उत्तर प्रदेश में सरकारी और अन्य स्कूलों की बदहाल व्यवस्थाओं को लेकर Gen Alpha के छात्रों के लगातार सड़क पर उतरने से योगी आदित्यनाथ सरकार घबराई हुई है। कई दिनों से लखनऊ, उन्नाव, फतेहपुर, हमीरपुर, कन्नौज, आजमगढ़, महोबा समेत कई जिलों में छात्रों ने शिक्षकों की कमी, खराब भोजन, पीने के पानी, शौचालय, पंखे, जर्जर भवन और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं। इन प्रदर्शनों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने के बाद सरकार ने स्कूलों की निगरानी और अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य सचिव एसपी गोयल ने डिविज़नल कमिश्नर और जिलाधिकारियों को स्कूलों तथा अन्य शैक्षणिक संस्थानों से संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट की निगरानी करने के निर्देश दिए हैं। जिलाधिकारियों से कहा गया है कि वे अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट के माध्यम से सामने आने वाली शिकायतों की जांच करें। छात्रों, अभिभावकों और अन्य लोगों द्वारा उठाए गए मुद्दों का सत्यापन करने के बाद जिलाधिकारी तथ्यों के आधार पर जवाब भी दें।

नोडल अफसरों की नियुक्ति

मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियों को भी नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है। ये अधिकारी शैक्षणिक संस्थानों की निगरानी करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि वहां पाई जाने वाली कमियों को बिना किसी देरी के दूर किया जाए। यह निगरानी बेसिक और माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा, समाज कल्याण तथा श्रम विभाग के अंतर्गत आने वाले शैक्षणिक संस्थानों तक होगी।
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सर्वोदय विद्यालयों में शिक्षकों की तैनाती में हुई देरी पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा है कि नया शैक्षणिक सत्र 1 अप्रैल से शुरू होने के बावजूद सर्वोदय स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती में देरी क्यों हुई। जून में शिक्षक भर्ती के विज्ञापन जारी करने में देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भी पहचान की जाएगी।
सरकार ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया है कि जहां कहीं भी लापरवाही या चूक पाई जाए, वहां जिम्मेदारी तय की जाए।
यूपी सरकार के इन ताजा निर्देशों से संकेत मिलता है कि छात्रों की शिकायतों को लेकर प्रशासन की जवाबदेही अब और सख्त की जा रही है। जिला प्रशासन पर दबाव है कि वह छात्रों और अभिभावकों की शिकायतों की लगातार निगरानी करे और समस्याओं के समाधान के लिए पहले की तुलना में तेजी से कार्रवाई करे।

लखनऊ से शुरू हुआ सिलसिला कई जिलों तक पहुंचा

लखनऊ में 14 अगस्त को जयप्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय के 100 से अधिक छात्र शिक्षकों की कमी, खराब भोजन और दूसरी सुविधाओं को लेकर मोहान रोड पर उतर आए थे। कुछ दिनों बाद इसी तरह करीब 200 छात्राओं ने बारिश के बीच लखनऊ-दुब्बगा बाईपास को जाम कर अपनी शिकायतें सामने रखीं। दोनों घटनाओं में प्रशासन और समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों को छात्रों के बीच पहुंचना पड़ा।
उन्नाव में भी छात्रों ने सड़क पर बैठकर विरोध किया। उनकी शिकायतों में शिक्षकों की कमी, खराब गुणवत्ता का भोजन, पीने के पानी की समस्या, शिक्षकों के व्यवहार और साफ-सफाई से जुड़े मुद्दे शामिल थे। प्रशासन और पुलिस अधिकारियों के मौके पर पहुंचने के बाद छात्रों ने प्रदर्शन समाप्त किया।

फतेहपुर में करीब 1,000 छात्रों का प्रदर्शन

28 जुलाई को फतेहपुर के किशनपुर स्थित सर्वोदय इंटर कॉलेज में कक्षा 6 से 12 तक के करीब 1,000 छात्र स्कूल के बाहर जमा हुए। छात्रों ने सुरक्षित पेयजल, जर्जर कक्षाओं और छतों की मरम्मत, पंखों और फर्नीचर जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग की। चार घंटे चले प्रदर्शन के बाद जिला विद्यालय निरीक्षक ने छात्रों से मुलाकात की और उनकी समस्याओं के समाधान का आश्वासन दिया। इसके बाद स्कूल की कक्षाओं में पंखे लगाए गए और RO फिल्टर वाले पेयजल की व्यवस्था की गई।

हमीरपुर में सड़क के लिए छात्रों ने किया मार्च

11 अगस्त को हमीरपुर में करीब 35-40 छात्र अपने अभिभावकों के साथ लगभग पांच किलोमीटर पैदल मार्च करते हुए जिला कलेक्ट्रेट पहुंचे। उनके हाथों में तिरंगा था और उनकी मांग स्कूल तक जाने वाली खराब सड़क की मरम्मत की थी। स्कूल तक जाने वाली करीब 1.8 किलोमीटर सड़क का लगभग 300 मीटर हिस्सा बारिश के दौरान लगभग चलने लायक नहीं रह गया था। इस मामले ने इतना ध्यान खींचा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अखबार की रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया। इस बीच सड़क की मरम्मत भी कर दी गई।

