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ऐसे कैसे निपटेंगे भ्रष्टाचार से? सीवीसी को चुनने वाला ख़ुद ही बना पद का दावेदार!

मोदी सरकार पर जिन कारणों से संवैधानिक संस्थाओं को ख़त्म करने का आरोप लगता रहा है कुछ वैसा ही मामला अब सीवीसी यानी मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को लेकर आया है। दरअसल, सीवीसी को नियुक्त करने के लिए जो सर्च कमेटी बनी थी उसके ही एक सदस्य ने सीवीसी के लिए दावेदारी भी जता दी और चौंकाने वाली बात यह है कि उसको शॉर्टलिस्ट भी कर लिया गया। यानी आयुक्त नियुक्त किए जाने के काबिल भी मान लिया गया। हालाँकि, तीखे विरोध के कारण उनको चुना नहीं जा सका। सूत्रों के हवाले से मीडिया में यह रिपोर्ट आई है। यह सीवीसी का वही पद है जिसके पूर्व आयुक्त के वी चौधरी अपने कार्यकाल में काफ़ी विवादों में रहे थे और जिन पर मोदी सरकार के इशारे पर काम करने का आरोप लगता रहा था। उनके सेवानिवृत्त होने के बाद से पिछले आठ महीने से यह पद खाली है। सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद ही उन्हें रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में शामिल कर दिया गया था।

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अब जब नियुक्ति प्रक्रिया फिर से शुरू हुई है तब फिर से इस पर विवाद बढ़ता दिख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गठित सर्च कमेटी में कैबिनेट सचिव राजीव गौबा, वित्त सचिव राजीव कुमार और सचिव (कार्मिक) सी. चंद्रमौली थे। लेकिन इसमें ख़ास बात यह रही कि सीवीसी पद के लिए जो आवेदक थे उनमें वित्त सचिव राजीव कुमार भी शामिल थे और जिन 126 लोगों को शॉर्टलिस्ट किया गया उनमें भी राजीव कुमार का नाम था। इन शॉर्टलिस्ट किए गए नामों पर विपक्ष की ओर से एकमात्र सदस्य ने ज़बरदस्त विरोध किया और नियुक्ति प्रक्रिया को रद्द करने की माँग की। हालाँकि इस बीच रिपोर्ट है कि राजीव कुमार को सीवीसी नियुक्त नहीं किया गया। 'द टेलीग्राफ़' की रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रपति के सचिव संजय कोठारी को अगला सीवीसी चुन लिया गया है, लेकिन औपचारिक तौर पर इसकी घोषणा नहीं हुई है।

सीवीसी में नियुक्ति इसलिए ख़ास मायने रखती है क्योंकि सीवीसी की देश में एक अहम ज़िम्मेदारी है। यह वह ज़िम्मेदारी है जिसके तहत सरकार के अफ़सरों से लेकर मंत्रालयों तक पर निगरानी रखी जाती है। 

सीवीसी क्या काम करती है?

  • भ्रष्‍टाचार से जुड़े मामलों में केंद्रीय जाँच ब्‍यूरो को जाँच के लिए निर्देश देना।
  • लोक सेवकों की कुछ श्रेणियों के लिए किसी अपराध की जाँच के लिए निर्देश देना।
  • भारत सरकार से संबद्ध भेजे गए मामले की जाँच करना और सरकार को इसकी सिफ़ारिश करना।
  • केंद्रीय सरकारी मंत्रालयों, विभागों व संगठनों के सतर्कता प्रशासन पर निगरानी रखना।
  • जाँच का संचालन करते वक्‍़त आयोग को सिविल न्यायालय के समान सभी अधिकार प्राप्त।
व्यवस्था को पारदर्शी बनाए रखने में सीवीसी की अहम भूमिका है। ऐसे में यदि सरकार का चहेता व्यक्ति सीवीसी बन जाए और निगरानी की अपनी भूमिका सही से नहीं निभा पाए तो भ्रष्टाचार बढ़ना तय है।

इसी बात को लेकर कांग्रेस ने सवाल भी उठाए हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जिस बैठक में सीवीसी को नियुक्त किये जाने का फ़ैसला हुआ उसमें लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी भी शामिल थे। इस पूरी प्रक्रिया से रूबरू कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि सर्तकता आयोग को सरकार का सुरक्षा कवच के तौर पर तैयार किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल में भी ऐसा ही व्यवहार देखा गया था जिसमें भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने वाले संस्थानिक ढाँचों को प्रधानमंत्री ने ध्वस्त कर दिया है। 

पूर्व सीवीसी भी रहे थे विवादों में

प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल में भी सीवीसी के दुरुपयोग के ख़ूब आरोप लगते रहे थे। ये आरोप सीवीसी की नियुक्ति प्रक्रिया से लेकर काम करने के तौर-तरीक़ों पर लगे थे। जब पिछली बार सीवीसी की नियुक्ति प्रक्रिया चल रही थी तब भी लोकसभा में तत्कालीन कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडगे ने विरोध किया था। लेकिन उनके हर विरोध को सरकार ने खारिज कर दिया था। जब पिछली बार के वी चौधरी को सीवीसी नियुक्त किया गया था तो कांग्रेस ने उनके काम करने के तौर-तरीक़ों पर सवाल उठाते हुए कई बार उनको हटाने की माँग की थी। 

तत्कालीन सीवीसी के वी चौधरी सीबीआई के उस मामले में सबसे ज़्यादा विवादों में रहे थे जिसमें पूर्व सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और उसी एजेंसी के नंबर दो अधिकारी राकेश अस्थाना आपस में लड़ रहे थे। जब इस मामले में आलोक वर्मा को पद से हटा दिया गया था तब उन्होंने आरोप लगाया था कि तत्कालीन सीवीसी के वी चौधरी ने राकेश अस्थाना के मामले में पंच की भूमिका निभाने और उन्हें बचाने की कोशिश की थी। तब 'इंडियन एक्सप्रेस' ने ख़बर दी थी कि पूर्व सीबीआई निदेशक ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस ए. के. पटनायक को दिए लिखित सबमिशन में कहा, 'चौधरी ने उनसे उनके घर पर मुलाक़ात की और पंच बन कर मामले को सुलझाने की कोशिश की ताकि राकेश अस्थाना को बचाया जा सके। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि अस्थाना के कामकाज की सालाना समीक्षा पर प्रतिकूल टिप्पणी न की जाए। 

बता दें कि राकेश अस्थाना कई गंभीर आरोपों में घिरे रहे थे। उन पर सीबीआई अफ़सर के तौर पर घूस लेने का आरोप भी लगा था। 
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हालाँकि, अब जो सीवीसी की नियुक्ति का ताज़ा मामला है उसमें भी ऐसे ही विवाद बढ़ने की संभावना है। हालाँकि पिछली बार का अनुभव बताता है कि सरकार शायद कांग्रेस के विरोध पर विचार भी नहीं करे। लेकिन सवाल तो सीवीसी की विश्वसनीयता पर है। देश में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और पारदर्शी व्यवस्था कायम करने के लिए सीवीसी को तो संदेह से परे होना ही चाहिए। 
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