22 जनवरी 2026 को चुनाव आयोग ने ECINET लॉन्च किया था। विवाद ECINET और ERONET के जरिए मतदाता सूची के प्रबंधन को लेकर है। सीमा खन्ना को NIC से लाकर चुनाव आयोग के पूरे डिजिटल सिस्टम का सबसे बड़ा अधिकारी बना दिया गया। इसके बाद सीमा खन्ना लगातार ताकतवर होती गईं।
चुनाव आयोग में डेपुटेशन पर आई डॉ सीमा खन्ना सीईसी के बाद सबसे पावरफुल शख्सियत बन गईं
चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम ECINet और मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया को लेकर विवाद अब चुनाव आयोग के भीतर तक पहुंच गया है। इस विवाद के केंद्र में आयोग की Director General (IT) सीमा खन्ना का नाम सामने आया है। India Today की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने सवाल उठाया है कि क्या सीमा खन्ना के नेतृत्व वाले IT विभाग ने जमीनी स्तर पर काम करने वाले Electoral Registration Officers (EROs) की पहुंच और उनके वैधानिक अधिकारों को सीमित नहीं कर दिया। जिस तरह गोवा में ईआरओ वोटर लिस्ट सिस्टम में बदलाव नहीं कर सके। जबकि उनके पास इसकी वैधानिक ताकत थी। लेकिन केंद्र में बैठी सीमा खन्ना का विभाग इस काम को आसानी से कर रहा था। जबकि उनके पास वोटर लिस्ट सिस्टम में बदलाव या छेड़छाड़ का कोई वैधानिक अधिकार नहीं था।
कौन हैं सीमा खन्ना?
सीमा खन्ना चुनाव आयोग के IT और डिजिटल सिस्टम की प्रमुख अधिकारी हैं। वह 2025 में National Informatics Centre (NIC) से डेपुटेशन पर चुनाव आयोग में आई थीं। आयोग के डिजिटल और टेक्नोलॉजी सिस्टम की देखरेख उनकी जिम्मेदारी है। 22 जनवरी 2026 को चुनाव आयोग ने ECINet लॉन्च किया था। इसका उद्देश्य आयोग के 40 से अधिक ऐप्स और पोर्टलों को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म के तहत लाना था। उस समय सीमा खन्ना ने कहा था कि यह प्लेटफॉर्म चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, विश्वसनीयता और जनता के विश्वास को बढ़ाने में मदद करेगा। लेकिन अब इसी सिस्टम को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या मतदाता सूची से संबंधित कामकाज का नियंत्रण जरूरत से ज्यादा केंद्रीयकृत (सेंट्रलाइज्ड) हो गया है।
विवाद की असली जड़ क्या है?
विवाद ECINet और ERONet के जरिए मतदाता सूची के प्रबंधन को लेकर है। कानून के तहत हर विधानसभा क्षेत्र में नियुक्त ERO को मतदाता सूची तैयार करने, नाम जोड़ने, सुधार करने और नाम हटाने की वैधानिक जिम्मेदारी दी गई है। Representation of the People Act, 1950 और Registration of Electors Rules, 1960 के तहत ERO मतदाता सूची से जुड़े दावों और आपत्तियों पर फैसला करता है।लेकिन Indian Express की जांच का हवाला देते हुए India Today ने बताया कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने सवाल उठाया कि सॉफ्टवेयर में किए गए बदलावों के कारण क्या ERO अपने वैधानिक अधिकारों का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल कर पा रहे हैं।
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला
इस विवाद का सबसे अहम उदाहरण गोवा का सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा में 97 मतदाताओं के मामलों की स्थानीय ERO स्तर पर जांच हुई और उन्हें मतदाता सूची में शामिल किए जाने के योग्य पाया गया। लेकिन संबंधित नामों को अंतिम मतदाता सूची में शामिल करने में सॉफ्टवेयर और डेटाबेस एक्सेस से जुड़ी समस्या सामने आई। ईआरओ इसे मतदाता सूची सिस्टम में डाल ही नहीं पा रहे थे।
- गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के दफ्तर ने इस समस्या के समाधान और rollback facility उपलब्ध कराने के लिए 11 से 17 फरवरी के बीच चुनाव आयोग को आठ बार ईमेल भेजे।
- इन कम्युनिकेशन में वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश भारती को संबोधित किया गया और सीमा खन्ना को भी उसकी कॉपी भेजी गई थी।
- रिपोर्ट के अनुसार, उप निर्वाचन आयुक्त संजय कुमार ने भी सीमा खन्ना को निर्देश दिया था कि IT सिस्टम ऐसी रुकावट न बने जिससे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक आवश्यक कार्रवाई प्रभावित हो।
