दिल्ली हाई कोर्ट के इस ताज़ा फ़ैसले से पहले सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह शर्त लगाई थी कि प्रोटेक्टेड गवाहों की गवाही खत्म होने या एक साल बीतने तक दोबारा जमानत नहीं मांग सकते।
उमर खालिद और शरजील इमाम को एक बार फिर जमानत नहीं मिली। दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को दोनों की जमानत याचिकाएँ खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के पहले के फ़ैसलों और उसमें तय शर्तों से बंधी है। दोनों पर 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित ‘बड़े षड्यंत्र’ मामले में यूएपीए समेत कई धाराओं में मामला दर्ज है और वे छह साल से अधिक समय से जेल में हैं। अभी तक इस मामले में आरोप तय नहीं हुए हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की डिवीजन बेंच ने यह ताज़ा फ़ैसला सुनाया। यह उमर खालिद की जमानत याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट की तीसरी और शरजील इमाम की दूसरी अस्वीकृति है। इससे पहले उमर की जमानत अक्टूबर 2022 और सितंबर 2025 में हाई कोर्ट ने खारिज की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी उन आदेशों को बरकरार रखा था।
इस बार दोनों ने सुप्रीम कोर्ट के ही बाद के एक फैसले का हवाला देते हुए जमानत की मांग की थी। उनका तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट के बाद के फ़ैसले में जनवरी 2026 के उस आदेश के कुछ हिस्सों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जिसमें उनकी जमानत खारिज की गई थी। लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि वह इस आधार पर उन्हें राहत नहीं दे सकता।
हाई कोर्ट ने ‘न्यायिक अनुशासन’ का हवाला क्यों दिया?
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों से बंधा हुआ है जो इसी दिल्ली दंगा मामले में जमानत के सवाल पर दिए जा चुके हैं। अदालत ने यह भी कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम उन आरोपियों के साथ जमानत में समानता यानी पैरिटी का दावा नहीं कर सकते, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली है।
उमर और शरजील की याचिका में विशेष रूप से तस्लीम अहमद और अब्दुल खालिद सैफी को दी गई जमानत का हवाला दिया गया था। हाई कोर्ट ने माना कि इन दोनों को जमानत देने के पीछे यूएपीए में जमानत के क़ानूनी सिद्धांतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग पीठों के बीच सामने आए मतभेद का संदर्भ था। इसलिए उस आधार पर उमर और शरजील को समान राहत नहीं दी जा सकती है।हाई कोर्ट का कहना था कि जब इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही उमर और शरजील की जमानत पर विशेष रूप से विचार कर चुका है तो निचली अदालत या हाई कोर्ट उस फ़ैसले से अलग रास्ता नहीं अपना सकता।
जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी 2026 को उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएँ खारिज कर दी थीं। हालाँकि उसी फ़ैसले में मामले के पांच अन्य आरोपियों को जमानत दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की कथित भूमिका के आधार पर एक तरह की पदानुक्रम पर चर्चा की थी। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि उमर और शरजील एक साल पूरा होने के बाद या संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने के बाद, इनमें से जो पहले हो, जमानत के लिए फिर आवेदन कर सकते हैं।
इसी शर्त के कारण जुलाई 2026 में ट्रायल कोर्ट ने भी दोनों की जमानत याचिकाओं को स्वीकार नहीं किया था। उस समय अदालत ने कहा था कि उसके पास सुप्रीम कोर्ट के जनवरी के आदेश का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।फिर सुप्रीम कोर्ट के ही एक दूसरे फैसले से क्या बदला?
जनवरी के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट की एक दूसरी पीठ ने एक अलग यूएपीए मामले में मई 2026 में कुछ टिप्पणियाँ की थीं। इस पीठ ने जनवरी के फैसले के कुछ पहलुओं पर गंभीर आपत्ति जताई थी। खास तौर पर इस बात पर सवाल उठाया गया था कि किसी आरोपी को एक साल तक दोबारा जमानत मांगने से रोकना किस हद तक सही है। बाद में इसी तरह के तर्क के आधार पर तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को जमानत मिली। उमर और शरजील की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में भी इस बाद के सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला दिया गया था।
लेकिन हाई कोर्ट ने बुधवार को कहा कि उस बाद के फ़ैसले को उमर और शरजील के मामले में सीधे लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही जमानत के सवाल पर विशेष रूप से फैसला दे चुका है।
छह साल से बिना ट्रायल जेल में हैं
दोनों आरोपी फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के कथित बड़े षड्यंत्र से जुड़े मामले में गिरफ्तार किए गए थे। वे छह साल से अधिक समय से जेल में हैं। इस मामले में उन पर यूएपीए, भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, आर्म्स एक्ट सहित कई आरोप लगाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के जनवरी 2026 के फैसले में भी चार्जशीट में इन धाराओं का उल्लेख किया गया था।हालांकि, एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अभी तक इस मामले में आरोप तय नहीं हुए हैं। इसका मतलब है कि नियमित ट्रायल की औपचारिक शुरुआत अभी नहीं हुई है।
प्रोटेक्टेड गवाहों की गवाही अभी कैसे होगी?
सुप्रीम कोर्ट के जनवरी के आदेश में प्रोटेक्टेड यानी संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने का भी उल्लेख था। लेकिन इस मामले में गवाहों की परीक्षा ट्रायल शुरू होने के बाद होती है और ट्रायल आरोप तय होने के बाद शुरू होता है। इसलिए मौजूदा स्थिति में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि आरोप कब तय होंगे और उसके बाद गवाहों की गवाही की प्रक्रिया कब शुरू होगी।
यही वजह है कि दोनों आरोपियों की लंबी हिरासत और ट्रायल की शुरुआत के बीच का समय जमानत की बहस का एक अहम हिस्सा बना हुआ है।दिल्ली दंगों का मामला क्या है?
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा हुई थी। इस हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। पुलिस ने हिंसा के पीछे एक कथित बड़े षड्यंत्र की जांच के दौरान उमर खालिद, शरजील इमाम और कई अन्य लोगों को आरोपी बनाया।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि हिंसा अचानक या अलग-अलग घटनाओं का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे व्यापक साजिश थी, जिसमें अलग-अलग आरोपियों की अलग-अलग भूमिका थी। सुप्रीम कोर्ट के जनवरी 2026 के फैसले में भी अभियोजन के इसी मामले का उल्लेख किया गया था।