दिल्ली के मुस्तफाबाद में मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए दाखिल 37 फॉर्म-7 में 36 फर्जी पाए गए। चुनाव अधिकारी ने पुलिस से एफआईआर दर्ज करने की मांग की। दिल्ली एसआईआर पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
दिल्ली में फॉर्म 7 का बड़ा स्कैम, लेकिन चुनाव आयोग खामोश है।
मुस्तफाबाद फॉर्म 7 स्कैम अपडेट
- एसआईआर के दौरान मुस्लिम मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाने के लिए भरे गए थे फॉर्म-7
- भाजपा के बूथ लेवल एजेंट के खिलाफ पुलिस में शिकायत
- जिला निर्वाचन अधिकारी ने जांच में फर्जीवाड़े की पुष्टि की
- चुनाव आयोग की तरफ से कोई सफाई नहीं
दिल्ली के मुस्तफाबाद विधानसभा क्षेत्र में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए कथित तौर पर फर्जी फॉर्म-7 दाखिल किए जाने के मामले में चुनाव आयोग ने कार्रवाई शुरू कर दी है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के मुस्तफाबाद के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) ने शुक्रवार, 6 नवंबर को संबंधित बूथ लेवल एजेंट (BLA) के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।
यह कार्रवाई अंग्रेजी अखबार द हिंदू की रिपोर्ट के बाद हुई है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) अजय कुमार ने अखबार को बताया कि रिपोर्ट में सामने आए मामले की स्वतंत्र रूप से जांच कराई गई। जांच में 37 फॉर्म-7 में से 36 को फर्जी या गलत पाया गया, जबकि केवल एक मामला सही मिला।
क्या है पूरा मामला?
मुस्तफाबाद विधानसभा क्षेत्र के मतदान भाग संख्या 129 में मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाने के लिए फॉर्म-7 दाखिल किए गए थे। द हिंदू ने 30 अक्टूबर को अपनी रिपोर्ट में बताया था कि इस क्षेत्र के 28 मतदाताओं के खिलाफ नाम हटाने के आवेदन दिए गए थे, जबकि ये सभी मतदाता अपने पते पर रह रहे थे। अखबार के अनुसार, चुनाव आयोग के 28 अक्टूबर तक के रिकॉर्ड में इन आवेदनों को दाखिल करने वाले व्यक्ति का नाम चंद्रशेखर नैनवाल बताया गया था, जो भाजपा से पंजीकृत बूथ लेवल एजेंट (BLA) थे।हालांकि, जब अखबार ने उनसे संपर्क किया तो उन्होंने खुद को बूथ लेवल एजेंट मानने, फॉर्म-7 दाखिल करने और भाजपा से जुड़े होने से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद 29 और 30 अक्टूबर को नौ नए आवेदन सामने आए, जिनमें आपत्तिकर्ता (Objector) के रूप में उनका नाम दर्ज था। इन आवेदनों में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए अलग-अलग कारण बताए गए थे। इनमें मतदाता का अनुपस्थित होना, स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाना और मृत्यु जैसे कारण शामिल थे।
जांच में तीन मृत बताए गए मतदाता भी जिंदा मिलेः जिला निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अनुसार, सभी 37 फॉर्म-7 की जांच बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) और असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (AERO) के स्तर पर कराई गई। जांच में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। जिन तीन मतदाताओं को फॉर्म में मृत बताया गया था, वे अपने पते पर जीवित मिले। बाकी मतदाताओं के बारे में भी जांच में पाया गया कि वे अपने दर्ज पते पर ही रह रहे थे। अंततः जांच में 37 में से 36 मामलों को फर्जी पाया गया। इसके बाद संबंधित निर्वाचन अधिकारी ने पुलिस में शिकायत देकर एफआईआर दर्ज करने की मांग की।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 31 के तहत कार्रवाई
जिला निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि संबंधित बूथ लेवल एजेंट अथवा आपत्तिकर्ता ने फॉर्म-7 में जानबूझकर गलत बयान या घोषणा की है। इसलिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत कार्रवाई शुरू की गई है। इस धारा के तहत मतदाता सूची तैयार करने या उसमें संशोधन से संबंधित प्रक्रिया में जानबूझकर गलत लिखित बयान या घोषणा करने पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। चुनाव अधिकारी की शिकायत में पुलिस से इस मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच करने की मांग की गई है।मुस्तफाबाद में 1,021 फॉर्म-7 का मामला भी सवालों के घेरे में
