पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर ने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम से सबसे अच्छे उम्मीदवार चुनने का मकसद पूरा नहीं हुआ है। उन्होंने न्यायपालिका में कार्यपालिका के हस्तक्षेप, कॉलेजियम प्रणाली की पारदर्शिता और अदालतों में बढ़ते मुकदमों के बैकलॉग पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने जजों की नियुक्ति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि पिछले 12 वर्षों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में कार्यपालिका का बिना किसी स्पष्ट कारण के हस्तक्षेप बढ़ा है जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए चिंता का विषय है।
डॉ. मुरलीधर 28वें डी.एस. बोरकर मेमोरियल लेक्चर में 'विजन ऑफ इंडिया 2047' विषय पर बोल रहे थे। अपने संबोधन में उन्होंने कॉलेजियम व्यवस्था की पारदर्शिता, न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी और अदालतों में बढ़ते मामलों के बोझ को लेकर चिंता जताई।
डॉ. मुरलीधर ने कहा कि कॉलेजियम व्यवस्था का मूल मक़सद न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखना और सबसे योग्य उम्मीदवारों का चयन करना था, लेकिन अब इस बात पर आम सहमति बनती जा रही है कि यह व्यवस्था अपने लक्ष्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर सकी है। उन्होंने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, चयन के स्पष्ट मानकों का अभाव और प्रशासनिक स्तर पर होने वाली देरी ने पूरी व्यवस्था को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि पिछले 12 वर्षों के दौरान नियुक्तियों में कार्यपालिका का ऐसा हस्तक्षेप देखने को मिला है, जिसकी कोई स्पष्ट वजह सामने नहीं आई।
क्या है कॉलेजियम व्यवस्था?
कॉलेजियम व्यवस्था वह प्रणाली है जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले की सिफारिश वरिष्ठ न्यायाधीशों का समूह करता है। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फ़ैसलों के बाद विकसित हुई और इसमें न्यायपालिका की भूमिका सबसे प्रमुख मानी जाती है। हालाँकि, समय-समय पर इस व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा विवाद कार्यपालिका के हस्तक्षेप को लेकर रहा है।
नियुक्तियाँ कॉलेजियम के ज़रिए होती हैं लेकिन सरकार सिफारिशों को लौटा सकती है, देरी कर सकती है या चुनिंदा तरीके से मंजूरी दे सकती है। कई बार आरोप लगे हैं कि राजनीतिक या वैचारिक मतभेद के कारण भी ऐसा होता है। जिन न्यायाधीशों, वकीलों ने सरकार या उसके नेताओं के खिलाफ फैसले दिए हों, उनके नाम पर ज्यादा देरी होने के आरोप लगते हैं। आरोप यह भी लगता है कि कई बार वरिष्ठता प्रभावित करने या बैच में से नाम हटाकर सीनियरिटी बदलने की कोशिश होती है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने खुद कभी-कभी कहा कि सरकार कार्यपालिका द्वारा लाए गए NJAC के फेल होने से खुश नहीं है, इसलिए देरी कर रही है। ऐसे कई मामले हैं जब सरकार की दखल पर विवाद हुए।
सरकार पर देरी करने का आरोप क्यों?
