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मेवाणी जमानत केस: ‘हम पुलिस स्टेट बन जाएंगे’, कोर्ट की असम पुलिस को फटकार

गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी पर दर्ज मुक़दमे के मामले में असम की एक अदालत ने राज्य की पुलिस को फटकार लगाई है। मेवाणी को असम पुलिस ने एक हफ्ते के भीतर दो बार गिरफ्तार किया था। पहले मामले में उनकी गिरफ्तारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई टिप्पणी के चलते हुई थी जबकि दूसरी बार में उन पर आरोप था कि उन्होंने एक महिला पुलिस कर्मी से बदसुलूकी की है।

बारपेटा की सेशन अदालत ने मेवाणी को महिला पुलिसकर्मी से बदसुलूकी के मामले में जमानत देने के दौरान गुवाहाटी हाई कोर्ट से अनुरोध किया कि वह राज्य में पुलिस की ज़्यादतियों के खिलाफ संज्ञान ले। 

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सेशन कोर्ट ने गुवाहाटी हाई कोर्ट से अनुरोध किया कि हाई कोर्ट असम पुलिस को निर्देश दे कि वह अपने वाहनों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जिससे किसी अभियुक्त को हिरासत में लिए जाने के बाद के पूरे घटनाक्रम पर नजर रखी जा सके।

अदालत ने मेवाणी की गिरफ्तारी के मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे को मैन्युफैक्चर्ड केस बताया।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि बेहद मुश्किलों से मिले हमारे लोकतंत्र को पुलिस स्टेट में बदलने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। जस्टिस अपारेश चक्रवर्ती ने कहा कि अगर मेवाणी के खिलाफ महिला पुलिसकर्मी के द्वारा दर्ज मामले को सच माना जाए तो हमें देश में अपराध के न्याय शास्त्र को फिर से लिखना होगा। 

अदालत ने कहा, “एफआईआर के विपरीत महिला पुलिसकर्मी ने मजिस्ट्रेट के सामने दूसरी बातें बताई हैं। महिला के बयानों को देखते हुए यह मामला पूरी तरह मैन्युफैक्चर्ड लगता है और ऐसा जिग्नेश मेवाणी को लंबे वक्त तक हिरासत में रखने के लिए किया गया है।”


अदालत की टिप्पणी।

अदालत ने कहा कि यह अदालत और कानून की प्रक्रिया का भी दुरुपयोग है।

असम सरकार की दलील

सुनवाई के दौरान असम सरकार की ओर से पेश हुए एडवोकेट माखन फुकान ने कहा कि जिग्नेश मेवाणी की गिरफ्तारी कानून के मुताबिक ही हुई है और इस मामले में जांच अभी शुरुआती स्तर पर है इसलिए जमानत याचिका को खारिज कर दिया जाना चाहिए।

मेवाणी के वकील की दलील

जबकि मेवाणी की ओर से अदालत में पेश हुए सीनियर एडवोकेट अंग्शुमन बोरा ने कहा कि महिला पुलिसकर्मी ने मेवाणी के खिलाफ कोई एफआईआर भी दर्ज नहीं कराई और न ही इस बारे में चीफ ज्यूडिशल मजिस्ट्रेट को सूचित किया। लेकिन कोकराझार पुलिस स्टेशन पहुंचने के बाद उन्होंने पुलिस के बड़े अफसरों को इस घटना के बारे में बताया, इसलिए इस मामले में दर्ज एफआईआर पूरी तरह मैन्युफैक्चर्ड लगती है और यह कानून का भी दुरुपयोग है। 

उन्होंने कहा कि इस मामले में जांच अधिकारी ने भी कोकराझार पुलिस स्टेशन में अपनी 2 रिपोर्ट में इसका कहीं कोई जिक्र नहीं किया है। उन्होंने इस दौरान सुप्रीम कोर्ट और गुवाहाटी हाई कोर्ट के द्वारा दिए गए कुछ फैसलों का भी जिक्र सेशन कोर्ट के सामने किया।

सीनियर एडवोकेट बोरा ने कहा कि महिला पुलिसकर्मी ने कोकराझार पुलिस स्टेशन में अपने सीनियर अफसरों से निर्देश लेने के बाद एफआईआर दर्ज कराई इसलिए यह गलत है।

अदालत ने कहा, “कोई भी व्यक्ति कभी भी दो पुरुष पुलिस अफ़सरों की मौजूदगी में एक महिला पुलिस अफसर से बदसुलूकी करने की कोशिश नहीं करेगा और रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि अभियुक्त…एक पागल व्यक्ति है।”
जस्टिस चक्रवर्ती ने कहा कि राज्य में दर्ज हो रहीं फर्जी एफआईआर को रोकने के लिए गुजरात हाई कोर्ट असम पुलिस को सुधार करने के लिए निर्देश देने पर विचार करे। जैसे कि- हर पुलिस कर्मचारी बॉडी कैमरे का इस्तेमाल करे और जब भी किसी अभियुक्त को गिरफ्तार किया जाए तो पुलिस के वाहनों में सीसीटीवी कैमरे लगे होने चाहिए वरना हमारा राज्य एक पुलिस स्टेट बन जाएगा। 
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कायराना हरकत: मेवाणी 

जमानत मिलने के बाद जिग्नेश मेवाणी ने कहा था कि बीजेपी एक महिला का इस्तेमाल उनके खिलाफ केस दर्ज करने के लिए कर रही है और यह बेहद ही कायराना हरकत है।

उन्होंने कहा कि उन्हें गिरफ्तार किया जाना कोई छोटी बात नहीं है और प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठे राजनीतिक आकाओं के निर्देश पर ऐसा किया गया है। उनका कहना था कि गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी जानबूझकर इस तरह की हरकत कर रही है।

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