मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर उठे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने उन मतदाताओं को दोबारा सूची में शामिल करने के लिए विशेष अभियान शुरू करने का फैसला किया है, जिनके नाम एसआईआर के दौरान छूट गए हैं। यह अभियान उन 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चलाया जाएगा जहां SIR पूरा हो चुका है और जहां मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नाम छूटने की शिकायतें सामने आई हैं। इसी बीच कर्नाटक में Form 7 के कथित बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से मतदाताओं के नाम हटाने के आरोपों पर चुनाव अधिकारियों ने जांच के आदेश दिए हैं। 

20 राज्यों में ‘Left Out’ वोटरों के लिए विशेष अभियान

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने उन पात्र मतदाताओं की पहचान और रजिस्ट्रेशन के लिए विशेष अभियान शुरू किया है, जो SIR के दौरान अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए। आयोग का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि पात्र नागरिक केवल प्रशासनिक या दस्तावेजी प्रक्रिया की वजह से मतदान के अधिकार से वंचित न रह जाएं।
यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब SIR के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर राजनीतिक दलों, नागरिक संगठनों और अन्य पक्षों ने सवाल उठाए हैं। आयोग का कहना है कि विशेष अभियान के जरिए छूटे हुए पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करने की प्रक्रिया को मजबूत किया जाएगा।
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SIR में बड़े पैमाने पर नाम हटने का विवाद

SIR को लेकर पहले भी द इंडियन एक्सप्रेस की जांच में बताया गया था कि कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में करोड़ों नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए। जुलाई में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, 10 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में 5.58 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने की बात सामने आई थी। 
एक अन्य एक्सप्रेस जांच के मुताबिक, बिहार से शुरू हुए SIR के राष्ट्रीय विस्तार के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से जुड़े कई फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की थी।

Form 6 को लेकर भी उठा था सवाल

SIR के दौरान नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में अतिरिक्त घोषणा जोड़े जाने को लेकर भी विवाद हुआ था। एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन Form 6 में आवेदक से यह पूछा जा रहा था कि उसका नाम या उसके माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं। रिपोर्ट में कहा गया था कि इस अतिरिक्त हिस्से को वैधानिक Form 6 में शामिल करने के लिए आवश्यक नियम संशोधन की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी। बाद में चुनाव आयोग ने उन राज्यों में ऑनलाइन Form 6 से यह अतिरिक्त घोषणा हटा दी जहां SIR पूरा हो चुका था। कुल मिलाकर अब पुराने फॉर्म 6 के ज़रिये आसानी से वोटर बना जा सकता है।

कर्नाटक में Form 7 को लेकर नया विवाद

SIR को लेकर कर्नाटक में विवाद का केंद्र Form 7 बन गया है। Form 7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी व्यक्ति के नाम को हटाने पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है। इसका इस्तेमाल ऐसे मामलों में किया जा सकता है जहां किसी मतदाता की मृत्यु हो चुकी हो, वह स्थायी रूप से स्थानांतरित हो गया हो, उसका नाम दूसरी जगह दर्ज हो या वह पात्र मतदाता न हो। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने आरोप लगाया कि कुछ इलाकों में Form 7 का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर पात्र मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि कई Form 7 पहले से मतदाता की जानकारी प्रिंट करके तैयार किए गए थे और उन्हें जमा किया गया। शिवकुमार ने दावा किया कि ऐसी गतिविधियां केवल एक-दो निर्वाचन क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने बेलगावी, बीजापुर/विजयपुरा, बल्लारी, मुदिगेरे, भाल्की और मैसूरु समेत कई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में Form 7 जमा किए जाने का मुद्दा उठाया।

हजारों Form 7 जमा और फिर वापस लिए गए

शिवकुमार के अनुसार, बल्लारी की दो विधानसभा सीटों में लगभग 13,000 Form 7 आवेदन जमा किए गए और बाद में वापस ले लिए गए। विजयपुरा में भी लगभग 13,000 आवेदन जमा किए जाने और बाद में वापस लिए जाने का दावा किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ लोगों ने बाद में लिखित रूप से यह स्वीकार किया कि आवेदन जमा करने में उनसे गलती हुई थी।
शिवकुमार ने यह भी दावा किया कि राज्य के कई निर्वाचन क्षेत्रों में हजारों Form 7 एक साथ जमा हुए। उनके द्वारा बताए गए आंकड़ों में बेलगावी नॉर्थ में करीब 3,000, मुदिगेरे में 6,259, बाबलेश्वर में 1,373, नरसिम्हाराजा में 1,200 और भाल्की में 2,285 आवेदन शामिल हैं। The Indian Express
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि इन आवेदनों के पीछे संगठित प्रयास हो सकता है और चुनाव आयोग से इसकी आपराधिक जांच की मांग की। ये आरोप मुख्यमंत्री के हैं; इन आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।

