चुनाव आयोग से 8 साल से वोटर लिस्ट की सॉफ्ट कॉपी मांगी जाती रही थी जिसे आसानी से कम्प्यूटर से पढ़ा जा सके। 2018 में कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था, लेकिन ECI ने तब निजता का हवाला देकर इसका विरोध किया था।
बिहार एसआईआर पटना और मधुबनी में सबसे ज्यादा मतदाता नाम हटाए गए
चुनाव आयोग आख़िरकार मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट की पीडीएफ़ कॉपी देने को राजी हो गयी है। कम्प्यूटर से सर्च की जा सकने वाली वोटर लिस्ट की पीडीएफ़ की कॉपी की मांग पिछले आठ वर्षों से की जाती रही हैं, लेकिन अब तक चुनाव आयोग इसका विरोध करता रहा था। अब चुनाव आयोग हर मतदान केंद्र की ड्राफ्ट और अंतिम मतदाता सूची की दो प्रतियां मुफ्त उपलब्ध कराएगा। इनमें एक हार्ड कॉपी और दूसरी ऐसी PDF होगी, जिसमें कम्प्यूटर की मदद से मतदाताओं के नाम और विवरण खोजे जा सकेंगे। अब 15 अक्टूबर को जारी निर्देश के मुताबिक़ मतदाता सूची की डिजिटल कॉपी में मतदाताओं की तस्वीरें शामिल नहीं होंगी। इसके साथ ही राजनीतिक दलों को मतदाता सूची में जोड़े गए, हटाए गए और संशोधित किए गए नामों की अलग-अलग सूचियां भी उपलब्ध कराई जाएंगी।
यह फैसला तब आया है जब मतदाता सूची में बदलाव, नामों को हटाने और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर विपक्षी दल चुनाव आयोग से सवाल पूछते रहे हैं। कांग्रेस समेत विपक्षी दल लंबे समय से ऐसी डिजिटल मतदाता सूची की मांग कर रहे थे, जिसे कम्प्यूटर पर आसानी से पढ़ा और जांचा जा सके।
हर बूथ की वोटर लिस्ट PDF कॉपी मिलेगी
चुनाव आयोग ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश दिया है कि ड्राफ्ट और अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के तुरंत बाद मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को उसकी प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं। आयोग के मुताबिक प्रत्येक अलग मतदान केंद्र की मतदाता सूची की दो प्रतियां मुफ्त दी जाएंगी। इनमें एक कागज पर छपी हुई सूची होगी और दूसरी मशीन-रीडेबल PDF के रूप में डिजिटल कॉपी होगी।
यह निर्देश मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के नियम के तहत जारी किया गया है। पिछले कुछ वर्षों से चुनाव आयोग मतदाता सूची को मुख्य रूप से स्कैन की गई PDF तस्वीरों के रूप में उपलब्ध कराता रहा है। ऐसी PDF में मतदाताओं के नाम कम्प्यूटर पर सीधे सर्च करना या बड़े पैमाने पर डेटा का विश्लेषण करना मुश्किल होता है।
नई व्यवस्था के तहत मिलने वाली सर्चेबल PDF में राजनीतिक दल कम्प्यूटर पर नाम खोज सकेंगे और मतदान केंद्र के हिसाब से मतदाता सूची की जांच कर सकेंगे। हालाँकि, आयोग ने साफ़ किया है कि डिजिटल कॉपी में मतदाताओं की तस्वीरें नहीं होंगी।
नाम जोड़ने, हटाने, संशोधन की सूची भी मिलेगी
चुनाव आयोग के निर्देश का दूसरा अहम हिस्सा यह है कि राजनीतिक दलों को केवल मतदाता सूची की कॉपी ही नहीं दी जाएगी, बल्कि उन्हें सूची में हुए बदलावों की जानकारी भी उपलब्ध कराई जाएगी। इसमें तीन तरह की सूचियां शामिल होंगी-