नवंबर 2025 से उठ रहे थे सवालः यह विवाद ECINet लॉन्च होने के बाद अचानक शुरू नहीं हुआ। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, 4 नवंबर 2025 को ही संजय कुमार ने सीमा खन्ना और आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों को लिखा था कि ERO, DEO और CEO के वैधानिक कार्य उन्हीं अधिकारियों द्वारा किए जाने चाहिए और IT सिस्टम को कानून के अनुरूप काम करना चाहिए। इसके बाद 2 जनवरी 2026 को भी इसी तरह की चिंता व्यक्त की गई थी। यानी आयोग के भीतर यह सवाल ECINet के औपचारिक लॉन्च से पहले ही उठ चुका था कि डिजिटल सिस्टम कहीं उन अधिकारियों के वैधानिक अधिकारों को सीमित तो नहीं कर रहा है जिन्हें कानून ने मतदाता सूची का जिम्मा सौंपा है।
दो चुनाव आयुक्तों ने उठाए सवाल
इस पूरे विवाद ने चुनाव आयोग के भीतर मतभेद को भी सामने ला दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को पत्र लिखकर मतदाता सूची के डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीयकरण और जमीनी अधिकारियों की पहुंच को लेकर चिंता जताई। दोनों चुनाव आयुक्तों का सवाल था कि क्या DG (IT) को ERO जैसे वैधानिक अधिकारियों की पहुंच या उनके अधिकारों को नियंत्रित अथवा सीमित करने का कानूनी अधिकार है। उन्होंने जमीनी स्तर के अधिकारियों के लिए पूर्ण डिजिटल एक्सेस बहाल करने की मांग भी की।विपक्ष ने भी सीमा खन्ना को बनाया निशाना
ECINet विवाद अब राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने सीमा खन्ना और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि चुनावी सॉफ्टवेयर के backend control के जरिए मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या बदलाव करने की क्षमता केंद्रीकृत हो सकती है। कुछ नेताओं ने AI के इस्तेमाल को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं।चुनाव आयोग का लीपापोती वाला बयान
चुनाव आयोग ने इन आरोपों से अलग अपना पक्ष रखा। आयोग ने कहा है कि ECINet विकेंद्रीकृत व्यवस्था के तहत काम करता है और मतदाता सूची तैयार करने की वैधानिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य और विधानसभा क्षेत्र के अधिकारियों के पास ही रहती है। ECI के अनुसार, ERO को ECINet पर अपने वैधानिक दायित्व निभाने के लिए पूर्ण और निर्बाध पहुंच दी गई है। आयोग ने यह भी कहा कि ECINet को लागू कानून, नियमों और आयोग के निर्देशों के अनुरूप तैयार किया गया है। गोवा के मामले में आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि ECINet में Form 7 के जरिए किसी मतदाता का नाम हटाए जाने के बाद उसे rollback करने का विकल्प मौजूद नहीं था। आयोग ने कहा कि इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया सेंट्रलाइज्ड कर दी गई है।ECINet विवाद क्यों महत्वपूर्ण है?
इस विवाद का मूल सवाल सिर्फ किसी एक सॉफ्टवेयर की तकनीकी क्षमता का नहीं है। मुद्दा यह है कि मतदाता सूची पर अंतिम वैधानिक नियंत्रण किसके पास है और डिजिटल सिस्टम उस कानूनी व्यवस्था को किस तरह लागू करता है। एक तरफ आयोग का कहना है कि ERO के वैधानिक अधिकार बरकरार हैं और ECINet में डेटा सुरक्षा तथा नियंत्रण के लिए तकनीकी व्यवस्थाएं हैं।
- दूसरी तरफ दो चुनाव आयुक्तों की ओर से उठाए गए सवाल यह चिंता सामने रखते हैं कि यदि किसी ERO के पास कानून के तहत फैसला लेने का अधिकार है, लेकिन सॉफ्टवेयर उसे अपने फैसले को लागू करने की सुविधा नहीं देता, तो कानूनी अधिकार और वास्तविक तकनीकी अधिकार के बीच अंतर पैदा हो सकता है।
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला इसी बहस का प्रमुख उदाहरण बन गया है। इस मामले में स्थानीय अधिकारियों ने मतदाताओं को योग्य पाया, लेकिन अंतिम सूची में उनके नाम शामिल करने की प्रक्रिया तकनीकी समस्या के कारण विवाद में आ गई।
- इस तरह सीमा खन्ना की भूमिका पर उठा सवाल असल में चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम, ERO की वैधानिक शक्तियों और मतदाता सूची के नियंत्रण की पूरी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। सीमा खन्ना का प्रकरण कानून का मजाक है। ताज्जुब है कि अभी तक इस ताकतवर महिला को उनके पद से हटाया नहीं गया है।