मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलज' को रिलीज के दो दिन बाद ही ओटीटी प्लैटफॉर्म से हटाने पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और SGPC ने इस पर बयान दिए हैं।
सतलज फिल्म ओटीटी प्लैटफॉर्म पर बैन
मशहूर अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की मुख्य भूमिका वाली फिल्म 'सतलज' (Satluj) को ओटीटी प्लेटफॉर्म 'ZEE5' से रिलीज के मात्र दो दिन बाद ही हटा दिया गया है। भारत में इस फिल्म के अचानक हटाए जाने के बाद पंजाब की सियासत में भारी उबाल आ गया है। विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले हुए इस फैसले पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC), शिरोमणि अकाली दल (SAD) और कांग्रेस सहित कई राजनीतिक दलों ने अपनी तीखी प्रतिक्रियाएं दी हैं। इसे ओटीटी सेंसरशिप से भी जोड़ा जा रहा है कि किस तरह मोदी सरकार अब ओटीटी प्लैटफॉर्म पर भी क्रिएटीविटी की हत्या करना चाहती है।
यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और पंजाब में उग्रवाद के दौर में हुई कथित गैर-न्यायिक (extra judical) हत्याओं व फर्जी मुठभेड़ों को उजागर करने के उनके संघर्ष पर आधारित है।
दिलजीत दोसांझ ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर फिल्म का एक बेहद प्रभावशाली वीडियो क्लिप साझा किया। उन्होंने पंजाबी भाषा में अपनी भड़ास निकालते हुए लिखा: ''I challenge the darkness शहीद जसवंत सिंह खालरा जी Panjab95 सतलज के साथ भी वही हुआ जो खालरा साहब के साथ हुआ। था।"
दिलजीत का यह बयान सीधे तौर पर उस इतिहास की तरफ इशारा करता है जिस पर यह फिल्म बनी है। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा को 1995 में कथित तौर पर अगवा कर लिया गया था और बाद में उनकी हत्या कर दी गई थी। दिलजीत का मानना है कि जिस तरह सच्चाई की आवाज उठाने के कारण खालरा साहब को गायब कर दिया गया, ठीक उसी तरह इस फिल्म के जरिए पंजाब का सच सामने लाने की कोशिश को भी 'डिजिटल तौर पर गायब' (बैन) कर दिया गया है।
यह सिर्फ सेंसरशिप नहीं हैः सुखबीर सिंह बादल
पंजाब में इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं। पंजाब के प्रमुख अकाली नेता और पूर्व सीएम सुखबीर सिंह बादल ने कहा- "भारत में ZEE5 से 'सतलज' को मनमाने ढंग से हटाए जाने से स्तब्ध और दुखी हूं। एक शक्तिशाली फिल्म, जो साहसपूर्वक पंजाब के दर्दनाक इतिहास को उजागर करती है और स. जसवंत सिंह जी खालरा के सर्वोच्च बलिदान का सम्मान करती है, उसे इस तरह खामोश नहीं किया जा सकता। यह सिर्फ सेंसरशिप नहीं है। यह हमारी सामूहिक यादों, सच और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। पंजाब अपने अतीत का ईमानदारी से सामना करने का हकदार है, दमन का नहीं।"
पूर्व क्रिकेटर और सांसद हरभजन सिंह ने क्या कहा
पंजाब से राज्यसभा सांसद और मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी रहे हरभजन सिंह ने भी सतलज को बैन किए जाने पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। हरभजन ने एक्स पर लिखा है- जलियांवाला बाग़ का हत्याकांड इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। इसे औपनिवेशिक शासन ने अंजाम दिया था। लेकिन जसवंत सिंह खालरा की कहानी देखने के बाद मेरे मन में एक अलग ही सवाल उठता है: बाहरी लोगों के ज़ुल्म से ज़्यादा दर्दनाक क्या हो सकता है? जब वे लोग, जिन पर अपने ही लोगों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी होती है, वही उनके सबसे बड़े डर का कारण बन जाएं।
हरभजन ने आगे लिखा है- एक पुलिस अफ़सर का फ़र्ज़ बेगुनाह लोगों की जान बचाना होता है, न कि अपनी ताक़त का ग़लत इस्तेमाल करना। खालरा की हिम्मत ने लोगों को ग़ायब करने और गुपचुप तरीके से अंतिम संस्कार करने जैसे कथित गैर-कानूनी कामों के सबूत सामने लाए। इससे हमें याद दिलाता है कि सरकारी ताक़त के ग़लत इस्तेमाल से ऐसे ज़ख्म लग सकते हैं जो पीढ़ियों तक बने रहते हैं।