कर्नाटक CEO ने जांच के आदेश दिएः शिवकुमार और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों ने 1 अक्टूबर को कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अनबु कुमार के कार्यालय के बाहर लगभग पांच घंटे तक धरना दिया। मुख्यमंत्री ने एक ज्ञापन देकर कथित फर्जी Form 7 मामलों में FIR और समयबद्ध जांच की मांग की। इसके बाद CEO ने सभी 224 विधानसभा क्षेत्रों के Electoral Registration Officers (EROs) को कार्रवाई के निर्देश दिए।

CEO के निर्देश के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति Forms 6, 6A, 7 या 8 में जानबूझकर गलत बयान या घोषणा करता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ Representation of the People Act, 1950 की धारा 31 के तहत कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, कार्रवाई से पहले Registration of Electors Rules, 1960 के Rule 20 के तहत जांच करनी होगी। यानी किसी Form 7 के जमा हो जाने भर से मतदाता का नाम अपने आप नहीं हटाया जा सकता। कथित गलत घोषणा की जांच और निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है।

पुलिस ने भी FIR दर्ज की

इस विवाद के बीच कर्नाटक पुलिस ने 1 अक्टूबर को Form 7 से जुड़े मामलों में पांच FIR दर्ज किए। ये FIR Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS), 2023 की धाराओं के तहत दर्ज की गईं। शिवकुमार का कहना है कि चुनाव आयोग को भी अपनी ओर से कार्रवाई करनी चाहिए और यह पता लगाना चाहिए कि कथित तौर पर पहले से मतदाताओं की जानकारी भरे हुए Form 7 कहां से तैयार हुए और मतदाताओं का डेटा किस स्रोत से हासिल किया गया।

Form 7 में मुस्लिम वोटरों को निशाना बनाने का आरोप

द हिंदू की रिपोर्ट के आधार पर सामने आई जानकारी के अनुसार, कर्नाटक के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में Form 7 आवेदनों का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने से संबंधित था। रिपोर्ट में बेलगावी नॉर्थ, भाल्की, बाबलेश्वर, बसवकल्याण और बेलथंगडी जैसे क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है। 
उदाहरण के तौर पर, रिपोर्ट में कहा गया कि बाबलेश्वर में 10 लोगों ने 1,363 Form 7 आवेदन दाखिल किए। भाल्की में करीब 30 लोगों द्वारा 1,700 से अधिक मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश का उल्लेख है। बसवकल्याण में एक व्यक्ति ने एक दिन में दाखिल 37 आवेदनों में से 32 दाखिल किए और वे सभी मुस्लिम मतदाताओं से संबंधित बताए गए।
बेलगावी नॉर्थ में कुछ बूथ लेवल अधिकारियों ने कथित तौर पर बताया कि दो व्यक्ति बड़ी संख्या में पहले से प्रिंट किए गए Form 7 लेकर आए थे। इन फॉर्म में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने का अनुरोध था। अधिकारियों ने इन फॉर्म पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया। रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित ERO ने बाद में इन फॉर्म को जमा करने के लिए निर्देश देने से इनकार किया।

SIR के बीच दो मोर्चों पर चुनाव आयोग की परीक्षा

एक तरफ चुनाव आयोग ने SIR के बाद 20 राज्यों में उन पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है, जिनके नाम छूट गए। दूसरी तरफ कर्नाटक में Form 7 के बड़े पैमाने पर दाखिल होने को लेकर जांच शुरू हो गई है। कर्नाटक का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सवाल केवल नाम हटाने की प्रक्रिया का नहीं, बल्कि मतदाता डेटा तक पहुंच, पहले से भरे हुए Form 7, बड़े पैमाने पर एक साथ आवेदन और आवेदन वापस लिए जाने से जुड़े हैं। जांच में यह पता लगाना होगा कि आवेदन किसने तैयार किए, डेटा कहां से मिला, किसने उन्हें जमा किया और क्या किसी पात्र मतदाता का नाम वास्तव में गलत तरीके से हटाया गया।
SIR को लेकर पहले से चल रही राष्ट्रीय बहस में कर्नाटक का Form 7 विवाद एक नया अध्याय जोड़ता है। वहीं 20 राज्यों में ‘Left Out’ मतदाताओं के लिए विशेष अभियान इस बात का संकेत है कि चुनावी सूची को लेकर उठे सवालों के बीच पात्र मतदाताओं की दोबारा पहचान और समावेशन को अब चुनाव आयोग ने भी एक अलग प्रशासनिक प्राथमिकता के रूप में लिया है।