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क्या गांधी परिवार से जुड़े ट्रस्टों ने वाकई घपला किया है?

क्या गांधी परिवार से जुडे़ चैरिटेबल ट्रस्टों ने वाकई विदेशी चंदा लेने में घपला किया है और नियम क़ानून का उल्लंघन किया है? या बीजेपी सरकार उसे ऐसे समय निशाने पर ले रही है जब उसने चीनी घुसपैठ के मुद्दे पर सरकार से लगातार परेशान करने वाले सवाल पूछे हैं?
ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि सरकार ने इस मामले की जाँच में मदद करने के लिए एक समिति का गठन किया है।
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मामला क्या है?

दूसरी ओर, इन ट्रस्टों का कहना है कि सारा लेन-देन नियम के मुताबिक हुआ है, सबकुछ घोषित है और सरकार को बताया हुआ है। इन लेन-देन की जानकारी सरकार की वेबसाइट पर हैं और ट्रस्टों के वेबसाइट पर भी। 
यह तो साफ़ है कि विवादों में घिरे राजीव गांधी फ़ाउंडेशन को पिछले 13 साल में 326.70 करोड़ रुपए बतौर चंदा मिले, बड़ा हिस्सा विदेशी संस्थाओं से आया। ख़ुद ट्रस्ट इस बात को मानता है।
इसके बाद दूसरा सवाल यह है कि ये पैसे किस देश से आए, किन संस्थाओं से आए। सवाल यह भी है कि क्या इसमें एफ़सीआरए यानी फ़ॉरन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट का उल्लंघन हुआ है? 

कितने पैसे मिले?

पहले बात करते हैं कि किस ट्रस्ट को कब और कितने पैसे मिले? इंडियन एक्सप्रेस की एक ख़बर के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2006-07 से लेकर 2019-2020 के बीच राजीव गांधी फ़ाउंडेशन और राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट को कुल मिला कर 326.70 करोड़ रुपए मिले।
इसमें से 316.27 करोड़ रुपए रूरल इंडिया सपोर्टिंग ट्रस्ट, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन इन इंडिया से मिले। 
रूरल इंडिया सपोर्टिंग ट्रस्ट, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन दोनों ही अमेरिका स्थित दातव्य संस्थाएं हैं। यानी इन ट्रस्टों को मिले पैसे का बड़ा हिस्सा अमेरिका से आया है।

सरकार की वेबसाइट पर है जानकारी!

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन इन इंडिया दिल्ली की संस्था है। गृह मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर डाली गई जानकारी के अनुसार बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने 68.78 करोड़ रुपए और रूरल इंडिया सपोर्टिंग ट्रस्ट से 187.84 करोड़ रुपए मिले थे।
इसके अलावा पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन इन इंडिया ने 59.61 करोड़ रुपए आरजीएफ़ को दिए। इसमें से आरजीएफ़ को 4.37 करोड़ रुपए ही मिले, बाकी पैसे आरजीसीटी को दिए गए। 
बता दें कि राजीव गांधी फाउंडेशन की प्रमुख सोनिया गांधी हैं, उनके अलावा इस ट्रस्ट में प्रियंका गांधी और पी. चिदंबरम भी हैं। राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट भी गांधी परिवार के ही नियंत्रण में है।

क्या है राजनीति?

इन ट्रस्टों को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब बीजेपी ने आरोप लगाया कि इस आरजीएफ़ ने चीनी दूतावास से पैसे लिए थे। केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यहाँ तक कहा कि कांग्रेस ने इस ट्रस्ट के ज़रिए चीन से घूस लेकर उसे फ़ायदा पहुँचाने वाली नीतियाँ बनाईं। 
केंद्र सरकार ने बीते दिनों गांधी परिवार से जुड़े सभी ट्रस्टों की जाँच के लिए एक समिति बनाई है। कांग्रेस पार्टी का कहना है कि सभी ट्रस्टों के सभी लेन-देन पूरी तरह पारदर्शी और नियम के अनुरूप ही हैं।

घपला हुआ है?

एक और अहम सवाल है कि क्या इन ट्रस्टों ने एफसीआरए के नियम कानूनों की अनदेखी कर विदेश से पैसे लिए?
पीएचएफ़आई के उपाध्यक्ष दिलीप मावलंकर ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ‘बिल गेट्स फ़ाउंडेशन से पैसे पीएचएफ़आई और राजीव गांधी महिला विकास परियोजना को सम्मिलित रूप से मिले। आरजीसीटी ने इसे  विदेशी चंदा घोषित कर दिया और एफ़सीआरए ने कहा कि हमने भी विदेशी चंदा लिया है।’ 
पीएचएफ़आई का एफ़सीआरए लाइसेंस अप्रैल 2017 में ही ख़त्म हो गया। लेकिन उसने इसके बाद सरकार से कुछ समय के लिए एक निश्चित रकम का विदेशी चंदा लेने की अनुमति ली।
इससे यह साफ़ है कि फ़ौरी तौर पर यह नहीं कहा जा सकता है कि एफ़सीआरए का उल्लंघन किया गया है। 

बीजेपी कनेक्शन!

रूरल इंडिया सपोर्टिंग ट्रस्ट की प्रमुख इंदु रावत हैं जो भोले जी महाराज की पत्नी हैं। भोले जी महाराज बीजेपी नेता और उत्तराखंड सरकार में मंत्री सतपाल महाराज के छोटे भाई हैं।  इससे यह साफ़ होता है कि इस ट्रस्ट के तार बीजेपी से भी जुड़े हुए हैं।
आरजीएफ़ को चीनी दूतावास से 90 लाख रुपए और यूरोपीय संघ से 3.84 लाख रुपए मिले। इसे जनीवा की संस्था ग्लोबल अलायंस फ़ॉर इंप्रूव्ड न्यूट्रिशन से 2.16 करोड़ रुपए भी मिले।

जाँच समिति

गृह मंत्रालय ने राजीव गांधी फ़ाउंडेशन (आरजीएफ़) और गांधी परिवार से जुड़े दो अन्य ट्रस्ट को हुई फ़ंडिंग की जांच में सहायता के लिए एक कमेटी बनाई है। केंद्र सरकार ने बुधवार को कहा कि यह कमेटी आरजीएफ़ के अलावा राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट और इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा भी प्रीवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए), इनकम टैक्स एक्ट और फॉरेन कांट्रीब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट (एफ़सीआरए) के कथित रूप से कानूनी प्रावधानों के उल्लंघन के आरोपों की जांच करेगी। इस कमेटी का नेतृत्व ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) के स्पेशल डायरेक्टर करेंगे। 
सवाल यह है कि आख़िर इस पूरी कवायद का मक़सद क्या है? क्या सरकार नई बहस छेड़ कोरोना पर अपनी नाकामी और चीन जैसे मुद्दे पर हुई फजीहत से लोगों का ध्यान बँटाना चाहती है? या सरकार कांग्रेस को संकेत दे रही है कि उसने असहज सवाल पूछे तो उसे भी कई सवालों के जवाब देने पर मजबूर कर दिया जाएगा? 
इन सवालों का सही उत्तर तभी मिलेगा जब सरकार जाँच पूरी कर लेगी। 

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