कानूनी स्थिति यह है कि कॉलेजियम दोबारा सिफारिश करे तो सरकार को नियुक्ति करनी चाहिए, लेकिन व्यवहार में सरकार बिना औपचारिक अस्वीकृति के नामों को लंबे समय तक 'प्रोसेस' में रख सकती है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने गोपाल सुब्रमण्यम सहित चार जजों को 2014 में SC जज बनाने की सिफारिश की। सरकार ने बाकी तीन नामों को मंजूर कर दिया, लेकिन सुब्रमण्यम का नाम अलग कर दिया। आरोप था कि अमित शाह से जुड़े सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में उनकी भूमिका के बीच आपत्ति आई थी। बाद में सुब्रमण्यम ने खुद नाम वापस ले लिया था।
2019 में कॉलेजियम ने जस्टिस अकिल कुरैशी को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की। सरकार ने बैच के बाकी नाम मंजूर कर दिए, लेकिन कुरैशी का नाम अटका दिया। बाद में उन्हें छोटे त्रिपुरा हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया। 2010 में अमित शाह को कस्टडी में भेजने का आदेश देने वाले जस्टिस कुरैशी का नाम क्लियर होने में देरी हुई। वे सुप्रीम कोर्ट नहीं पहुंच पाए।दिल्ली हाई कोर्ट कॉलेजियम ने सौरभ किरपाल के नाम की 2017 में सिफारिश की। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने भी बार-बार सिफारिश दोहराई। सरकार ने 'उनके पार्टनर विदेशी नागरिक हैं' और 'सेक्सुअल ओरिएंटेशन' का हवाला देते हुए आपत्ति जताई। सालों तक नाम लंबित रहा। कई अन्य नाम जो बाद में सिफारिश हुए थे, वे क्लियर हो गए। यह मामला आज भी चर्चा में रहता है।
2018 में जस्टिस के.एम. जोसेफ का नाम शुरू में लौटाया गया लेकिन बाद में मंजूर हुआ। इसके अलावा कई हाई कोर्ट वकीलों के नाम 2-4 साल तक लंबित रहे, कुछ ने नाम वापस ले लिया। 2022-23 में सुप्रीम कोर्ट ने खुद सरकार की 'काफ़ी ज़्यादा देरी' की आलोचना की थी।
समय रहते क्यों नहीं होती नियुक्तियां?
बहरहाल, अपने संबोधन में डॉ. मुरलीधर ने कहा कि हर न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की तारीख पहले से तय होती है। इसके बावजूद समय रहते नए न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं हो पाती जिससे हाईकोर्टों में बड़ी संख्या में पद खाली रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि केवल न्यायाधीशों के स्वीकृत पद बढ़ा देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जब तक नियुक्ति प्रक्रिया तेज और प्रभावी नहीं होगी, तब तक रिक्तियों की समस्या बनी रहेगी।'लंबित मामलों के लिए केवल जज जिम्मेदार नहीं'
उन्होंने अदालतों में लंबित मामलों के लिए केवल न्यायाधीशों को ज़िम्मेदार ठहराने की सोच को गलत बताया। उन्होंने कहा कि कई न्यायाधीश बेहद कठिन परिस्थितियों में लगातार बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा कर रहे हैं। उपलब्ध आँकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में न्यायाधीश अपनी कार्यक्षमता के ज़रिए लंबित मामलों को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। उनके मुताबिक़, बैकलॉग की समस्या के पीछे कई अन्य कारण भी हैं।
'सरकारें भी बढ़ाती हैं मुकदमे'
डॉ. मुरलीधर ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें भी अदालतों पर बढ़ते बोझ के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि कई बार सरकारों के मनमाने फ़ैसले, प्रशासनिक देरी, बिना ज़रूरत गिरफ्तारी और सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों का अपराधीकरण लोगों को अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर कर देता है।
जस्टिस डॉ. मुरलीधर ने कहा कि सरकारें कई मामलों में अदालत के फैसले के खिलाफ अपील कर देती हैं, चाहे मामला छोटा ही क्यों न हो।
इससे अदालतों में मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जाती है और लंबित मामलों का बोझ कम होने के बजाय और बढ़ जाता है।
डॉ. मुरलीधर ने सरकारी वकीलों की कार्यप्रणाली पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई मामलों में सरकारी पक्ष की ओर से बार-बार स्थगन मांगा जाता है। समय पर दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जाते, रिकॉर्ड अधूरे रहते हैं और विभागों की ओर से स्पष्ट निर्देश नहीं मिलते। उन्होंने कहा कि इन कारणों से न्यायिक प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है और अदालतों का समय भी व्यर्थ होता है।
न्याय व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत
अपने संबोधन में डॉ. मुरलीधर ने कहा कि यदि न्यायपालिका को अधिक प्रभावी बनाना है तो केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, तेज और जवाबदेह बनाने के साथ-साथ सरकारों को भी मुक़दमों की संख्या कम करने के लिए जिम्मेदार प्रशासनिक फैसले लेने होंगे।
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना और संस्थागत सुधार करना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है।