पंजाब की माताएं आज भी जवाब का इंतज़ार कर रही हैं। कई परिवार आज भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं। सच हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। जसवंत सिंह खालरा की कहानी को दुनिया के सामने लाने के लिए हनी त्रेहन और दलजीत दोसांझ का बेहतरीन काम।उनकी हिम्मत हमेशा याद रखी जानी चाहिए।
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की प्रतिक्रिया: सिखों की प्रमुख संस्था एसजीपीसी ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। एसजीपीसी के मुख्य सचिव कुलवंत सिंह मन्नान ने पंजाब के युवाओं से इस फिल्म को देखने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह फिल्म उस कठिन दौर के सच्चे इतिहास को सामने लाती है। जसवंत सिंह खालरा ने लापता लोगों और फर्जी पुलिस मुठभेड़ों का सच सामने लाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी थी। युवाओं को इसे देखना चाहिए ताकि वे पंजाब के इतिहास और खालरा जी के योगदान को समझ सकें।
कांग्रेस सांसद तारिक अनवर ने क्या कहा
कांग्रेस नेता ने इस मामले पर संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि इस मुद्दे को राजनीतिक विवाद नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "हां, उस समय पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन यहां किसी राजनीति की जरूरत नहीं है। अगर कोई फिल्म तथ्यों पर आधारित है तो ठीक है, लेकिन इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।"आम आदमी पार्टी के अमन अरोड़ा का बयान
आम आदमी पार्टी के नेता और पंजाब के मंत्री अमन अरोड़ा ने विवाद को शांत करने की कोशिश करते हुए कहा, "इस फिल्म पर लंबे समय से चर्चा चल रही है, लेकिन इसके कंटेंट के बारे में किसी को स्पष्ट जानकारी नहीं है। कहा जा रहा है कि यह फर्जी मुठभेड़ों पर आधारित है। तथ्य जनता के सामने आने चाहिए, क्योंकि अच्छी और बुरी दोनों घटनाएं इतिहास का हिस्सा होती हैं। हालांकि, इन तथ्यों को इस तरह पेश किया जाना चाहिए जिससे भविष्य में भाईचारे और एकता को नुकसान न पहुंचे।"
ओटीटी पर सेंसरशिप का साया
मशहूर पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने इस घटनाक्रम को सेंसरशिप से जोड़ा है। उन्होंने एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा- क्या सेंसरशिप अब OTT तक भी पहुँच गई है? बिना किसी साफ़ वजह के 'सतलज' को Zee5 से हटा दिया गया है। प्लेटफ़ॉर्म का बस इतना कहना है कि "अगली सूचना तक यह भारत में उपलब्ध नहीं होगी।" OTT ने दर्शकों का दिल इसलिए जीता क्योंकि इसने बोल्ड और ओरिजिनल कहानियों को जगह दी। अगर वह जगह कम हो जाती है, तो फिर असल में क्या बचेगा?
'भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी का यही हाल'
मशहूर अंतरराष्ट्रीय पत्रकार राना अयूब ने लिखा है- कायरों ने फिर हमला किया है। 24 घंटे के अंदर ही ZEE5 से 'सतलुज/पंजाब 95' को हटा दिया गया है। भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी का यही हाल है। नफ़रत या प्रोपेगैंडा फैलाने वाली फ़िल्मों को टैक्स-फ़्री कर दिया जाता है, जबकि सच्चाई दिखाने वाली फ़िल्मों पर बैन लगा दिया जाता है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आपका स्वागत है।
मोदी सरकार और सतलज सेंसरशिप
'सतलज' फिल्म पर रोक ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म भी अब उसी तरह की सेंसरशिप के दायरे में आ रहे हैं, जिससे अब तक मुख्यतः सिनेमाघरों में रिलीज़ होने वाली फिल्मों को गुजरना पड़ता था? ओटीटी को लंबे समय तक रचनात्मक स्वतंत्रता का ऐसा मंच माना गया, जहां निर्माता अपेक्षाकृत कम हस्तक्षेप के साथ संवेदनशील सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर काम कर सकते थे। लेकिन 'सतलज' विवाद ने इस धारणा को चुनौती दी है। इस मामले की अहमियत सिर्फ एक फिल्म तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि अगर किसी ओटीटी फिल्म या सीरीज़ को रिलीज़ से पहले या बाद में राजनीतिक, वैचारिक या सामाजिक दबाव के आधार पर रोका जाने लगे, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं कौन तय करेगा?
