दिल्ली के मुस्तफाबाद में मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए जमा 1,021 फॉर्म-7 में से 787 बीजेपी बूथ एजेंटों के नाम से मिले। 16 एजेंटों ने आवेदन करने से इनकार किया। इसमें मुस्लिम वोटरों को टारगेट किया गया। द हिन्दू अखबार ने किया खुलासा।
दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर एक नया और गंभीर विवाद सामने आया है। मुस्तफाबाद विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटवाने के लिए बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा किए गए हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इन आवेदनों में जिन बीजेपी बूथ लेवल एजेंटों (BLA) के नाम दर्ज हैं, उनमें से अधिकांश ने आवेदन करने से ही इनकार कर दिया है।
अंग्रेजी अखबार द हिंदू की खोजी रिपोर्ट के मुताबिक, मुस्तफाबाद विधानसभा क्षेत्र में अब तक मतदाताओं के नाम हटाने के लिए कुल 1,021 फॉर्म-7 आवेदन जमा किए गए। इनमें से 787 आवेदन यानी लगभग 77 प्रतिशत बीजेपी से जुड़े 20 बूथ लेवल एजेंटों के नाम पर दर्ज हैं। ये सभी 787 आवेदन मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने से संबंधित हैं।
अखबार ने चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज सभी 20 बीजेपी बूथ एजेंटों से संपर्क किया। इनमें से 16 एजेंटों ने साफ कहा कि उन्होंने न तो ये आवेदन किए और न ही किसी फॉर्म पर हस्ताक्षर किए। अधिकांश एजेंटों ने बताया कि उन्हें इस बात की जानकारी तक नहीं थी कि उनके नाम और विवरण का इस्तेमाल मतदाताओं के नाम कटवाने के लिए किया जा रहा है।
तीसरे पक्ष के 94 प्रतिशत आवेदनों में बीजेपी एजेंटों के नाम
दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मुस्तफाबाद में कुल 1,021 फॉर्म-7 आवेदन जमा हुए हैं। इनमें से 837 आवेदन तीसरे पक्ष की ओर से दिए गए हैं। इन 837 आवेदनों में से 787 में बीजेपी के बूथ एजेंटों को आपत्तिकर्ता बताया गया है। यानी तीसरे पक्ष द्वारा जमा किए गए लगभग 94 प्रतिशत आवेदनों में बीजेपी एजेंटों के नाम दर्ज हैं।इन आवेदनों में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए तीन प्रमुख कारण बताए गए हैं—मतदाता अपने पते से स्थायी रूप से कहीं और चले गए हैं, उनका नाम पहले से किसी अन्य स्थान पर दर्ज है या उनकी मृत्यु हो चुकी है। हालांकि, अखबार की पिछली जांच में ऐसे कई मुस्लिम मतदाता अपने पंजीकृत पते पर रहते हुए मिले थे, जिनके नाम हटाने के आवेदन किए गए थे।
अंकित यादव के नाम से 32 आवेदन, बोले- मुझे बदनाम किया जा रहा है
इस मामले में बीजेपी के बूथ लेवल एजेंट अंकित यादव का बयान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, उनके नाम से 32 मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के आवेदन जमा हुए हैं। अंकित यादव ने द हिंदू को बताया कि उन्हें रविवार को पता चला कि उनके व्यक्तिगत विवरण का इस्तेमाल उनके ही मुस्लिम पड़ोसियों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने के लिए किया गया है। यादव के अनुसार, वे इन सभी पड़ोसियों को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं। उनके इलाके में केवल कुछ हिंदू परिवार रहते हैं और सभी लोग आपसी मेलजोल के साथ रहते हैं।उन्होंने कहा कि उन्होंने इनमें से कोई भी फॉर्म जमा नहीं किया। इस मामले की शिकायत करने के साथ ही उन्होंने बीजेपी के प्रतिनिधियों को बूथ लेवल एजेंट के पद से अपना औपचारिक इस्तीफा भी सौंप दिया। अंकित यादव ने बताया कि स्थानीय बूथ लेवल अधिकारी (BLO) ने उनसे पूछा था कि क्या उनके मोबाइल पर कोई ओटीपी आया था। हालांकि, ऑफलाइन फॉर्म जमा करने के लिए ओटीपी की आवश्यकता नहीं होती। यादव के मोबाइल पर कई एसएमएस आए थे, जिनमें फॉर्म के सत्यापन के लिए अधिकारियों की नियुक्ति और आवेदन के रेफरेंस नंबर दर्ज थे।
यादव के मुताबिक, उन्होंने इस बारे में स्थानीय बीजेपी पार्षद से भी संपर्क किया। उनका आरोप है कि पार्षद ने उनकी चिंता को गंभीरता से लेने के बजाय फिलहाल मामले को नजरअंदाज करने और बाद में देख लेने की बात कही।
अंकित यादव ने सवाल उठाया कि जब उन्होंने छह महीने पहले बूथ एजेंट की जिम्मेदारी संभाली थी, तब उन्हें बताया गया था कि उनका काम मतदाताओं और चुनाव अधिकारियों की सहायता करना होगा। फिर उनके विवरण का इस्तेमाल इस तरह कैसे किया जा सकता है? अखबार ने स्थानीय बीएलओ की मदद से संबंधित मतदाताओं के पतों की पुष्टि की। सभी मतदाता अपने दर्ज पते पर रहते मिले। बीएलओ ने यह भी बताया कि उन्हें इन आवेदनों की कोई हॉर्ड कॉपी नहीं मिली थी।
किन बीजेपी बूथ एजेंटों के नाम से कितने आवेदन?