- जोड़े गए नाम: मतदाता सूची में नए शामिल किए गए मतदाताओं की जानकारी।
- हटाए गए नाम: सूची से हटाए गए मतदाताओं का विवरण।
- संशोधित नाम: जिन मतदाताओं के मौजूदा रिकॉर्ड में सुधार या बदलाव किया गया है, उनकी जानकारी।
इससे राजनीतिक दलों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी मतदान केंद्र की मतदाता सूची में समय के साथ क्या बदलाव हुए हैं। मिसाल के तौर पर किसी बूथ पर कितने नए मतदाता जोड़े गए, कितने नाम हटाए गए और किन प्रविष्टियों में संशोधन हुआ- इनकी जाँच करना पहले की तुलना में आसान हो सकता है। विपक्षी दल लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि मतदाता सूची में होने वाले बदलावों की जानकारी इस तरह उपलब्ध हो, जिससे उनकी स्वतंत्र रूप से जांच की जा सके।
कांग्रेस 2018 में सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी
सर्च की जा सकने वाली मतदाता सूची की मांग नई नहीं है। इस मुद्दे पर कांग्रेस और चुनाव आयोग के बीच कई साल से विवाद रहा है। 2018 में कांग्रेस नेता कमलनाथ ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उनकी मांग थी कि मतदाता सूची टेक्स्ट फॉर्मेट में उपलब्ध कराई जाए, ताकि फर्जी और दोहराए गए नामों की पहचान करना आसान हो सके।चुनाव आयोग ने उस समय सर्चेबल PDF या मशीन से पढ़ी जा सकने वाली मतदाता सूची उपलब्ध कराने की मांग का विरोध किया था। आयोग ने निजता से जुड़ी चिंताओं और डेटा के गलत इस्तेमाल या बड़े पैमाने पर डेटा जुटाने के ख़तरे का हवाला दिया था। अब आयोग ने मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को सर्च की जा सकने वाली PDF देने का निर्देश जारी किया है। इस तरह यह फैसला उस पुरानी बहस के संदर्भ में भी अहम है, जिसमें राजनीतिक दल पारदर्शिता की मांग करते रहे हैं और आयोग ने पहले निजता से जुड़े सवाल उठाए थे।
राहुल गांधी और खड़गे ने भी उठाया था मुद्दा
जून 2025 में राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 2024 के लोकसभा चुनाव और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की मतदाता सूचियों को लेकर सवाल उठाए थे। कांग्रेस ने मांग की थी कि इन चुनावों की समेकित, डिजिटल और मशीन से पढ़ी जा सकने वाली मतदाता सूचियां उपलब्ध कराई जाएं। पार्टी ने मतदाता सूची में बदलावों का इतिहास और उन बदलावों के समय की जानकारी यानी टाइमस्टैम्प भी मांगे थे।कांग्रेस ने मतदान के दिन शाम 5 बजे के बाद की बूथों की सीसीटीवी फुटेज या वीडियोग्राफी उपलब्ध कराने की मांग भी की थी। पार्टी ने अंतिम मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी को लेकर सवाल उठाए थे और कहा था कि आंकड़ों तक पहुंच मिलने से वह अपना विश्लेषण कर सकती है।
उस समय चुनाव आयोग ने कांग्रेस के आरोपों को आधारहीन बताया था। आयोग का कहना था कि नियमित पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को मतदाता सूचियां उपलब्ध कराई जाती रही हैं। उसने यह भी कहा था कि मौजूदा व्यवस्था के तहत मशीन से पढ़ी जा सकने वाली सूचियों की मांग स्वीकार्य नहीं है।
सीसीटीवी फुटेज की जानकारी का क्या होगा?
