प्रधानमंत्री आवास के पास स्थित दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को छह दिन में खाली करने का नोटिस मिला है। अभी तक किसी पीएम के कार्यकाल में इस मस्जिद को निशाना नहीं बनाया गया था। यह पहली बार है जब मोदी के कार्यकाल में इसे गिराने की तैयारी है।
दिल्ली की रेसकोर्स मस्जिद 150 साल पुरानी है
सोशल मीडिया पर मंगलवार 20 अक्टूबर को रेसकोर्स रोड की इस मस्जिद को बचाने के लिए बाकायदा अभियान छेड़ा गया। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इसका विरोध किया। कश्मीर के मीरवायज उमर फारुक ने चिन्ता जताई। जमीयत उलमा-ए-हिन्द ने मस्जिद बचाने के लिए अपील की। लेकिन सरकार ने इस मस्जिद का बिजली-पानी काट दिया। मकतूब मीडिया ने वीडियो जारी कर बताया कि 20 अक्टूबर को जो लोग यहां नमाज़ पढ़ने गये थे, उन्हें रोका गया।
सरकार के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने 19 अक्टूबर को मस्जिद परिसर को कथित तौर पर अनधिकृत बताते हुए उसे छह दिनों के भीतर खाली करने का नोटिस जारी किया था। मस्जिद से जुड़े लोगों के अनुसार, इससे पहले परिसर की बिजली और पानी की आपूर्ति भी काट दी गई थी। इस कार्रवाई के बाद मस्जिद की ऐतिहासिक और कानूनी स्थिति को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
मस्जिद को नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) की वेबसाइट पर विरासत संपत्ति के रूप में सूचीबद्ध बताया गया है। दूसरी ओर, भूमि एवं विकास कार्यालय का कहना है कि मस्जिद सरकारी जमीन पर स्थित है और परिसर अनधिकृत है। मुस्लिम संगठनों ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए मस्जिद और उसके पास स्थित कब्रिस्तान को बचाने के लिए केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है।
रेस कोर्स मस्जिद प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास, 7 लोक कल्याण मार्ग, के नजदीक स्थित है। भूमि एवं विकास कार्यालय ने परिसर को अनधिकृत घोषित करते हुए उसे खाली करने का निर्देश दिया है। छह दिन की समय-सीमा के कारण मस्जिद पर संभावित बेदखली और तोड़फोड़ का खतरा पैदा हो गया है। विवाद का मुख्य प्रश्न यह है कि जिस मस्जिद को सरकारी रिकॉर्ड में विरासत संपत्ति के रूप में सूचीबद्ध बताया जा रहा है, उसकी जमीन और धार्मिक परिसर की कानूनी स्थिति क्या है। प्रशासन का पक्ष है कि संपत्ति सरकारी जमीन पर है, जबकि मस्जिद के प्रतिनिधि और मुस्लिम संगठन उसके वक्फ तथा ऐतिहासिक दर्जे का हवाला दे रहे हैं। उनके पास सबूत हैं। सरकार उन्हें मानने को ही तैयार नहीं है।
बिजली-पानी बंद, नमाजियों की आवाजाही पर भी असर
मस्जिद के इमाम मोहम्मद हारून के मुताबिक, परिसर की बिजली और पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मस्जिद तक पहुंचने के रास्ते बंद होने से नमाजियों को आने-जाने और पीने का पानी हासिल करने में परेशानी हो रही है। हारून का कहना है कि वह पिछले छह महीनों से दिल्ली वक्फ बोर्ड के सामने इस मामले को उठा रहे हैं, लेकिन उन्हें प्रभावी मदद नहीं मिली। उनके अनुसार, बोर्ड ने बिजली-पानी काटे जाने के संबंध में NDMC को पत्र लिखा, मगर अदालत में जाकर प्रभावी कानूनी कार्रवाई नहीं की। इमाम ने यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी से कई बार शिकायत की, लेकिन उनकी मांगों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने रिजिजू से मांगा हस्तक्षेप