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, जिन एजेंटों ने अपने नाम से आवेदन जमा करने से इनकार किया, उनमें निम्नलिखित नाम शामिल हैं।
नीरज शर्मा 56 फॉर्म, सत्य भामा 54 फॉर्म, हिमांशु 52, अभिषेक मिश्रा 47, नितिन कुमार 40, अजय सिंह भाटी 39 फॉर्म, देशराज 35 फॉर्म, रमन 35, मनीष नेगी 34, मोहन मदन 33, राज कुमार 33, अंकित यादव 32, सावर सिंह 32, कपिल 31 फॉर्म और गंगन पपनै 14 फॉर्म।नीरज शर्मा ने बताया कि 3 नवंबर को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के कार्यालय से उन्हें फोन करके इन आवेदनों के बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया था। उन्होंने भी आवेदन करने से इनकार किया। नितिन कुमार के नाम से 40 आवेदन दर्ज हैं। अखबार को कुछ ऐसे फॉर्म भी मिले जिन पर उनके नाम और हस्ताक्षर थे। लेकिन नितिन कुमार ने कहा कि उन्होंने कोई आवेदन नहीं किया। उन्होंने बताया कि जिन इलाकों के मतदाताओं के नाम हटाने के लिए उनके नाम से आवेदन दिए गए हैं, वे इलाके उनके कार्यक्षेत्र में भी नहीं आते।
एक बीजेपी एजेंट ने माना- मैंने 500 फॉर्म जमा किएः जहां अधिकांश एजेंटों ने आवेदन करने से इनकार किया, वहीं बीजेपी बूथ एजेंट रॉबिन सिंह धामा ने फॉर्म-7 जमा करने की बात स्वीकार की। चुनाव आयोग की सार्वजनिक सूची में उनके नाम से 57 आवेदन दर्ज हैं। हालांकि, धामा ने दावा किया कि उन्होंने अब तक लगभग 500 फॉर्म जमा किए हैं। उनका कहना था कि जिन लोगों के नाम हटाने के आवेदन किए गए हैं, वे संबंधित इलाकों में रहते ही नहीं हैं। इसलिए उनके नाम मतदाता सूची में नहीं होने चाहिए।
रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं हुआ कि धामा के 500 आवेदन करने के दावे और सार्वजनिक रिकॉर्ड में दर्ज 57 आवेदनों के बीच इतना अंतर क्यों है। इस बीच, शशि नामक बूथ एजेंट के नाम से 59 आवेदन दर्ज मिले, जिनमें 10 आवेदन 3 नवंबर को सूचीबद्ध हुए थे। उनके नाम से दर्ज फोन नंबर पर संपर्क करने पर एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि वह नंबर गलत तरीके से दर्ज है और वह इसे हटवाने के लिए कई शिकायतें कर चुका है। मनोज कुमार के नाम से 43 और त्रिभुवन दीक्षित के नाम से 26 आवेदन दर्ज थे, लेकिन अखबार उनसे संपर्क नहीं कर सका।
पहले भी सामने आया था 28 मुस्लिम मतदाताओं का मामला
यह पहला मौका नहीं है जब मुस्तफाबाद में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के आवेदनों पर सवाल उठे हैं। 30 अक्टूबर को द हिंदू ने अपनी पिछली रिपोर्ट में खुलासा किया था कि मुस्तफाबाद के मतदान केंद्र संख्या 129 पर 28 मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के आवेदन किए गए थे। इन सभी आवेदनों में बीजेपी के बूथ एजेंट चंद्रशेखर नैनवाल का नाम आपत्तिकर्ता के रूप में दर्ज था। लेकिन जब अखबार ने संबंधित मतदाताओं के घर जाकर जांच की तो सभी 28 मतदाता अपने पंजीकृत पतों पर रहते मिले।नैनवाल ने भी आवेदन करने से इनकार किया था। उन्होंने यहां तक कहा था कि वे न तो बीजेपी के बूथ एजेंट हैं और न ही किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े हुए हैं। इस रिपोर्ट के बाद उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जिला निर्वाचन अधिकारी अजय कुमार के कार्यालय ने 31 अक्टूबर को कहा था कि जिन मतदाताओं के नाम हटाने के आवेदन मिले हैं, उनके मामलों की भौतिक जांच की जाएगी। अधिकारी ने यह भी कहा था कि यदि आवेदन झूठे या दुर्भावनापूर्ण पाए गए तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
चुनाव आयोग के 9 अक्टूबर के आदेश पर भी सवाल
इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू चुनाव आयोग द्वारा 9 अक्टूबर 2026 को जारी किया गया निर्देश है। इस निर्देश के अनुसार, दावा एवं आपत्ति की पूरी अवधि के दौरान कोई सामान्य मतदाता अधिकतम 10 फॉर्म-7 आवेदन कर सकता है। हालांकि, राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों को एक दिन में अधिकतम 10 आवेदन सामूहिक रूप से जमा करने की अनुमति है। लेकिन इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना और आवश्यक घोषणा-पत्र देना अनिवार्य है। ये आवेदन अन्य मतदाताओं द्वारा भरे गए होने चाहिए।द हिंदू के अनुसार, मुस्तफाबाद में जिन 20 बीजेपी एजेंटों के नाम से 787 आवेदन दर्ज हैं, उनके साथ आवश्यक बीएलए घोषणा-पत्र या निर्धारित प्रारूप नहीं लगाया गया था। चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों ने पहले स्पष्ट किया था कि यदि कोई बीएलए सामूहिक आवेदन की निर्धारित प्रक्रिया अपनाने के बजाय अपने नाम से आपत्तियां दाखिल करता है तो उस पर भी 9 अक्टूबर की सीमा लागू होती है।
ऐसे में सवाल है कि एक ही व्यक्ति के नाम से 30, 40, 50 या उससे अधिक आवेदन किस प्रक्रिया के तहत स्वीकार किए गए? चुनाव आयोग के निर्देश में यह भी कहा गया है कि यदि निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को कोई शिकायत झूठी या मनगढ़ंत मिलती है तो जानबूझकर गलत बयान या घोषणा करने वाले आवेदक के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए।
चुनाव आयोग और दिल्ली के निर्वाचन अधिकारियों की चुप्पी
द हिंदू ने इस पूरे मामले पर जिला निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और भारत निर्वाचन आयोग से सवाल पूछे, लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक किसी की प्रतिक्रिया नहीं मिली। हालांकि, जिला निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने पहले कहा था कि मतदाता का नाम हटाने से पहले बीएलओ तथा निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी या सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी द्वारा भौतिक सत्यापन किया जाएगा। अधिकारी ने यह आश्वासन भी दिया था कि गलत या दुर्भावनापूर्ण शिकायतें मिलने पर कार्रवाई होगी।इस बीच, मुस्तफाबाद से 2025 का विधानसभा चुनाव लड़ चुके कांग्रेस उम्मीदवार अली मेहदी ने भी बीजेपी बूथ एजेंटों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की मांग उठाई है। उन्होंने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के पुलिस उपायुक्त को शिकायत देकर मुस्लिम मतदाताओं के नाम कथित रूप से गैरकानूनी तरीके से हटवाने के प्रयासों पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।
आखिर किसने जमा किए इतने फॉर्म-7?
मुस्तफाबाद का मामला अब केवल मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की सामान्य प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज 20 बीजेपी बूथ एजेंटों में से 16 ने आवेदन करने से इनकार किया है तो उनके नाम और व्यक्तिगत विवरण का इस्तेमाल किसने किया?- दूसरा सवाल यह है कि सभी 787 आवेदन मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के लिए ही क्यों किए गए?
- तीसरा सवाल चुनाव अधिकारियों की निगरानी से जुड़ा है। निर्धारित सीमा और घोषणा-पत्र संबंधी नियमों के बावजूद एक ही व्यक्ति के नाम से बड़ी संख्या में आवेदन कैसे दर्ज हुए?
- यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी मतदाता का नाम हटाने का आवेदन और उसका नाम वास्तव में मतदाता सूची से हट जाना दो अलग-अलग बातें हैं। फिलहाल इन 787 आवेदनों के आधार पर संबंधित मतदाताओं के नाम हटाए जाने की पुष्टि नहीं हुई है।
मुस्तफाबाद की इस जांच ने मतदाता सूची की विश्वसनीयता, फॉर्म-7 के संभावित दुरुपयोग और चुनावी प्रक्रिया में जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, उपलब्ध तथ्यों से यह अभी स्थापित नहीं होता कि इन आवेदनों को वास्तव में किसने तैयार और जमा किया, या किसी राजनीतिक दल के नेतृत्व ने ऐसा करने का निर्देश दिया था। इसकी पुष्टि स्वतंत्र जांच से ही हो सकती है।
इस पूरे प्रकरण में चुनाव आयोग के सामने अब सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यह पता लगाने की है कि जिन लोगों के नाम पर आवेदन दर्ज हैं और जो उन्हें दाखिल करने से इनकार कर रहे हैं, उन आवेदनों का वास्तविक स्रोत क्या है और क्या इस प्रक्रिया में किसी कानून या चुनावी नियम का उल्लंघन हुआ है।