उत्तर प्रदेश के NGO लोक प्रहरी (Lok Prahari) ने नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दाखिल की थी। लोक प्रहरी की याचिका ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल खड़ा किया है- क्या चुनाव आयोग के शीर्ष अधिकारियों को इतनी व्यापक कानूनी सुरक्षा दी जा सकती है?
चुनाव आयुक्तों को मिली इम्युनिटी को क्यों न खत्म किया जाय
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर देश में जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयुक्तों को मिली व्यापक कानूनी सुरक्षा यानी इम्युनिटी को चुनौती देने वाली याचिका करीब 11 महीने से लंबित है। इस दौरान मामला सुप्रीम कोर्ट में सात बार सूचीबद्ध हो चुका है, लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी है। खास बात यह है कि जनवरी में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बावजूद केंद्र सरकार और चुनाव आयोग ने अब तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष तथा विभिन्न याचिकाकर्ताओं की ओर से गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी आयोग के फैसलों में कथित एकतरफापन और चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद से जुड़े मामलों पर केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।
नवंबर 2025 में दाखिल हुई थी याचिका
उत्तर प्रदेश की NGO लोक प्रहरी (Lok Prahari) ने नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दाखिल की थी। याचिका में Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 की धारा 16 को चुनौती दी गई है। इस धारा के तहत मौजूदा और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त तथा चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए किसी कार्य, निर्णय या कहे गए शब्द के संबंध में सिविल या आपराधिक अदालतों में कार्रवाई से सुरक्षा दी गई है।
- यानी किसी CEC या EC के खिलाफ उनके आधिकारिक कार्यकाल के दौरान किए गए काम को लेकर मुकदमा शुरू करना या पहले से चल रही कार्यवाही जारी रखना इस कानूनी सुरक्षा के दायरे में आता है। यह सुरक्षा उनके पद से हटने के बाद भी बनी रहती है।
लोक प्रहरी का तर्क- 'अभूतपूर्व और बेलगाम शक्ति'
याचिकाकर्ता लोक प्रहरी का कहना है कि इस तरह की व्यापक कानूनी सुरक्षा राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी हासिल नहीं है। संगठन के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों को इस तरह की सुरक्षा देना उन्हें 'अभूतपूर्व और बेलगाम शक्ति' देता है। लोक प्रहरी का आरोप है कि कानून चुनाव आयुक्तों के लिए जवाबदेही से बचने की एक अत्यधिक व्यापक और लगभग स्थायी ढाल तैयार करता है। संगठन के मुताबिक, इसका असर भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग या अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर किए गए कथित गैरकानूनी कार्यों से जुड़े मामलों पर भी पड़ सकता है।लोक प्रहरी के महासचिव एस.एन. शुक्ला ने कहा कि जनवरी में CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बावजूद केंद्र और चुनाव आयोग ने आठ महीने तक जवाब दाखिल नहीं किया। शुक्ला ने इसे सुप्रीम कोर्ट के प्रति उनके रवैये का संकेत बताया।
11 महीने में सात बार हुई लिस्टिंग
इस मामले की सुनवाई की स्थिति को देखें तो नवंबर 2025 में याचिका दाखिल होने के बाद से मामला सात बार सूचीबद्ध हो चुका है।
- जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी किया।
- मार्च 2026: कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा और मामले को मई में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
- मई 2026: मामला दो बार CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के सामने सूचीबद्ध हुआ, लेकिन दोनों मौकों पर सुनवाई नहीं हो सकी।
- अक्टूबर 2026: 5 अक्टूबर को हुई एक अन्य सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि लोक प्रहरी की याचिका अक्टूबर में बाद में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।
अब इसी पीठ के सामने लोक प्रहरी की याचिका आने की संभावना है।
CEC की शक्तियों और फैसलों को लेकर अलग याचिकाएं भी लंबितः लोक प्रहरी की याचिका अकेली ऐसी याचिका नहीं है जिसमें 2023 के चुनाव आयुक्त कानून पर सवाल उठाए गए हैं। चुनाव आयोग में फैसले लेने की प्रक्रिया और CEC ज्ञानेश कुमार की कथित भूमिका को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में अलग याचिकाएं चल रही हैं।