कन्नौज में छात्रावास के अंदर से विरोध

कन्नौज में भी छात्राओं ने अपनी शिकायतें सार्वजनिक कीं और छात्रावास के अंदर से विरोध जताया। इस तरह यूपी में छात्रों का आंदोलन किसी एक स्कूल या एक जिले तक सीमित नहीं रह गया है। Indian Express के मुताबिक, पिछले एक महीने में कम से कम पांच जिलों में छात्रों के विरोध प्रदर्शनों ने सरकार और प्रशासन का ध्यान खींचा है। छात्रों की मांगों में कोई असाधारण राजनीतिक मांग नहीं बल्कि स्कूल की रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतें शामिल हैं—अच्छा भोजन, पर्याप्त शिक्षक, साफ पानी, पंखे, साफ-सफाई, सुरक्षित भवन, फर्नीचर और बेहतर बुनियादी ढांचा।

अयोध्या में पत्रकारों की एंट्री पर रोक

इसी बीच अयोध्या में बेसिक शिक्षा विभाग ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय की ओर से जारी निर्देश में कहा गया है कि बाहरी लोगों, पत्रकारों, YouTubers और सोशल मीडिया से जुड़े व्यक्तियों को परिषद के स्कूलों में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी।
आदेश के अनुसार, सोशल मीडिया से जुड़े किसी व्यक्ति को सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना स्कूल परिसर में फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी करने की अनुमति नहीं होगी। विभाग ने कहा है कि स्कूलों में बाहरी लोगों द्वारा फोटो-वीडियो बनाने और उन्हें सोशल मीडिया पर साझा करने से शिक्षण प्रक्रिया प्रभावित होती है। हालांकि ऐसा आदेश अभी तक सिर्फ अयोध्या के जिला शिक्षा अधिकारी का दिखाई दिया है। लेकिन कहा जा रहा है कि अन्य जिलों में भी ऐसे ही आदेश दिए गए हैं। अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के कारण मीडिया का फोकस यहां बना हुआ है। इसलिए सरकार अयोध्या को लेकर अतिरिक्त सतर्कता भी बरत रही है।

क्या Gen Alpha का विरोध सरकार के लिए नई चुनौती है?

इन घटनाओं की खास बात यह है कि छात्रों का विरोध किसी संगठित राजनीतिक आंदोलन के पारंपरिक ढांचे में नहीं दिख रहा। अलग-अलग जिलों में छात्र स्थानीय समस्याओं को लेकर स्वतः सड़क पर उतर रहे हैं और कई मामलों में प्रशासन को मौके पर जाकर उन्हें सुनना पड़ रहा है। फतेहपुर में प्रदर्शन के बाद सुविधाओं में सुधार हुआ, हमीरपुर में सड़क की मरम्मत हुई और लखनऊ-उन्नाव के प्रदर्शनों के बाद सरकार ने राज्य के सभी 103 समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित सर्वोदय विद्यालयों के निरीक्षण के आदेश दिए।

इससे एक तरफ यह संकेत मिलता है कि छात्रों के दबाव का प्रशासन पर तत्काल असर पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकार के सामने यह चुनौती भी खड़ी हो गई है कि स्कूलों की समस्याएं छात्रों के सड़क पर उतरने और सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद ही क्यों सामने आ रही हैं।
योगी सरकार ने अब अधिकारियों से सिर्फ समस्याओं के समाधान की नहीं, बल्कि लापरवाही के लिए जिम्मेदारी तय करने की भी बात कही है। यही कारण है कि Gen Alpha के इन प्रदर्शनों को अब केवल छात्रों की स्थानीय शिकायत के बजाय उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े बड़े सवाल के रूप में देखा जा रहा है।

गुलाबी तस्वीर बनाम जमीनी हकीकत?

सरकार के UDISE Plus (यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन) पोर्टल के अनुसार: 

  • देश के 99% सरकारी स्कूलों में शौचालय की सुविधा है।
  • 99.6% स्कूलों में पीने के पानी की व्यवस्था उपलब्ध है।
  • हालांकि वास्तविकता कुछ और है। छात्रों के प्रदर्शन, तस्वीरों और वीडियो रिपोर्ट से एक अलग ही कहानी सामने आती है। छात्रों का आरोप है कि स्कूलों में टूटती छतें, गंदे और ठप पड़े शौचालय, गंदा पीने का पानी, बिजली/पंखों की कमी और शिक्षकों का अभाव आम बात है।

अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज (Jean Dreze) का कहना है कि झारखंड जैसे राज्यों में कागजों पर 99% शौचालयों का दावा पूरी तरह से "बोगस" है और स्कूलों के दौरे पर सच्चाई तुरंत सामने आ जाती है।

किशनपुर, उत्तर प्रदेश (Sarvodaya Inter School & Gangwa Ka Dera) 

  • सरकारी आंकड़ा: 19 कमरे (केवल 6 में मामूली काम), 5 शौचालय, बिजली और पुस्तकालय की उपलब्धता। 
  • जमीनी सच्चाई: टूटी टेबल-कुर्सियां, टपकती छतें, पीने के पानी और पंखों की कमी। कोई पुस्तकालय मौजूद नहीं था।
  • एक अन्य स्कूल (गंगवा का डेरा) ने दावा किया था कि वहाँ पक्की सड़क है, जबकि छात्रों को सड़क की मांग के लिए जिलाधिकारी कार्यालय तक 5 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।

महाराष्ट्र में ये फ्राड देखिए

कॉकरोच जनता पार्टी के संयोजक अभिजीत दिपके ने एक वीडियो पोस्ट करते हुए सरकार की हरकत के बारे में बताया है। उन्होंने लिखा है- लातूर के औसा तालुका में एक सरकारी स्कूल ने बाहर से बच्चों को लाकर मीडिया के सामने अपने छात्र के रूप में पेश किया। प्रशासन स्कूलों में सुधार करने के बजाय धोखाधड़ी का सहारा क्यों ले रहा है?