दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) के बाद जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजधानी के अलग-अलग इलाकों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से गायब होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। सबसे चौंकाने वाला मामला चांदनी चौक विधानसभा क्षेत्र के एक मतदान केंद्र का है, जहां SIR से पहले 729 मतदाता दर्ज थे, लेकिन पुनरीक्षण के बाद सिर्फ एक मतदाता का नाम बचा है। इस पूरे मामले को लेकर स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी है। आरोप है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर मनमानी और प्रशासनिक लापरवाही हुई है।

जेजे बेला एस्टेट का चौंकाने वाला मामला

सबसे गंभीर मामला विजय घाट स्थित जेजे बेला एस्टेट का सामने आया है। यह इलाका चांदनी चौक विधानसभा क्षेत्र में आता है। स्थानीय निवासी कमल लाल के मुताबिक, करीब एक साल पहले यहां की झुग्गी बस्ती को तोड़ दिया गया था। इसके बावजूद विस्थापित लोग पुनर्वास या वैकल्पिक आवास नहीं मिलने के कारण उसी इलाके में रहने को मजबूर हैं। कमल लाल का कहना है कि उनके दादा और पिता 1961 से इसी स्थान से मतदान करते रहे हैं। SIR के दौरान इस इलाके के 500 से ज्यादा निवासियों ने अपने एन्यूमरेशन फॉर्म जमा किए थे, लेकिन इसके बावजूद इस मतदान केंद्र से 728 नाम ASDD श्रेणी में डालकर हटा दिए गए। ASDD का इस्तेमाल ऐसे मतदाताओं के लिए किया गया है जिन्हें Absent (अनुपस्थित), Shifted (स्थानांतरित) या Dead (मृत) माना गया है।

729 मतदाताओं में सिर्फ एक फॉर्म

बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) और राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों (BLA) की बैठकों के मिनट्स के मुताबिक, पार्ट नंबर 33—निगम प्रतिभा विद्यालय, अंगूरी बाग, लाल किला बूथ में SIR से पहले कुल 729 मतदाता थे। लेकिन घर-घर जाकर किए गए सर्वे के दौरान केवल एक फॉर्म ही जमा हुआ। 
SIR के बाद यह क्षेत्र बूथ नंबर 38 बन गया और 2026 की ड्राफ्ट मतदाता सूची में यहां सिर्फ एक मतदाता का नाम बचा है। यह नाम पास के हनुमान मंदिर के महंत कंचन गिरि का है। यानी जिस मतदान केंद्र पर कभी 729 मतदाता थे, वहां अब सिर्फ एक मतदाता रह गया है।
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जिंदा लोगों को बताया 'मृत', घर में रहने वालों को 'स्थानांतरित'

दिल्ली के दूसरे इलाकों से भी मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आई हैं। कपिल नाम के मतदाता ने बताया कि उनके पूर्वज इसी इलाके में रहते आए हैं और परिवार के सभी सदस्यों के नाम मतदाता सूची में थे। उनका आरोप है कि अब परिवार के सभी नाम हटा दिए गए हैं। मंगोलपुरी के Y-ब्लॉक निवासी कांता प्रसाद को ASDD सूची में 'मृत' बताया गया, जबकि वह जीवित हैं। यह मामला सामने आने के बाद मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं।
इसी इलाके की अनीता जायसवाल को 'स्थायी रूप से स्थानांतरित' बताया गया। उनका कहना है कि वह H-ब्लॉक से Y-ब्लॉक में आई थीं और दोनों ही जगह उन्हें संबंधित फॉर्म नहीं मिला। उनका नाम न तो ड्राफ्ट सूची में दिखाई देता है और न ही ASDD सूची में। इससे आशंका जताई जा रही है कि उनका नाम SIR शुरू होने से पहले ही हटा दिया गया था।

'आखिर ऐसा क्या बदल गया कि वोट ही गायब हो गए?'

चांदनी चौक की निवासी सुनीता ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा क्या बदल गया कि उनके वोटर नाम सूची से हटा दिए गए। उनका कहना है कि वे पिछले साल तक मतदान करती रही हैं। जानकी देवी ने भी कहा कि उनके पास सभी जरूरी दस्तावेज मौजूद हैं और उनके पूर्वज लंबे समय से वहीं रहते आए हैं। ऐसे में अचानक उनके नाम को लेकर समस्या कैसे पैदा हो गई, यह समझ से परे है।

फॉर्म भरने के बावजूद 'अनट्रेसेबल'

जगदंबा कैंप की निवासी मंजू को 'Untraceable/Absent' बताया गया, जबकि उनका दावा है कि उन्होंने एन्यूमरेशन फॉर्म भरकर जमा किया था। इसी कैंप की पुष्पा को 'Permanently Shifted' बताया गया, जबकि वह अपने परिवार के साथ अभी भी वहीं रह रही हैं। उनका कहना है कि परिवार के सभी सदस्यों ने फॉर्म जमा किए थे। 71 वर्षीय वीरमा को भी मतदाता सूची में 'मृत' दर्ज कर दिया गया, जबकि वह जीवित हैं। इन मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि मतदाता सूची तैयार करने के दौरान BLO स्तर पर घर-घर सत्यापन कितना प्रभावी रहा।