मस्जिद को बचाने के लिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरण रिजिजू से हस्तक्षेप करने की मांग की है। संगठन के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने मंत्री को ज्ञापन सौंपा। यह ज्ञापन जमीयत के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी की ओर से दिया गया। जमीयत ने अपने ज्ञापन में कहा कि मस्जिद का उल्लेख NDMC की विरासत सूची में है। संगठन ने 1977 के दिल्ली गजट में दर्ज सूची और अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की संशोधित सूची का भी हवाला दिया। जमीयत ने केंद्रीय मंत्री के सामने अपनी इन मांगों को रखा है- मस्जिद और उससे लगे कब्रिस्तान को बेदखली या तोड़फोड़ की कार्रवाई से बचाया जाए। दिल्ली वक्फ बोर्ड और NDMC से मामले की विस्तृत रिपोर्ट मंगाई जाए। कानूनी विवाद का समाधान होने तक मस्जिद को गिराने की कार्रवाई न की जाए। मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति बहाल की जाए। नमाजियों को मस्जिद तक आने-जाने और नमाज अदा करने की सुविधा दी जाए।NDMC की विरासत सूची में मस्जिद का नाम
इस विवाद में मस्जिद की विरासत संबंधी पहचान महत्वपूर्ण है। NDMC की आधिकारिक वेबसाइट पर ‘Mosque and Campus, Race Course’ को अधिसूचित विरासत संपत्तियों में शामिल बताया गया है। जमीयत का कहना है कि मस्जिद का उल्लेख 1977 के दिल्ली गजट में भी मिलता है। संगठन ने केंद्र सरकार से इन रिकॉर्डों की जांच कर मस्जिद की ऐतिहासिक और कानूनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। दूसरी ओर, L&DO का दावा है कि परिसर सरकारी जमीन पर है और उसे अनधिकृत माना गया है। इस तरह विवाद केवल मस्जिद के धार्मिक उपयोग का नहीं, बल्कि जमीन के स्वामित्व, वक्फ की स्थिति और विरासत संबंधी सरकारी रिकॉर्ड का भी है।इमाम का दावा- 2021 के सर्वे में अतिक्रमण नहीं बताया गया
मस्जिद के इमाम मोहम्मद हारून ने अपने वीडियो संदेश में दावा किया कि वर्ष 2021 में हुए सर्वे में रेस कोर्स मस्जिद को न तो अनधिकृत निर्माण बताया गया था और न ही अतिक्रमण के रूप में चिह्नित किया गया था। उन्होंने वक्फ बोर्ड पर निष्क्रियता का आरोप लगाते हुए कहा कि मस्जिद की देखरेख और कानूनी हितों की रक्षा के लिए जिम्मेदार संस्था ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए। हारून ने लोगों से मस्जिद को बचाने की अपील भी की। उनका कहना है कि उन्होंने लगातार संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन अब बिजली-पानी बंद होने और रास्ते अवरुद्ध होने से स्थिति और कठिन हो गई है।सुरक्षा की आड़ में पीएम आवास के आसपास बेदखली की व्यापक कार्रवाई
रेस कोर्स मस्जिद का विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब प्रधानमंत्री आवास के आसपास के इलाके में अतिक्रमण और बेदखली से संबंधित अन्य कार्रवाइयां भी चल रही हैं। यह सब पीएम आवास की सुरक्षा के नाम पर हो रहा है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इसी इलाके में झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों को हटाने का मामला भी सामने आया है। हिंदुस्तान गजट की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया कि 19 अक्टूबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने संबंधित नागरिक अधिकारियों को इलाके के झुग्गी निवासियों को हटाने की कार्रवाई आगे बढ़ाने की अनुमति दी। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुनर्वास के लिए लगभग 45 किलोमीटर दूर सावदा घेवरा की कॉलोनी में शिक्षा, परिवहन और स्वच्छता जैसी सुविधाओं की व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया है। इस प्रकार, रेस कोर्स इलाके में मस्जिद की बेदखली का विवाद एक व्यापक शहरी भूमि और पुनर्वास संबंधी कार्रवाई के बीच सामने आया है। हालांकि, मस्जिद और झुग्गी बस्तियों से जुड़े मामलों की कानूनी परिस्थितियां अलग-अलग हैं।