अब 15 अक्टूबर के नए निर्देश के तहत मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को सर्चेबल PDF देने की व्यवस्था की गई है। हालांकि, यह निर्देश अपने आप में कांग्रेस की ओर से पहले उठाए गए सभी सवालों का जवाब नहीं है। मिसाल के तौर पर मतदाता सूची में बदलावों के पूरे इतिहास और टाइमस्टैम्प या मतदान के बाद की सीसीटीवी फुटेज को लेकर क्या व्यवस्था होगी, इस बारे में दिए गए विवरण में अलग से कुछ नहीं कहा गया है।
17 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में SSR की घोषणा
मतदाता सूची की सर्चेबल PDF देने के निर्देश के साथ चुनाव आयोग ने 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्पेशल समरी रिवीजन यानी SSR की भी घोषणा की है। आयोग ने संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को भेजे पत्र में कहा है कि इस पुनरीक्षण के लिए 1 जनवरी 2027 को पात्रता की तारीख माना जाएगा।
SSR का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना है। इसके तहत पात्र नए मतदाताओं को सूची में शामिल करना, मौजूदा प्रविष्टियों में गलतियों को सुधारना और मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना शामिल है। इस प्रक्रिया में खास तौर पर युवाओं और पहली बार वोट देने वाले लोगों को मतदाता सूची में शामिल करने पर जोर दिया जाएगा। SSR की घोषणा तब हुई है, जब पांच राज्यों में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर शामिल हैं।
SSR और SIR के बीच अंतर
यहां SSR और SIR के बीच अंतर समझना जरूरी है। SSR यानी Special Summary Revision मतदाता सूची को नियमित रूप से अपडेट करने की प्रक्रिया है। इसमें नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने और मौजूदा विवरणों में सुधार करने पर ध्यान दिया जाता है। वहीं, SIR यानी Special Intensive Revision विशेष गहन पुनरीक्षण है, जिसमें मतदाता सूची की अधिक व्यापक जांच की जाती है।
मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव से पहले एक अहम प्रशासनिक प्रक्रिया है। इसके जरिए नए पात्र मतदाताओं को शामिल किया जा सकता है और मतदाता रिकॉर्ड में मौजूद गलतियों को सुधारा जा सकता है। जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 के तहत चुनाव आयोग को विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने से छह महीने से अधिक पहले भी चुनाव कराने का अधिकार है।
SSR से क्या फायदा हो सकता है?
मतदाता सूची में नाम दर्ज होना मतदान के लिए बुनियादी शर्तों में से एक है। यदि किसी पात्र नागरिक का नाम सूची में नहीं है या उसके विवरण में गलती है तो उसे मतदान में परेशानी हो सकती है। SSR के जरिए ऐसे मामलों को ठीक करने का अवसर मिलता है। इसके प्रमुख उद्देश्य हैं-
- पात्र नए मतदाताओं, खासकर 18 वर्ष के होने वाले युवाओं और पहली बार वोट देने वालों को सूची में शामिल करना।
- मतदाताओं के नाम, पते और दूसरे विवरणों में मौजूद गलतियों को सुधारना।
- मतदाता सूची को अधिक सटीक और अप डू डेट बनाना।
- चुनाव से पहले पात्र मतदाताओं की एंट्री की जांच और सुधार की प्रक्रिया पूरी करना।
एक ओर चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की जांच को आसान बनाने के लिए सर्चेबल PDF देने का निर्देश जारी किया है तो दूसरी ओर 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SSR शुरू करने की घोषणा की है। इन दोनों फैसलों का असर आने वाले चुनावों से पहले मतदाता सूची तैयार करने और उसकी जांच करने की प्रक्रिया पर पड़ सकता है। राजनीतिक दलों को अब बूथवार मतदाता सूची खोजने और उसमें हुए बदलावों की पड़ताल करने के लिए बेहतर डिजिटल सुविधा मिलने की उम्मीद है। वहीं, SSR के तहत नए पात्र मतदाताओं को जोड़ने और मौजूदा रिकॉर्ड में गलतियां सुधारने का काम किया जाएगा।