राजोकरी पहाड़ी में मई में ही नाम हट गया

महरौली के राजोकरी पहाड़ी निवासी सतपाल का नाम मई 2026 में ही मतदाता सूची से हटा दिया गया था। शिकायत करने के बाद BLO ने उनसे Form 6 भरवाया और कथित तौर पर कहा कि उनका पुराना वोटर कार्ड 'दुर्भाग्य से' डिलीट हो गया है। वहीं तुगलकाबाद की मीनू का कहना है कि उनके घर कोई BLO आया ही नहीं, फिर भी उन्हें 'Permanently Shifted' घोषित कर दिया गया। मीनू ने आरोप लगाया कि तुगलकाबाद में SIR का काम चुनाव आयोग के BLO के बजाय भाजपा द्वारा नियुक्त BLAs ने किया और इन लोगों ने भी केवल चुनिंदा इलाकों पर ध्यान दिया।

तोड़फोड़ वाले इलाकों में सबसे ज्यादा सवाल

वजीरपुर की शकुंतला ने मई-जून 2025 में हुई तोड़फोड़ और बेदखली की कार्रवाई से प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने पर सवाल उठाया है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि किसी इलाके में मकान या झुग्गियां तोड़ दी जाती हैं और लोगों को पुनर्वास नहीं दिया जाता, तो केवल पुराने पते से नाम हटाना उन्हें मताधिकार से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता।

योगेंद्र यादव ने SIR को बताया लोकतंत्र के लिए असामान्य स्थितिः राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने SIR प्रक्रिया पर बेहद गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक, 2024 के लोकसभा चुनाव के समय देश में करीब 99 करोड़ वयस्क और 98 करोड़ मतदाता थे। उनका दावा है कि SIR पूरा होने तक वयस्क आबादी करीब 103 करोड़ हो सकती है, लेकिन मतदाताओं की संख्या घटकर करीब 88 करोड़ रह जाएगी।

यादव ने इसे सामान्य स्थिति मानने से इनकार किया और कहा कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटना तभी संभव है जब इसके पीछे सुनियोजित प्रक्रिया हो और प्रशासनिक स्तर पर व्यापक मिलीभगत की जांच की जाए। उन्होंने विशेष रूप से SIR शुरू होने से पहले हटाए गए नामों की जांच की मांग की और इसे मताधिकार से वंचित करने की गंभीर कोशिश बताया।

2025 दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों की वैधता पर सवाल

ट्रांसपेरेंसी (पारदर्शिता) कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने भी मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि जब दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में करीब 1.56 करोड़ मतदाताओं के आधार पर हुए थे और अब करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं या उन्हें नोटिस दिए जाने की स्थिति में हैं, तो ऐसे में 2025 के चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता और चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता पर सवाल क्यों न उठें? 
भारद्वाज ने यह भी सवाल उठाया कि चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों और नागरिकों से पर्याप्त परामर्श के बिना SIR शुरू किया। उनके मुताबिक, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया था कि SIR शुरू करने का फैसला स्वतंत्र आकलन पर आधारित था, लेकिन बाद में एक RTI जवाब में कथित तौर पर कहा गया कि इस संबंध में उसके पास कोई रिकॉर्ड नहीं है और SIR शुरू करने का कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया था।

SIR पूरी तरह वापस लेने और आपराधिक जांच की मांग

विशेषज्ञों और प्रभावित नागरिकों के एक मंच ने SIR प्रक्रिया को पूरी तरह वापस लेने की मांग की है। मंच ने कथित तौर पर बड़े पैमाने पर मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित करने की कोशिश की उच्चस्तरीय आपराधिक जांच की मांग की है। नागरिकों का कहना है कि यदि गलत तरीके से हटाए गए नाम तत्काल बहाल नहीं किए गए और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं हुई, तो यह स्वतंत्र भारत के चुनावी इतिहास के सबसे गंभीर अध्यायों में से एक बन सकता है।

चुनाव आयोग का रटा रटाया जवाब- यह अभी ड्राफ्ट सूची है

हालांकि दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी अशोक कुमार ने नागरिकों की चिंताओं पर स्पष्ट किया है कि 31 अगस्त को जारी सूची अंतिम मतदाता सूची नहीं बल्कि ड्राफ्ट सूची है। उनके मुताबिक जिन लोगों के नाम गलती से छूट गए हैं, वे दावा और आपत्ति की प्रक्रिया के तहत अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके अलावा ऐसे युवा जो 1 अक्टूबर 2026 तक 18 वर्ष की आयु पूरी कर रहे हैं, वे भी Form 6 भरकर अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज करा सकते हैं। दावा और आवेदन जमा करने की अंतिम तारीख 30 सितंबर 2026 बताई गई है।

'सिर्फ ड्राफ्ट है' से खत्म नहीं होंगे सवाल

हालांकि चुनाव आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि सूची अभी अंतिम नहीं है, लेकिन 31 अगस्त को ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद से कई मतदान केंद्रों पर भ्रम और असमंजस की स्थिति बनी हुई है। अधिकार मंच ने भी दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को ज्ञापन देकर इन मामलों पर सवाल उठाए हैं।
मंच ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 19 का हवाला देते हुए कहा है कि मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए व्यक्ति का संबंधित क्षेत्र का 'ordinary resident' होना जरूरी है। ऐसे में केवल मकान टूटने, विस्थापन या अस्थायी रूप से स्थान बदलने के आधार पर किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से बाहर करने को लेकर कानूनी सवाल भी उठ रहे हैं।