मुस्तफाबाद का यह मामला केवल 37 फॉर्म तक सीमित नहीं है। इससे पहले द हिंदू ने 4 नवंबर की अपनी एक अन्य रिपोर्ट में बताया था कि विधानसभा क्षेत्र में दाखिल कुल 1,021 फॉर्म-7 में से 787 आवेदन भाजपा के 20 बूथ लेवल एजेंटों के नाम पर दर्ज थे। ये आवेदन तीसरे पक्ष की ओर से मतदाताओं के नाम हटाने के लिए दाखिल किए गए थे। अखबार के विश्लेषण के मुताबिक, ये 787 आवेदन कुल 837 थर्ड पार्टी डिलीशन आवेदनों का लगभग 94 प्रतिशत थे।
- इन सभी आवेदनों में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई थी।
- द हिन्दू अखबार की पड़ताल सामने आने के बावजूद चुनाव आयोग खामोश है।
द हिन्दू अखबार ने भाजपा के सभी 20 पंजीकृत बूथ लेवल एजेंटों से संपर्क किया था। इनमें से 16 ने कहा कि उन्होंने न तो ये फॉर्म भरे हैं और न ही उन पर हस्ताक्षर किए हैं। कई लोगों ने अपने नाम से आवेदन दाखिल किए जाने की जानकारी होने से भी इनकार किया। कुछ एजेंटों ने अपनी पहचान और विवरण के कथित दुरुपयोग की शिकायत भी की थी। यह मामला अब चुनाव आयोग के लिए भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है कि आखिर किसी व्यक्ति की जानकारी और सहमति के बिना उसके नाम से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने के आवेदन कैसे दाखिल हो सकते हैं।
चुनाव आयोग ने पहले तय की थी फॉर्म-7 की सीमा
चुनाव आयोग ने 9 अक्टूबर को निर्देश जारी कर एक व्यक्ति की ओर से फॉर्म-7 दाखिल करने की संख्या पर सीमा तय की थी। इसके तहत सामान्य तौर पर एक व्यक्ति अधिकतम 10 ऐसे आवेदन दाखिल कर सकता है। इससे अधिक आवेदन के लिए निर्धारित प्रक्रिया और बीएलए से संबंधित आवश्यक घोषणा का पालन करना होता है।
- मुस्तफाबाद के मामले में यह भी सवाल उठा था कि कई आवेदन संबंधित बीएलए की निर्धारित घोषणा और आवश्यक प्रक्रिया के बिना दाखिल किए गए थे।
इससे पहले 31 अक्टूबर को जिला निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने कहा था कि फॉर्म-7 के तहत जिन मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई है, उन सभी के घर जाकर सत्यापन किया जाएगा। साथ ही गलत या दुर्भावनापूर्ण आवेदन करने वालों के खिलाफ नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी। अब 37 आवेदनों में 36 के फर्जी पाए जाने के बाद पुलिस शिकायत इस मामले में अगला महत्वपूर्ण कदम है।
एसआईआर पर पहले से उठ रहे हैं सवाल
देश के कई राज्यों में चल रहे विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार संगठनों ने लगातार सवाल उठाए हैं। मुख्य चिंता यह है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करने के नाम पर कहीं वास्तविक मतदाताओं के नाम तो नहीं हटाए जा रहे हैं। 30 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में फॉर्म-7 दाखिल कर मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिशों के मामले में चुनाव आयोग से कदम उठाने को कहा था।इससे पहले तेलंगाना के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने भी 5 अक्टूबर को अधिकारियों को निर्देश दिया था कि फॉर्म-7 का दुरुपयोग करके पात्र मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने भी इसी तरह की चेतावनी दी थी। मई में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर की कानूनी वैधता को बरकरार रखा था, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया था कि इस प्रक्रिया का अर्थ यह नहीं है कि चुनाव आयोग को किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अधिकार मिल जाता है।
राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है मुस्तफाबाद
मुस्तफाबाद का मामला राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने आम आदमी पार्टी को यहां लगभग 17,600 वोटों से कम अंतर से हराया था। ऐसे में यदि किसी विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने के लिए गलत आवेदन दाखिल किए जाते हैं, तो इसका चुनावी नतीजों पर भी असर पड़ सकता है।फिलहाल जिला निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने कहा है कि अन्य फॉर्म-7 आवेदनों की जांच और सत्यापन की प्रक्रिया जारी है। कार्यालय ने आश्वासन दिया है कि चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों और मौजूदा कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब 37 में से 36 आवेदन जांच में फर्जी पाए गए, तो क्या बाकी 1,021 आवेदनों और दिल्ली के अन्य विधानसभा क्षेत्रों में दाखिल फॉर्म-7 की भी व्यापक जांच होगी? यह मामला केवल कुछ फर्जी आवेदनों का नहीं, बल्कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में नागरिकों के मतदान अधिकारों की सुरक्षा का है।