5 अक्टूबर को CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने ऐसी दो याचिकाओं पर सुनवाई की थी। इनमें एक याचिका CEC ज्ञानेश कुमार के निलंबन/हटाने की मांग से जुड़ी थी, जबकि दूसरी में उनके खिलाफ स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने उस समय अंतरिम तौर पर ज्ञानेश कुमार को कोई रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। अदालत ने कहा कि यदि रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि चुनाव आयोग के फैसले कानून में निर्धारित प्रक्रिया के मुताबिक नहीं लिए गए, तो अदालत ऐसे फैसलों को रद्द कर सकती है।
Form 6 विवाद भी सुनवाई के केंद्र में
CEC की कार्यप्रणाली से जुड़ी याचिकाओं में Form 6 में कथित बदलाव का मुद्दा भी उठाया गया है। Form 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नए मतदाता का नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि उसने Form 6 में किए गए किसी संशोधन को मंजूरी नहीं दी है। CJI सूर्यकांत ने कहा था कि जब संबंधित रिकॉर्ड अदालत के सामने आएंगे तो यह देखा जाएगा कि आखिर Form 6 में बदलाव किसने किया।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि चुनाव आयोग के रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि कोई फैसला न तो सर्वसम्मति से और न ही कानून में निर्धारित बहुमत के आधार पर लिया गया था, तो अदालत उस फैसले को निरस्त कर सकती है।
चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद का मुद्दा
यह विवाद उस समय और गंभीर हो गया जब इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की थी। इन आपत्तियों का संबंध विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) से जुड़े मतदाता सूची के फैसलों से बताया गया। इस रिपोर्ट के बाद विपक्षी दलों और अन्य संगठनों ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज कर दिए। सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर की सुनवाई में इसी मुद्दे पर कहा कि वह यह जांच करेगा कि चुनाव आयोग ने अपने फैसले लेने में कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया था या नहीं।2023 के कानून की नियुक्ति प्रक्रिया भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के घेरे में
चुनाव आयुक्तों की कानूनी इम्युनिटी से अलग, 2023 के इसी कानून में CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित प्रावधान भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के अधीन हैं। 23 सितंबर 2026 को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने अलग-अलग राय दी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा इस बात पर सहमत नहीं हो सके कि मामले को संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं। इसके बाद बड़े पीठ के गठन का मामला CJI के समक्ष चला गया। इस बीच याचिकाकर्ता जया ठाकुर ने फैसले को वापस लेने के लिए क्यूरेटिव याचिका दायर की। उन्होंने संभावित पूर्वाग्रह की आशंका जताते हुए कहा कि जस्टिस शर्मा के बेटे मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनाव आयोग की ओर से वकील के रूप में पेश होते हैं। बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने CJI को इसी विभाजित फैसले के खिलाफ दाखिल एक रिकॉल आवेदन की भी जानकारी दी।असली सवाल- चुनाव आयोग की जवाबदेही कितनी?
लोक प्रहरी की याचिका ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल खड़ा किया है- क्या चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान के शीर्ष अधिकारियों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए इतनी व्यापक कानूनी सुरक्षा दी जा सकती है कि पद छोड़ने के बाद भी उनके खिलाफ सिविल या आपराधिक कार्यवाही नहीं हो सके?एक तरफ सरकार और चुनाव आयोग का पक्ष है कि संवैधानिक संस्था को स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा जरूरी है। दूसरी तरफ याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त होना नहीं हो सकता। यही सवाल अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है। लेकिन इस सवाल पर दाखिल याचिका के 11 महीने और सात लिस्टिंग के बाद भी अभी तक न्यायिक परीक्षण शुरू नहीं हो पाया है। अब अक्टूबर में प्रस्तावित सुनवाई पर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को किस दिशा में आगे बढ़ाता है और क्या 2023 के कानून की धारा 16 की संवैधानिक वैधता पर वास्तविक सुनवाई शुरू होती है।