम्यून हों, उस क्षेत्र में उस रोग का फैलाव रुक सकता है और जो लोग प्रतिरक्षित नहीं हैं, उनके संक्रमित होने की संभावना कम हो जाती है। विज्ञान की भाषा में इसे 'हर्ड इम्युनिटी' कहा जाता है। पर अगर किसी क्षेत्र में प्रतिरक्षित लोगों की संख्या कम हो जाए तो वह रोग ज़्यादा तेज़ी से फैल सकता है।
वैक्सीन लगवाने से इंकार करना एक चौराहे पर गाड़ी रोकने से इंकार करने जैसा है। एक चौराहे पर तीन तरफ़ से आ रहे लोग अगर रुक जाते हैं तो दुर्घटना की संभावना कम होती है, पर अगर दो या तीन तरफ़ से आने वाले लोग रुकने से मना कर दें तो यह सड़क पर सभी यात्रियों के लिए ख़तरनाक साबित होता है।
सचाई: किसी भी वैक्सीन की गारंटी 100 प्रतिशत नहीं होती और कुछ लोगों में अज्ञात कारणों से वैक्सीन का प्रभाव नहीं होता। ज़्यादातर वैक्सीन 85 से 95 प्रतिशत प्रभावशाली होती हैं, यानी इन्हें लेने वाले 85 से 95 प्रतिशत बच्चे बीमारी से सुरक्षित हैं। वैक्सीन न लेने वाले 100 प्रतिशत लोगों में बीमारी का ख़तरा रहता है।
सचाई: वैक्सीन क्रम कई दशकों के आयुर्वैज्ञानिक शोधकार्य और प्रमाण के आधार पर निर्धारित किया जाता है। ये क्रम इस पर भी निर्भर करता है कि वैक्सीन किस समय दिए जाने पर वह सबसे ज़्यादा असरदार होता है। शिशुओं का प्रतिरक्षा तंत्र हमसे ज़्यादा ताक़तवर होता है और एक शिशु एक बार में दस हज़ार तक वैक्सीन लेने की क्षमता रखता है। एक शिशु दिनभर कई कीटाणुओं और विषाणुओं के संस्पर्श में आता है, जिसके मुक़ाबले एक वैक्सीन कोई बड़ी बात नहीं है।
आज के ज़माने में बच्चों को पहले से ज़्यादा वैक्सीन दी जाती हैं, पर आज की वैक्सीन पुरानी वैक्सीनों के मुक़ाबले कहीं कम मात्रा में दी जाती हैं।
सचाई: इस बात का कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं है कि वैक्सीन महिलाओं या पुरुषों में बांझपन का कारण बन सकता है। मुझे याद है जब मैं छात्र था तब ये अफ़वाह फैलाई गई थी कि पोलियो की वैक्सीन नपुंसकता का कारण है। पोलियो वैक्सीन अभियान पर इस अफ़वाह का बहुत बुरा असर पड़ा था। कोरोना की वैक्सीन के बारे में भी ऐसी झूठी अफ़वाहें फैलाई जा रही हैं।
सचाई: एक बार कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद शरीर में एंटीबॉडीज तैयार हो सकते हैं ज़रूर, पर ये एंटीबॉडीज़ कितनी देर तक टिकेंगे ये निश्चित तौर पर बताया नहीं जा सकता है। 'सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन' (सीडीसी) की सलाह के अनुसार "उन लोगों को भी कोविड-19 वैक्सीन लेने की आवश्यकता है जिन्हें पहले कोविड-19 हो चुका है।"
सचाई: हम अभी तक नहीं जानते कि इस वैक्सीन द्वारा दी गई सुरक्षा कितनी देर तक रहेगी। अभी बताया नहीं जा सकता कि ये वैक्सीन सिर्फ़ एक बार लगवा लेना काफ़ी है या इसे हर साल लगवाते रहना ज़रूरी है।
सचाई: किसी भी वैक्सीन में कोरोना वायरस के सक्रिय विषाणु मौजूद नहीं हैं। सभी वैक्सीन में कोरोना वायरस के निष्क्रिय या कमज़ोर विषाणु हैं।
सचाई: वैक्सीन हमारे शरीर में कुछ जेनेटिक निर्देश पहुँचाते हैं, ये सच है। लेकिन इसका हमारे डीएनए पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
एमआरएनए और डीएसडीएनए वैक्सीन एक निर्देशावली की तरह काम करते हैं। वे शरीर को रोग संक्रमण की प्रतिक्रिया में एंटीबॉडीज बनाने के लिये निर्देश देते हैं और फिर शरीर इनको नष्ट कर देता है।
सचाई: तीन से बारह हफ़्तों के बीच में कोरोना वायरस वैक्सीन दूसरी बार लेना ज़रूरी है। पहले ख़ुराक के बाद शरीर में प्रतिरोधक शक्ति का निर्माण होना शुरू होता है। दूसरी ख़ुराक उस शक्ति को मज़बूत बनाने में मदद करती है।
सचाई: फ़्लू और कोविड-19 के लक्षण एक जैसे होने के बावजूद ये दोनों बीमारियाँ एक-दूसरे से अलग हैं।
सचाई: वैक्सीन बीमारी से बचने के दूसरे विकल्पों का स्थान नहीं लेता, बल्कि उनका पूरक बनकर उनके साथ हमें सुरक्षित रखने का काम करता है। हमें कांटैक्ट ट्रेसिंग, ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की जांच और घर पर रहने जैसी चीज़ें जारी रखनी होंगी। हम सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनना और हाथ धोते रहना छोड़ नहीं सकते।