ओटीटी की आज़ादी का बदलता स्वरूप
भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म शुरू में पारंपरिक फिल्म सेंसर व्यवस्था से बाहर थे। यही वजह थी कि यहां ऐसी कहानियां भी सामने आईं जिन्हें सिनेमाघरों के लिए बनाना मुश्किल माना जाता था। बाद में सरकार ने डिजिटल मीडिया और ओटीटी के लिए आचार संहिता और शिकायत निवारण व्यवस्था लागू की। आधिकारिक तौर पर इसे "स्व-नियमन" (Self-regulation) कहा गया, लेकिन समय के साथ सरकारी हस्तक्षेप और कानूनी कार्रवाइयों की आशंकाएं बढ़ती गईं। आज स्थिति यह है कि निर्माता सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि संभावित विरोध, मुकदमों, सोशल मीडिया अभियानों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का भी अनुमान लगाकर सामग्री तैयार करने लगे हैं। इसे कई विशेषज्ञ "पूर्व-सेंसरशिप" (Pre-censorship) या "सेल्फ-सेंसरशिप" कहते हैं।सबसे बड़ा खतरा: डर का माहौल
सेंसरशिप का सबसे गंभीर प्रभाव हमेशा प्रतिबंधित फिल्म पर नहीं पड़ता, बल्कि उन फिल्मों पर पड़ता है जो कभी बन ही नहीं पातीं। यदि फिल्मकारों को यह डर हो कि किसी संवेदनशील विषय पर काम करने से रिलीज़ रुक सकती है, कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं या आर्थिक नुकसान होगा, तो वे शुरुआत में ही ऐसे विषयों से बचने लगते हैं। इसका असर केवल मनोरंजन उद्योग पर नहीं पड़ता। समाज में विविध विचारों, आलोचनात्मक विमर्श और जटिल मुद्दों पर सार्वजनिक चर्चा भी सीमित होने लगती है।सोशल मीडिया पर रिएक्शंस
जैसे ही फिल्म को प्लेटफॉर्म से हटाया गया, सोशल मीडिया पर #Satluj, #DiljitDosanjh और #JaswantSinghKhalra ट्रेंड करने लगा। नेटिजन्स ने इस पर मिली-जुली लेकिन काफी आक्रामक प्रतिक्रियाएं दीं:
- फ्रीडम ऑफ स्पीच पर सवाल: कई यूजर्स ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी का हनन बताया। एक यूजर ने लिखा, "अगर हम अपने इतिहास के काले पन्नों को फिल्मों के जरिए भी नहीं देख सकते, तो हम लोकतंत्र होने का दावा कैसे कर सकते हैं? दिलजीत की फिल्म को बैन करना सच को दबाना है।"
- इतिहास का सामना करने की मांग: पंजाब से जुड़े कई सोशल मीडिया हैंडल्स ने लिखा, "जसवंत सिंह खालरा ने जिन 25,000 अज्ञात शवों का सच निकाला था, उससे आज भी सिस्टम डरता है। सतलुज को हटाकर आप केवल उस सच को और बड़ा बना रहे हैं।"
- ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की आलोचना: लोग ZEE5 के सब्सक्रिप्शन को कैंसिल करने की बात करने लगे। एक अन्य यूजर ने ट्वीट किया, "रिलीज के दो दिन बाद ही दबाव में आकर फिल्म हटा देना दिखाता है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स भी अब स्वतंत्र नहीं रह गए हैं।"
ZEE5 ने सतलज बैन पर क्या कहा
स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ZEE5 ने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि दर्शकों से फिल्म को जबरदस्त प्रतिक्रिया मिल रही थी। उन्होंने रचनात्मक विज़न और प्रामाणिक कहानियों का समर्थन करने की बात दोहराई। प्लेटफॉर्म ने साफ किया कि 'मौजूदा घटनाक्रमों' के चलते फिल्म फिलहाल भारत में उपलब्ध नहीं रहेगी, लेकिन वे कानूनी और उचित माध्यमों के जरिए इसे जल्द से जल्द वापस लाने के रास्ते तलाश रहे हैं।
यह फिल्म पिछले तीन सालों से सेंसर बोर्ड (CBFC) के साथ विवादों में फंसी हुई थी, जहां करीब 120 कट्स की मांग की जा रही थी। पहले इसका नाम 'पंजाब 95' (और उससे पहले 'घल्लूघारा') रखा गया था, जिसे बाद में बिना किसी सीन कटौती के सिर्फ नाम बदलकर 'सतलुज' के रूप में ओटीटी पर जारी किया गया था।